रविवार, 3 अप्रैल 2022

आत्मन् का गुप्त जीवन

 

एंड्रॉइड जोन्स द्वारा 

आध्यात्मिक जीवन का रहस्य है: यह सोचना कि मैं आत्मान् हूं, शरीर नहीं| परदे पर दृश्यों की एक श्रृंखला के रूप में सम्पूर्ण ब्रह्मांड उससे जुड़ी हुई सभी अच्छाइयाँ और बुराईयाँ चित्रित कर रहा है - जिसका मैं दृष्टा हूं।

-स्वामी विवेकानंद


हमने पिछले लेख में देखा है कि अस्तित्व में होने वाली अनुभवक्रिया के परिणामस्वरूप आत्मन् उत्पन्न होता है। अनुभव केवल अस्तित्च का रूपांतरण है, इसलिए आत्मन् और कुछ नहीं बल्कि ऐसा ही एक परिवर्तन है। संक्षेप में, जैसा बाकी सब कुछ है, वैसे ही आत्मन् भी अस्तित्व है… यद्यपि अन्य रूपों की तुलना में आत्मन्, अस्तित्व का अधिक शुद्ध रूप है। कोई कह सकता है कि यह अस्तित्व से केवल एक कदम दूर है। 


दूसरी चीज़ों की तरह आत्मन् का भी अनुभव किया जा सकता है। आत्मन् को अनुभव करना वास्तव में अद्भुत है। यह जानने वाला स्वयं को जानने वाला है। यह एक सुखद अनुभूति है और अस्तित्च को यह करना पसंद है। इस अनुभव को आत्म-जागरूकता या आत्म-चेतना भी कहा जाता है। आजकल, इसे केवल चेतना कहने का प्रचलन है। चेतना का शाब्दिक अर्थ है एक साथ जानना। इस शब्द के साथ समस्या यह है कि इसका प्रयोग संज्ञा, क्रिया और विशेषण के रूप में किया जा रहा है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है। संज्ञा के रूप में, यह आत्मन् (अनुभवकर्ता या ज्ञाता) के समान है। एक क्रिया के रूप में यह अनुभवक्रिया है (जैसा कि, किसी चीज़ के प्रति सचेत होना), और विशेषण के रूप में, यह एक गुण है जो किसी के पास हो सकता है। इसे साक्षी चेतना या केवल साक्षी भी कहा जाता है।

रविवार, 27 मार्च 2022

अस्तित्व, अनुभव और ज्ञान

 


साल्वाडोर डाली के द्वारा 

होने का अनुभव  

एक बात बहुत निश्चित है - कुछ विद्यमान है। वास्तव में केवल यही मेरे लिए निश्चित है। मेरे पास कोई ज्ञान नहीं है, और कोई ऐसा अनुभव भी नहीं है जो इतना निश्चित लगता हो। बस कुछ है |  मैं उस "कुछ" को अस्तित्व शब्द से परिभाषित करता हूं। यह बस एक शब्द है जो उस निश्चितता का सूचक है | अस्तित्व एक प्रक्रिया द्वारा गतिमान हो रहा है, जिसे मैं अनुभवक्रिया कहूंगा, और अनुभव शब्द इस प्रक्रिया का संज्ञा रूप है| मैं या दूसरा कोई ओर कितना भी प्रयास कर ले, इस बात का खंडन नहीं कर पायेगा कि अस्तित्व है। इनकार करना या इसको गलत साबित करना भी एक अनुभव ही है, और यह पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है कि अनुभवक्रिया/या अस्तित्व है। इतना आश्वस्त, इतना ठोस, इतना आत्म-स्पष्ट और क्या हो सकता है? तो हम यहां एक बहुत ही दृढ़ आधार पर हैं जो, एक अच्छी शुरूआत है, या फिर कहे की यही से कोई भी शुरुआत हो सकती है।

अस्तित्वनाद या अस्तित्व में परिवर्तन अनुभवक्रिया को जन्म देते हैं। बस इतना ही है, बाकी सबकुछ उसका विवरण मात्र है।यह अस्तित्व क्या चीज है? मुझसे मत पूछिये, और इसमें ये नाद परिवर्तनादि हो ही क्यों रहे हैं, यह कैसे और क्यों हो रहा है... मुझे इसका कोई ज्ञान नहीं है। महाऋषि और पंडित इस सब के बारे में क्या कहते हैं, यह जानने के लिए आप तत्वविज्ञान की कोई अच्छी किताब पढ़ लीजिये। मैं आपको आश्वशन देता हूं कि यह कोई भी नहीं जानता है । यह बहुत ही विरोधाभासी है कि कुछ इतना परिचित, स्पष्ट और प्रत्यक्ष है पर फिर भी अज्ञात है! खैर, मनीषियों के देश में आपका स्वागत है, उम्मीद है की यह आपका पहला आश्चर्य नहीं है....

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

हृदयपथ

 " गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
   गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥"


                                          

कई साल पहले "द पाथ विद ए हार्ट" इस वाक्यांश से, कार्लोस कास्टानेडा द्वारा उनके शिक्षक के बारे में लिखी कुछ पुस्तकों के द्वारा मेरा परिचय हुआ [10]। 

मुझे तब यह ज्यादा समझ नहीं आया, क्योंकि किताबें बहुत जटिल लगती थीं और ये बातें मेरे सिर के ऊपर से निकल जाती थीं। फिर भी, इस वाक्यांश ने मुझ पर थोड़ा प्रभाव डाला और आगे चलकर, यह स्पष्ट हो गया कि, वह किस बारे में बात कर रहे थे| मैं जिसकी शुरूआत से ही खोज रहा था, यह वही था। मैंने इस अवधारणा को "हृदयपथ" [1] के रूप में अपनाया है। वाक्यांश का यह नया रूप ज्यादा स्पष्ट और कम काव्यात्मक है, और अब हम चर्चा करेंगे कि यह वास्तव में है क्या और क्यों इतना महत्वपूर्ण  है।

यह मेरा अनुभव रहा है, कि अधिकांश लोग बिना सोचे-समझे, आधे सोए हुए, अनजान और लगभग लाश की तरह अपना जीवन जीते हैं। उनका जीवन और कुछ नहीं बल्कि उनकी अपनी इच्छाओं, भय, भावनाओं, सामाजिक दबावों, शारीरिक जरूरतों, पसंद-नापसंद और ऐसे ही अन्य कारणों से उन पर थोपी गई मजबूरियों की एक श्रृंखला है। उनके जीवन के अधिकांश भाग में जीवित रहने से संबंधित गतिविधियाँ होती हैं जैसे - भोजन करना, प्रजनन करना, संबंध बनाना, सुरक्षा सुनिश्चित करना, सामाजिक स्थिति आदि आदि|