रविवार, 19 फ़रवरी 2023

हिंदी_सत्संग_मुख्य_बिंदु_४

 


सत्संग १०३, ९ फरबरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


जो कर्म निस्वार्थ भाव से या मैं और मेरा मानकर नहीं किया जाये उसका कोई कर्म बंधन नहीं होता है। यह तभी संभव है जब आपने स्वयं को जान लिया है। 


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सत्संग १०४, १३ फरबरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) अज्ञान ही एकमात्र मूल अशुद्धि है। जो विचार मैं या मेरा कहता है वो अहम भाव है। 


सबसे पहला तत्व जो प्रकृति में प्रकट है उसको महत कह दिया गया है। महत यानी महातत्व और वही सभी रूपों में प्रकट है। सांख्य दर्शन के अनुसार अप्रकट कुछ भी नहीं है और पुरुष भी महत से ही प्रकट हुआ है। अद्वैत में ऐसा नहीं है। ब्रह्मनाद ही को महत कहा जा सकता है।


अद्वैत में अनुभवकर्ता को अप्रकट कहा गया है, और जो प्रकट है वो अनुभव है या माया है। 


२) स्वयं का अनुभव नहीं होता पर स्वयं का ज्ञान हो सकता है कि मैं कोई अनुभव नहीं हूँ। जो दिख गया वो मैं नहीं हूँ। मेरा होना ही मेरा दर्शन है।


सभी लोक चित्त की अवस्था हैं। जो भी अनन्त लोकों में प्रकट है वो मैं ही हूँ, और जो अनन्त लोकों के दर्शन कर रहा है वो भी मैं ही हूँ। सम्पूर्ण अस्तित्व मैं ही हूँ, प्रकट अप्रकट, मिथ्या या सत्य। मैं सर्व व्यापि हूँ और सभी लोकों में पहले से ही हूँ।


३) ओमकार तीन अवस्था है, और सम्पूर्ण रुप में तुरीय अवस्था है। जागृत अवस्था से सूक्ष्म अवस्था में प्रवेश ही मृत्यु अवस्था है। 


पहले ज्ञान आता है फिर शास्त्र आते हैं। कोई किताब गुरु की जगह नहीं ले सकती है। किताबों से ज्ञान रक्षा होती है, और उनसे ज्ञान की पुष्ठि भी होती है।


ध्यान को चेतना की परत पर रखने से, ज्ञान रिसते रिसते निचली परतों में भी आ जाता है, और चिंता, भय आदि नहीं रहते हैं। 


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सत्संग १०५, १६ फरबरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) अपनी मान्यताओं को गलत सिद्ध करना कठिन है, उसके लिये बड़ा साहस चाहिये।


चेतना आते ही चली जाती है, क्योंकि उसपर ध्यान टिकता नहीं है। चेतना जाते ही --> वासना --> सुन्दरता --> आकर्षण --> कर्म। 


२) देव योनि में अज्ञान भी होता है। देव योनि में बंधन होता है, पर दुख नहीं होता है। जब पुण्य कर्म समाप्त हो जाते हैं तो पुनः मनुष्य योनि में जन्म होता है। मनुष्य योनि में ज्ञान की इच्छा जागृत होती है, और पूर्ण ज्ञान हो सकता है। 


अधिकतर दुख के लिए स्थिति जिम्मेदार नहीं होती है, मूर्खता जिम्मेदार होती है। ज्ञान और बुद्धि से ही स्वर्ग मिलता है। 


३) बुद्ध होना है, उनके जैसे व्यवहार की नकल नहीं करनी है। 


जो नाद स्मृति से उठता है वो वासना है। यही नाद विचार और भावनाओं के द्वारा कर्मेन्द्रियों तक पहुंचता है, जिससे कर्म होता है। 


ज्ञान से वैराग्य होता है। कोई वैरागी बन नहीं जाता, वैराग्य हो जाता है।


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सत्संग १०६, १९ फरबरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) ज्ञान मार्ग पर अज्ञान का नाश होता है, बाकी सब अज्ञेय है।


जब सब कुछ माया है, मेरी ही लीला है तो संसार से भी घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं ही शिव हूँ तो विष कंठ के नीचे नहीं उतरेगा। 


अज्ञान के कारण व्यसन में फलों की चिंता नहीं रहती है, या उसकी चमक में उसके परिणाम नहीं दिखाई देते हैं। वस्तु में समस्या नहीं है व्यक्ति में समस्या है।


२) कोई अवस्था सत्य नहीं है, पर हर अवस्था में कायम रहने वाला, उनको देखने वाला ही केवल सत्य है।


गुरुक्षेत्र कारण या सूक्ष्म शरीर के स्तर पर बदलाव करते हैं, भौतिक स्तर पर ज्यादा फेरबदल नहीं करते हैं।


जागृत अवस्था स्वप्न समान ही है यह एक उपमा दी गई है, कि जैसे स्वप्न स्मृति से बने हैं वैसे ही जागृत अवस्था भी स्मृति से बनी हुई है। 


इच्छायें हैं पर इच्छा करने वाला कोई नहीं है। 


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सत्संग १०७, २३ फरबरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


जो सम्पूर्ण चेतना में इच्छा पूरी होती हैं वो वापस नहीं आती फिर। 


ऋदम्बरा प्रज्ञा को ही चेतना कहा जा सकता है। चेतना को आकर्षित करना है, उसको आज्ञा नहीं देना है।


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सत्संग १०८, २७ फरबरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


कोई कर्ता नहीं है, फिर भी माया में सांकेतिक कर्म या निष्काम कर्म करना आवश्यक है, तभी उसके फल आते हैं। पर यदि बहुत प्रयत्न करने के बाद भी कुछ नहीं मिल रहा है तो उसे छोड़ देना चाहिए, ये मेरा प्रारब्ध है, यह मान लेना चाहिये।


भक्त नहीं है, भगवान ही प्रकट हैं भक्त के रुप में। मैं जो हूँ वही होने में कोई प्रयास नहीं लगता है, जो नहीं हूँ वो बनने में बहुत प्रयास लगता है।


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सत्संग १०९, २ मार्च २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


अद्वैत में नाद भी मैं ही हूँ, और अद्वैत में नाद भी एक सम्भावना मात्र ही है।


सभी सम्बंध भी मैं ही हूँ। फिर कोई सम्बन्ध नहीं रह जायेगा, उसकी जगह प्रेम आ जायेगा।


चित्त की हर परत में अपनी एक स्मृति होती है।


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सत्संग ११०, ५ मार्च २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) कुछ लोग सब कुछ होने के बाद भी संतुष्ट या तृप्त नहीं होते हैं, उसका कारण है डर।


शारीरिक पीड़ा और मानसिक पीड़ा में बहुत समानतायें हैं। किसी स्थिति को स्वीकार नहीं करना मानसिक पीड़ा है। शरीर की तरह मन में भी यह क्षमता है कि वो समय के साथ अपने आप को ठीक कर लेता है। मानसिक पीड़ा से बचने के लिए, यह जानना आवश्यक है कि चित्त कैसे काम करता है।


जिस ज्ञान का स्रोत नहीं पता चलता है उसको अन्तःप्रज्ञा कह देते हैं। इससे भी ज्ञान या अज्ञान दोनों हो सकते हैं।


२) संस्कारों के संग्रह को ही कारण शरीर कहते हैं, और जीव उसकी अभिव्यक्ति है।


प्रारब्ध से इच्छायें आती हैं, कष्ट नहीं आता है। कभी कभी इच्छायें कष्ट का कारण बन जाती हैं। 


ज्ञान होने के बाद, जीवन का सबक सीख लेने के बाद और अतृप्त वासनाओं का पूरा होने के बाद मनुष्य जीवन का कोई अधिक उपयोग नहीं रह जाता है। 


किसी से कुछ मांगने की भी क्या आवश्यकता है, प्रकृति ने जो निर्धारित किया है आपके लिए, वो आपके लिये सबसे अच्छा है। आपके कर्म ही आपका जीवन निर्धारित करते हैं और कुछ नहीं।


३) सूक्ष्म अवस्था में जाकर संकल्प लेने से, कारण शरीर यानी अपने पिछले जन्मों का ज्ञान लिया जा सकता है।


आपकी ही लीला है, आपका ही खेल है, उसको जैसे चाहे रंग लीजिये। सभी सम्बन्धी गुरु में हैं, और किसी सम्बन्धी की आवश्यकता नहीं है आपको।


जिसकी चेतना जागृत है उसको पूर्ण नियंत्रण आ जाता है इच्छाओं और जन्म में। 


४) चेतना पर ध्यान देना चाहिए ना कि स्वप्नों पर। यदि स्वप्न में इच्छा पूर्ती में कोई रुचि नहीं है तो स्वप्न आने भी बहुत कम हो जाते हैं।


बुद्धि के द्वारा इच्छा संकल्प में बदली जा सकती है। 


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सत्संग १११, ९ मार्च २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जीव पहले है या कर्म, यह जाना नहीं जा सकता है। अस्तित्व समयहीन है, अनादि है अनन्त है, यहां सभी सम्भावनायें हैं, स्वप्न तुल्य है, इसका कोई कारण नहीं मिलेगा।


सारे कर्म अज्ञानवश होते हैं। जीव को यदि ज्ञान होता तो वो क्रिया ही क्यों करता। 


ज्ञाता वो है जिसको ज्ञान होता है। दृष्टा केवल साक्षी है, दृष्टा को ज्ञान नहीं होता है। ज्ञानी वो है जो जान गया है कि कुछ जाना नहीं जा सकता है। जो बहुत कुछ जानता है वो भी अज्ञान का बोझ ही उठा रहा है।


२) ना कर्म है, ना कर्म फल है, ना कर्ता है, यह जान लेना ही कर्महीनता है। शून्य में कुछ नहीं होता है, पर समझाने के लिए बोल दिया जाता है कि कर्ता कोई नहीं है बस होता है। स्मृति के कारण ही कर्म का भ्रम होता है।


लोक कोई स्थान नहीं है, लोक चित्त की अवस्था है। अस्तित्व में होना मात्र है, जानना नहीं। ज्ञान अपने आप में एक अशुद्धि है, और अज्ञान भी अशुद्धि है। मैं ब्रह्मं नहीं हूँ, यह मान्यता त्याग देना, यही ज्ञान है।


३) जिसको ब्रह्मज्ञान हुआ है उसके लिये प्रती क्षण सहज समाधि ही है, पर यह प्रयास से नहीं होता है, यह कृपा है। 


जो आपका अभी का साधारण सा अनुभव है उसीको प्रकाषित कर दीजिये ज्ञान से, वही चेतना है। चेतना कोई कार्य नहीं है, चित्त की अवस्था है।


आध्यात्मिक बुद्धि ये बताती है कि क्या झूठ है, नकारत्मक है, और सांसारिक बुद्धि यह बताती है कि क्या सच है, सकारात्मक है। कभी कभी शिष्य उनको जो दिया गया है उसकी कीमत नहीं जानते हैं, और इसलिये वापस अज्ञान में आ जाते हैं।


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सत्संग ११२, १३ मार्च २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) चेतना बहुत सरल अवस्था है, चेतना में कौन है या कौन नहीं है यह बाहरी व्यवहार देखकर नहीं आंका जा सकता है। ज्ञान होने के बाद चेतना में सरल, सुन्दर, सात्विक और साधारण जीवन व्यतीत करना चाहिए - साधारण जीवन और उच्च विचार। 


जो साधारण है वो विशेष की पृष्ठभूमि में चल रहा है, उसको और विशेष करने की आवश्यकता नहीं है। जो इसका स्वाद चख लेता है वो फिर वापस अंधेरे में नहीं जा सकता है। 


२) मैं परम आनंद हूँ, मैं अंतिम हूँ, जागृत अवस्था में आनंद होना महत्वपूर्ण है। ऐसा नहीं है कि स्वप्न या सूक्ष्म अवस्था के प्रयोग करके मैं इससे उपर और कुछ हो जाऊंगा। 


मान्यताओं का अन्त ही ज्ञान का अन्त है। ऐसा नहीं है कि ब्रह्मं ने ब्रह्मं होना बंद कर दिया है, क्योंकि आपको अज्ञान है। 


३) जब यह विचार आता है कि जो अभी थोड़ी देर पहले हुआ उस समय चेतना नहीं थी, तो उस समय चेतना आ चुकी है। चेतना बुद्धि के उपर है इसलिये शरीर, वाणी, कर्म, विचार आदि से चेतना नहीं आती है।


जिसको आत्मज्ञान हुआ है उसका कर्म नाश ही होता है, कर्म बंधन नहीं होता है। जब कोई कर्म मेरा नहीं है तो उसका कोई कर्म बंधन भी मेरा नहीं हो सकता है। ज्ञानी तो कर्म बंधन का भी दृष्टा है।


कृपा उसी पर होती है जो सांकेतिक प्रयास करता है। जब तक ज्ञान नहीं होता है सब कुछ बहुत कठिन लगता है, जब कृपा होती है तो उससे सरल और कुछ भी नहीं है।


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सत्संग ११३, १६ मार्च २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


ज्ञान होता नहीं है इसलिये उसका कोई सोत्र नहीं होता है। 


यदि ज्ञान हो गया है तो जो सबसे आवश्यक है वो होगा, यह चित्त पर निर्भर करता है। यदि कुछ विशेष नहीं होता है तो ज्ञानी उसपर अपना समय नष्ट नहीं करता है। कुछ करना नहीं है, आनंद में रहिये।


जिसकी जैसी संवेदन शीलता है उसको वैसा ही भोजन करना चाहिए।


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सत्संग ११४, १९ मार्च २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) अहम वृत्ति भी सम्पूर्ण चेतना में चल सकती है। जो सामान्य है वही सबसे विशेष है। हर क्षण आनंद में होना संभव है, उसके लिए किसी विशेष समय की प्रतीक्षा करना अर्थीहीन है। ज्ञानी का उत्सव हर क्षण होता है। 


दिवाली का अर्थ है अपने अंदर चेतना का दिया जलाना, और होली का अर्थ है कि अपने अंदर की बुराई का नाश करना। 


२) सबसे अच्छा यज्ञ है ज्ञान यज्ञ, जो अंतर मन में होता है बाहर नहीं होता है। सबसे अच्छा मंत्र है 'शिवोहम’ जो जान के होता है, बोलके नहीं।


ज्ञान होने के बाद ज्ञान भी त्याग देना है, यही सही मायने में स्वतंत्रता है। जीवन ना अच्छा है ना बुरा है, बस ज्ञानी का जीवन है और अज्ञानी का जीवन है, इतना मात्र है।


इच्छा है और साधन है, तो जो आवश्यक है, वो होने देना है। इच्छा है और साधन नहीं है, तो उसका आनंद लेना है।


३) चेतना आने के बाद शक्ति शिव में मिल जाती है, यही पूर्णता है। 


जब तक गुरु नहीं थे तो बहुत उलझन थी, अब सब कुछ बहुत सरल है, अब तो बंधन भी एक तरह का खेल बन गया है। वही पूरी तरह से स्वतंत्र है जिसने बंधन को भी खेल बना लिया है।


४) यदि आपको ज्ञान हुआ है तो आपका सारा वंशज शुद्ध हो जाता है। 


जिसको आप निष्क्रियता कहते हैं वो अनावश्यक का त्याग है। जब ज्ञान और बुद्धि होती है तो कर्म अपने आप कम हो जाते हैं। आलस के लक्षण अवसाद, दुख, निराशा आदि होते हैं। पर यदि आप आनंद और शांति में हैं और खाली बैठे हैं तो कोई परेशानी वाली बात नहीं है। हम यहां आराम करने आए हैं कुछ करने नहीं आए हैं।


५) यही कृपा है कि आपको हर बंधन से निकाल दिया जाता है। सभी संबंध मानसिक ही होते हैं, शरीर तो केवल अभिव्यक्ति करता है उनकी। 


ज्ञानी के लिए सभी संबंध केवल व्यावहारिकता के लिए ही होते हैं। ज्ञानी के संबंध केवल प्रतीत होते हैं अंदर से तो वो स्वच्छंद है। सपने में संबंध का कोई अर्थ नहीं होता है। थोड़ा ज्ञान आपको संबंधियों से दूर कर देगा और पूर्ण ज्ञान पूरे विश्व को आपका संबंधी बना देगा। ज्ञानी लेने के लिए नहीं बल्की किसी को कुछ दे सके, इसलिए संबंध बनाता है।


मैं स्वयं शिव हूं, मेरी कोई इच्छा नहीं है लेकिन देवी की इच्छा पूरी करने के लिए मैं तैयार हूं। आत्मज्ञान होने के बाद, शास्त्रों में भी कुछ नया नहीं मिलेगा। 


शक्ति आप स्वयं हो, वह आपके सामने नृत्य कर रही है तो आप उसके बारे में पढ़कर क्या जानना चाहते हो किताबों में, बस उसके साथ उसकी लीला में लीन हो जाइए, और करने का बचता ही क्या है इसके बाद यहां पर।


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सत्संग ११५, २३ मार्च २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


माया की रचना हुई ही नहीं है केवल संभावना ही है जो प्रतीत हो रही है अनेक रूपों में। माया भी ब्रह्मं स्वयं है तो वो अपनी ही रचना कैसे कर सकता है, कोई रचेयता नहीं है।


ज्ञान के प्रकाश के पुंज को भारत कहते हैं। चैतन्य को ज्ञान का भी अनुभव होता है। 


नाम रूप और तत्व एक साथ मिलते हैं, यही अद्वैत का प्रमाण है। 


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सत्संग ११६, २७ मार्च २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) अनुभवकर्ता ध्यान का भी साक्षी है। साक्षी भाव का अर्थ यह नहीं है कि आपका ध्यान साधारण गतिविधियों से हट जाएगा। 


नाद की पृष्ठभूमि या शून्यता को आकाश तत्व कहा गया है। अग्नि तत्त्व नाद की गति की तरफ संकेत करता है। वायु, जल और पृथ्वी; ये सुक्ष्मत्म, सूक्ष्म और स्थूल तीन तरह के नाद हैं। ये तीन तरह की इन्द्रियों पर आधारित हैं जो हैं - सुक्ष्म, आंतरिक और स्थूल इंद्रियां। सिद्धांत अनेक बनाए जा सकते हैं, वो उपयोगी कितने हैं वो महत्त्वपूर्ण है।


सुक्ष्म तत्व विचारों से नियंत्रित होता है, जबकि स्थूल तत्व कर्मों से नियंत्रित होता है। सुक्ष्म तत्व में नाद बहुत तेज होता है, संकल्प इसको स्थायी करता है। पहले सुक्ष्म रचना होती है फिर स्थूल रूप आता है। 


स्थूल इन्द्रियों से जगत का अनुभव होता है, आंतरिक इन्द्रियों से शरीर का अनुभव होता है और सुक्ष्म इन्द्रियों से मन का अनुभव होता है, लेकिन अंत में सभी सुक्ष्म ही हैं, सभी एक हैं।


२) यह मृत्युलोक एक संरक्षित क्षेत्र है। 


ज्ञान प्रसार को एक खेल बना देना है। यदि अनावश्क वृत्ति नहीं चल रही है और अनावश्यक कर्म नहीं हो रहे हैं तो ये निर्विकल्प समाधि ही है। किसी भी मार्ग पर चलना आवश्यक है, कुछ मिलना नहीं। प्रगति खोना है पाना नहीं।


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सत्संग ११७, ३० मार्च २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


शून्य ही सम्पूर्ण और अनंत हो सकता है। संपूर्णता, शून्यता और अनंत एक ही हैं।


जो ढूंढता है वो पाता है लेकिन जिसको यही नहीं पता कि क्या ढूंढना है उसे कुछ नहीं मिलता है।


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सत्संग ११८, ३अप्रैल २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जब ज्ञान हो गया है, व्यक्ति छूट गया है, या हट गया है, तो वो गुरुक्षेत्र के लिए एक बहुत अच्छा उपकरण हो जाता है, उसका गुरुक्षेत्र से संपर्क हो जाता है।


केवल अनुभव बदलते रहते हैं, जिनको अलग अलग अवस्था के नाम दे दिए गए हैं। 


जब सुक्ष्म अनुभव बंद हो जाएं तो जो बचता है वो करण शरीर है, स्मृति बचती है जो इन अनुभवों को प्रकट कर रही है। निद्रा की अवस्था में कारण शरीर के अनुभव होते हैं। 


२) जिनका संकल्प नहीं है, गुरु नहीं हैं, कोई प्रयोग नहीं कर रहे हैं, उनके सपने अर्थहीन होते हैं। जागृति में ध्यान दीजिए सपनों में नहीं। आध्यात्मिक होने पर सपनों का महत्व बड़ जाएगा ऐसा नहीं है, सारा ज्ञान जागृति में है।


जिसको ज्ञान नहीं हुआ उसकी तो जागृति भी अर्थहीन है। विचित्र अनुभवों से कोई ज्ञान नहीं होता है। सारी अवस्थाएं मनगड़ंत सपना है, और आप उसके दृष्टा हैं।


३) संस्कार मिटाए नहीं जा सकते हैं पर उनसे उपर उठा जा सकता है। जिसको ज्ञान हो जाता है, तो केवल होना मात्र रह जाता है, कर्ता नहीं रहता है।


अहम भाव के लिए आत्मज्ञान किसी काम का नहीं है, इसलिए चित्त अपने लिए ही विघ्न खड़े कर लेता है। अवरोध है, रुचि नहीं है, संसार में आसक्ति है, तो आत्मज्ञान सरल होते हुए भी समझ में नहीं आता है।


४) माया छोड़ने से आत्मज्ञाम होगा, या आत्मज्ञान होने से माया छूट जायेगी, दोनों गलत मान्यताएं हैं। जितनी कम बुद्धि होगी उतनी अधिक मान्यताएं होंगी।


एक बार आपको आत्मज्ञान सिद्ध हो गया, प्रमाण मिल गया की जो कहा गया है वो सत्य है, फिर प्रयोग भी निरर्थक हैं। 


मनुष्य जीवन से मुक्ति सम्भव है पर माया से मुक्ति सम्भव नहीं है। मन स्थायित्व चाहता है, जबकि माया का स्वभाव ही है परिवर्तन। 


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सत्संग ११९, ६ अप्रैल २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) कभी कभी किसी संबंध को त्याग देना भी अहिंसा ही है। 


गुरुक्षेत्र का अनुभव गुरुक्षेत्र का भाग होकर ही किया जा सकता है।


ब्रह्मं ने स्वयं को जान लिया यह ब्रह्मांड की सबसे बड़ी घटना है। इसके आगे सारे चमत्कार फीके हैं।


२) इच्छाओं को बंद नहीं किया जा सकता है लेकिन उनको सही दिशा दी जा सकती है, यही शुद्धिकरण है। बोधिसत्व वृत्ति में सबकी इच्छाएं मेरी ही इच्छा हैं।


ज्ञानी अनावश्यक इच्छाओं को बुद्धि, चेतना या ज्ञानचक्षु से देखकर भस्म कर देता है।


मेरे जीवन में आने वाले सभी कर्मों का अंतिम कारण मैं हूं और अंतिम उपाय भी मैं ही हूं।


३) दृष्टि सृष्टि के नियम के अनुसार वस्तुएं नाद से तब गड़ी जाती हैं जब उनका अनुभव होता है, लेकिन नाद तब तक रहता है जब तक वो स्थायी है। केवल अनुभव होने के कारण सृजन नहीं हो जाता है और केवल अनुभव होने के कारण विलय नहीं होता है। 


स्वप्न अवस्था में स्मृति अस्थायी होने के कारण अनुभव बहुत तीव्र गति से बदलते हैं। जागृत अवस्था भी स्वप्न जैसी ही है, लेकिन थोड़ी स्थाई है और थोड़ा धीरे बदलती है।


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सत्संग १२०, ९ अप्रैल २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


अनुभवकर्ता शून्य रूपी परदे की तरह है, अस्तित्व स्वयं है, सर्वव्यापी है, और सभी संभावनाओं का साक्षी है। 


एक गुरु में सब गुरु होते हैं, और सभी गुरुओं में एक ही गुरु तत्व होता है। 


परदा सब कुछ ढूंढ लेगा, चित्र परदे को ढूंढ नहीं सकता है। 


जीव हट जाता है, ब्रह्मं ही जीव के माध्यम से यह जानता है कि मैं ही ब्रह्मं हूं। माया ने आपकी बुद्धि को उल्टा किया है, गुरु आपकी बुद्धि को सीधा कर देता है।


इन्द्रियों का आकर्षण बहुत है और अपने आप को ज्ञानी मान के बैठे हैं तो ज्ञान कैसे होगा। 


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सत्संग १२२, १६ अप्रैल २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) संपूर्णता में जो भी होता है उसको हम कर्म कह देते हैं। स्मृति में जो संस्कार छपे हुए हैं उसीके अनुसार ये जीव कार्य करता है। 


लोक कहीं नहीं हैं, जो भी है केवल चित्त है। एक ही लोक में विभिन्न तरह के अनुभव हो सकते हैं। यदि इन्द्रियों में समानता है और स्मृति का एक ही भाग अनुभव किया जा रहा है तो समानता दिखाई देती है। 


२) ज्ञानी ये निर्णय नहीं लेता की क्या सही है और क्या गलत है। ज्ञानी ये जानता है कि कर्म के सिद्धांत के अनुसार किस कर्म का क्या फल आयेगा। कोई किसी को नियंत्रित नहीं करता है, सब अपने आप होता है।


जागृति स्वप्न सूक्ष्म निद्रा सूक्ष्म स्वप्न जागृति - ये चक्र नियमित रुप से चलता रहता है। स्वप्न अवस्था सूक्ष्म अवस्था में जाने की एक सीढ़ी मात्र है।


३) स्वीकार भाव में रहते हुए उचित प्रतिक्रिया करना भी स्वीकार भाव ही है। साक्षी भाव होने पर स्वीकार, क्षमा, मैत्री, प्रेम भाव आदि अपने आप आ जाते हैं। 


ज्ञान मार्ग पर सरल प्रार्थना अधिक करी जाती हैं - जो मिला है उसके लिए आभार या इस उपकरण का कुछ सार्थक उपयोग गुरुक्षेत्र द्वारा हो जाए या दूसरों की कुछ भलाई हो जाए। 


प्रतिकृति बनाने की इच्छा ही काम वासना के रुप में प्रकट है। 


४) जीव की इच्छाओं से छुट्टी नहीं है, और अनुभवकर्ता इच्छाओं से सर्वदा मुक्त है। सभी कारण शरीर भी मैं ही हूं, अब किसका विलय करने की इच्छा है। जो खेल चल रहा है वो तो मिथ्या ही है, उसको बंद करने का भी प्रयास क्यों करना है। 


इच्छा पूर्ति भी साक्षी भाव में ही करनी चाहिए, ये जानते हुए कि ना कर्म मेरे हैं, ना इच्छा और ना ही फल मेरे हैं। ये जीव केवल समर्पण कर सकता है और कुछ नहीं कर सकता है। सभी इच्छा देवी की इच्छा हैं ये जानकर समर्पण कर देना है। 


देवी से बोल सकते हैं कि ये इच्छा तो आपने दे दी है, पर इसका साधन तो दिया नहीं है, तो देवी इच्छा वापस ले लेंगी। देवी स्वयं इच्छा हैं, इच्छा ही नाद को जन्म देती है। 


कभी एक शरीर में इच्छा पुरी नहीं होती तो देवी उसे दूसरे शरीर से पुरी करवा लेती हैं। इसलिए कर्मों का आदान प्रदान संभव है। सभी इच्छाएं अपने आप ही पूर्ण होती हैं या अपूर्ण रहती हैं, क्योंकी उसपर कर्म करने वाला कोई नहीं है, इच्छा लाने या ले जाने वाला भी कोई नहीं है। 


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सत्संग १२३, २० अप्रैल २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) सबसे निश्चित ज्ञान यही है कि मैं हूं, और मैं ही अस्तित्व हूं। द्वैत में मैं ही अनुभवकर्ता हूं, और अद्वैत में मैं ही अस्तित्व हूं। 


एक बार अद्वैत का ज्ञान हो गया, अब सत्य असत्य का कोई अर्थ नहीं रहता है। 


अनंत लोक हैं इसलिए अनंत नियम हो सकते हैं। अस्तित्व में ना कुछ नियमित है ना कुछ अनियमित है, कुछ भी हो सकता है। 


२) चित्त की बदलती हुई अवस्थाओं में भी स्मृति स्थाई रहती है। जब स्मृतियों की तुलना होती है तब पता चलता है कि स्मृति बदली थी। यदि स्मृति हटा दी जाए तो संपूर्ण अनुभव एक हो जायेगा, और अवस्थाओं का भेद भी पता नहीं चलेगा। 


मिथ्या जगत में सत्य का उपयोग उसको त्यागने में है, उसको सुधारने या बदलने में नहीं है। सत्य को जानकर जगत छूट जाता है, और यही उसका उपयोग है।


३) दर्शन शास्त्र में पूर्णता और सुंदरता पर्यायवाची हैं। द्वैत में जब तक कुछ विरोध में ना हो तो उसका ज्ञान नहीं हो सकता है। केवल सुख ही सुख हो, तो उसका कोई अनुभव नहीं होगा क्योंकि किसी भी अनुभव का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। 


ज्ञान से भाषा शुद्ध होगी और भाषा से ज्ञान शुद्ध होगा, ये नियम है।


भोजन की भूख और काम वासना की भूख, दोनों को ऊपर की तरफ दिशा दी जा सकती है, और इसका उपाय है व्रत और ब्रह्मचर्य। निचली वृतियों को ऊपरी वृतियों में बदला जा सकता है। पर यह गुरु के निर्देश में ही करना चाहिए।


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सत्संग १२४, २३ अप्रैल २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) ज्ञान होने के बाद उसको बस शांत भाव से निहारना है, कुछ करना नहीं है, कर्महीनता है। जैसे आग के पास बैठने से ही उसका ताप मिलता रहेगा। 


साक्षी भाव पहले आता है, स्मरण भी बाद में आता है। 


सत्य एक उपकरण मात्र है, व्यक्तिनिष्ठ है, मानदंड पर निर्भर करता है, मान्यता है। लेकिन सत्य सहायक है ज्ञान प्राप्ति के लिए और तत्व तक पहुंचने के लिए। अस्तित्व में सत्य असत्य दोनों हैं, और दोनों का अभाव भी है। 


२) 'अहम ब्रह्मस्मि' में अहम चला जाता है और ब्रह्मं आ जाता है। अस्तित्व स्वयं अनुभवकर्ता है, और अब व्यक्ति गायब हो जाता है। 


मान्यताओं को नष्ट करके, खंडन से एकीकरण करना ही ज्ञान मार्ग है। 


नींद में स्मृति का अभाव होता है अनुभव का नहीं, अनुभव का कभी अभाव नहीं होता है। मैं अस्तित्व हूं, और अस्तित्व कहीं आता जाता नहीं है, जीव की ही जन्म मृत्यु होती रहती है।


३) जो भी जानने योग्य है, अभी है यहीं है। 


समावेशी ध्यान का प्रयोग करते हुए सुक्ष्म इन्द्रियों को भी ध्यान में लाया जा सकता है। 


शरीर का नाश होने पर भी शरीर से आसक्ति बने रहना प्रेत योनि है। जिसका गुरु है और उनसे अच्छे संबंध हैं, वो कभी प्रेत योनि में नहीं जा सकता है।


ज्ञान होने के बाद जब विरक्ति का भाव आए तो आवेग में निर्णय नहीं लेना चाहिए, बल्कि बुद्धि का उपयोग करना चाहिए।


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जब आपकी जिम्मेदारीयां पुरी हो गई हैं, बीबी को आपकी कोई कद्र नहीं है, या कटु संबंध हो गए हैं, तो आप वानप्रस्थ आश्रम में जा सकते हैं। 


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सत्संग १२५, २७ अप्रैल २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) मैं में यदि अनुभवकर्ता नहीं जोड़ा गया है और मैं बोला गया है, या जहां वस्तुओं, संबंधों, विचारों पर कब्जा करने की बात आती है, तो वो अहंकार का लक्षण है। 


स्वयं का अनुभव हो रहा है ब्रह्मं को, इंद्रियां केवल अनुभव को अर्थपूर्ण बना देती हैं। 


अस्तित्व का तत्व शून्य है, इसीलिए संभावना मात्र है। संभावना है इसीलिए प्रतीति है, नहीं तो प्रतीति भी नहीं होती। 


२) चेतना में रहने का इतना ही प्रभाव पड़ता है कि अनावश्यक कार्य रुक जाते हैं और जीवन सरलता से चलता है। 


जिसको ज्ञान हो गया है, जिसका गुरु है, तो शास्त्रों की कोई आवश्यकता नहीं है। 


दृष्टा होकर सभी दृश्यों का आनंद लेना है। कभी कभी अहम भाव आ जायेगा और थोड़ी देर में चला भी जायेगा, यही तो खेल चल रहा है। ब्रह्म स्वयं को भूलने का खेल खेल रहा है, आपको भी उसका आनंद लेना है उसमें भी कोई बुराई नहीं है। 


३) जितना अज्ञान होता है उतनी बैचनी होती है, अस्वीकार भाव रहता है। मेरी प्रगति क्यों नहीं हो रही है, कोई सिद्धि नहीं मिली, कोई विषेश अनुभव क्यों नहीं हो रहे हैं आदि, यदि ऐसे विचार आते हैं, ये अज्ञान के लक्षण हैं। ज्ञान केवल सुन रखा है, स्थिति नहीं हुई है, उतरा नहीं है, पर इसमें थोड़ा समय लग सकता है।


जो भी हो रहा है वो साक्षी भाव में होने दो। जीव बनकर जीवन जीना है, ब्रह्म बनकर दृष्टा होना है, और दृष्टा बनकर देखना है। यही चेतना के प्रकाश में जीना है, उचित और आवश्यक कर्म करने हैं। कभी कभी फिसल भी गए तो कोई बात नहीं है, धीरे धीरे चेतना में स्थिरता आने लगेगी। 


ज्ञान के प्रकाश में सही कर्म होता है और वो मेरा नहीं है यह जानकर होता है। चेतना में किए गए कर्म या कर्म फल दोनों ज्ञानी को नहीं बांधते हैं, क्योंकि उनकी मिथ्या प्रकट हो जाती है, एक जली हुई रस्सी की तरह है। जागृति में साक्षी भाव में बने रहिए, उसपर प्रयोग कीजिए और उसका परिणाम क्या आता है स्वयं देखिए। सपने को बहुत गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। 


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सत्संग १२६, ३० अप्रैल २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार कर लेना विरक्ति है। ज्ञानी का कोई उत्तरदायित्व नहीं है, वो किसी बंधन में नहीं बंधता और किसी को नहीं बांधता, किसी पर निर्भरता नहीं है। 


जो कम से कम में काम चलाता है, जो न्यूनतावादी है, उसके पास अधिक समय रहता है कुछ सार्थक करने के लिए। गुरुभाविता ही बाद में बोधिसत्व वृत्ति बन जाती है। 


२) स्वयं को जो स्वतंत्र कर लेता है उसपर कोई निर्भर नहीं रहता है। किसी भी तरह का बंधन अंत में दुख ही देता है। संबंध दूसरों की सेवा के लिए बनाए हैं तो भी ठीक है, स्वार्थ के लिए नहीं होने चाहिएं। दूसरों को भी अपने उपर निर्भर बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। 


जैसे निर्भरता के संबंध टूटते हैं तो व्यक्ति स्वतंत्र रहना भी सीख जाता है। सफलता यह है कि जो अपने साथ साथ दूसरों को भी आगे बड़ने में मदद कर सके। 


३) 'मेरा क्या होगा', ज्ञानी इस डर से छूट चूका है। प्रयोग इतना सा ही है कि जो भी हो रहा है उसको साक्षी भाव से करना है। ऐसा व्यक्ति जल्दी ही स्वच्छंद हो जायेगा। 


"ये सपना है", ये जान लेना ही सपने से जागना है। इस भ्रम में सपना ही आपका यथार्थ है, उसके बाहर केवल शून्य है। जगना भी सपने में ही हो सकता है, मिथ्या ही सत्य का द्वार है। 


गुरु को नहीं बताया जा सकता है कि उनको कैसे रहना है, कैसे व्यवहार करना है। गुरु ठीक वही करता है जो आपकी मान्यता तोड़ दे। जो भी गुरु के संपर्क में आता है वो जाग जाता है, बाकी सब प्रपंच है। गुरु फंसाता है शिष्य को, और जब वो फंस जाता है तो उसको पिंजरे से उड़ा देता है। 


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सत्संग १२८, ७ मई २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जिसको ज्ञान होता है उसको ज्ञाता कह सकते हैं, जिसको अनुभव होता है उसको दृष्टा कहते हैं। दृष्टा और ज्ञाता एक नहीं हैं, दृष्टा को ज्ञान अज्ञान सभी का अनुभव होगा। अहम की स्थिति ज्ञाता पर भी हो सकती है कि मैं ज्ञाता हूं, लेकिन दृष्टा को छोड़कर अहम की स्थिति कहीं भी रह सकती है तो वो मिथ्या होगी। किसको ज्ञान नहीं होता है इसीलिए कोई ज्ञाता नहीं है। दृष्टा ही सत्य है बाकी सब मिथ्या है, जिसको अनेकों नाम दे दिए गए हैं।


मेरा जो तत्व है उसका पुनर्जन्म नहीं होता है, और माया में सब कुछ संभव है। 


२) गुरु का देना भी छीनने के रूप में प्रकट होता है। गुरु को तो सभी शिष्यों में अपने ही दर्शन होते हैं। सद्गुरु कुछ नहीं लेते लेकिन फिर भी सब कुछ छीन लेते हैं।


स्थितप्रज्ञ का अर्थ पत्थर होना नहीं होता है, इसका अर्थ है कि जो अनावश्यक है उसको कम से कम करना। 


३) आप को अच्छी चीज नहीं लेनी चाहिए किसी से, पर बुरी चीजें तो बिलकुल नहीं लेनी चाहिएं। लेकीन देना आवश्यक है।


समाज की चिंता नहीं करनी है, समाज को नहीं सुधारना है, संसार से उपरती रखकर, आप क्या कर रहे हैं वो महत्त्वपूर्ण है। हम यहां कुछ सुधारने नहीं आए हैं, हम यहां सब छोड़ने आए हैं। आगे जाकर उपरती ही विरक्ति हो जाती है।


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सत्संग १२९, ११ मई २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) ज्ञान से विरक्ति होने पर शरीर से तादात्म्य टूटेगा, आसन या ध्यान से नहीं। ज्ञानमार्ग में प्राणायाम का कोई महत्व नहीं है। आध्यात्म का उपयोग शारीरिक लालसा के लिए ठीक नहीं है।


अध्यात्म में कुछ भी भला नही होता है, मुमुक्षत्व आता है। ज्ञानमार्ग से चित्त एकाग्र होता है।


शरीर पर अत्याचार नही किया जाय तो शरीर प्राकृतिक रूप से स्वस्थ रहेगा। एक निश्चित समय अंतराल के बाद शरीर नाश को प्राप्त होता ही है। शरीर संस्कृत के शय शब्द से बना है, जिसका क्षय निश्चित है।


२) हमें अपने संस्कारों पर ध्यान केंद्रित करना है। संस्कार अधिक स्थाई हैं, सबसे अच्छा संस्कार है ज्ञान के प्रति रूचि, गुरु के प्रति प्रेम, अध्यात्म, शास्त्र के प्रति झुकाव। साक्षी भाव की भूख प्राकृतिक रूप से बढ़नी चाहिए, यह कृपा से ही संभव है, इसमें कोई प्रयास नहीं है।


अध्यात्म में भला नहीं होगा, इसमें समर्पण, त्याग और विरक्ति होती है। आध्यात्म पूरी तरह से परिवर्तन की क्रिया है, जैसे कीड़े से तितली बनने और उड़ने की प्रक्रिया है। अध्यात्म एक ऊंची उड़ान है, यानी मुमुक्षत्व की उड़ान है। 


३) रोग होने नहीं होने देना ही बुद्धिमत्ता है, रोगमुक्त होना है। रोग की जड़ यानी मूल पर ध्यान देना है। संस्कारों को शुद्ध करना है, प्रारब्ध वासनाओं का ढेर है। 


पहले जीवन ठीक कर लेना चाहिए फिर ज्ञान मार्ग पर आना चाहिए। अध्यात्म का सबसे सही समय है जब जगत में कोई रुचि न रह जाए।


अध्यात्म में प्रगति के लिए स्वार्थ जरूरी होता है, यह स्वार्थ बहुत व्यक्तिगत होता है, इससे किसी को हानि नहीं पहुंचती है। 


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सत्संग १३०, १४ मई २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) विलीन चित्त में वो रचना अविभाजित हो जाती है विश्वचित्त के साथ। यह तर्क आधारित है और विज्ञान है। 


यदि ये इच्छा आ जाती है कि मेरा जीवन साथी भी मेरे बराबर हो, तो ये भी अहम भाव ही है। 


साक्षी भाव दैनिक जीवन में उपयोगी है, व्यावहारिकता में ब्रह्मज्ञान का कोई उपयोग नहीं है। 


२) पूर्व संस्कारों पर कर्म नहीं करना है, क्षमा भाव, स्वीकार भाव और साक्षी भाव से उनको देखना मात्र है। 


जो लोग आध्यात्म से अनभिज्ञ हैं आप भी उनके लिए अनभिज्ञ हो जाइए। जितना व्यवहारिकता के लिए आवश्यक है बस उतना ही संबंध बनाए रखना बहुत है। 


यदि पुरानी वृत्ति आती है और कर्म करवा देती है तो अभी शुद्धि नहीं हुई है। पर यही अगर एक अजनबी की तरह आती है और चली जाती है, कर्म में नहीं बदलती है तो शुद्धि हो चुकी है, अब केवल उसकी स्मृति है, छाया मात्र है। 


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सत्संग १३१, १८ मई २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


ये एक मान्यता है कि, बाहर सब कुछ ठीक हो जाएगा तो शांति मिलेगी, पर ऐसा नहीं है। और द्वैत है, इसलिए बाहर सब कुछ ठीक होगा भी नहीं। मैं पहले से ही शांत, ठीक और सम्पूर्ण हूं। जो मैं नहीं हूं वो हमेशा अशांत ही रहेगा कभी शांत नहीं हो सकता है। मैं आनंद स्वयं हूं, मुझमें ना सुख है ना दुख है।


जो स्वस्थ नहीं है वो शरीर में ही स्थित रहता है स्वयं में नहीं। 


अज्ञानी सत्य उसे कहता है कि जो वो पहले से जानता है वही सत्य है, और स्वयं के अंधविश्वास को ही सत्यापित करता है। अज्ञानी दुख का निवारण संसार में ही ढूंढता है, आध्यात्म में नहीं ढूंढता है। 


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दिल्ली सत्संग, २२ मई २२, के कुछ मुख्य बिंदु - भाग एक।


१) पहले मूल ज्ञान ले लेना चाहिए, यदि अनुभवों के पीछे भागेंगे तो सारा जीवन बीत जायेगा और पता नहीं चलेगा कि ये क्या चल रहा है। अधिकतर लोग विशेष अनुभवों को बड़ाने का प्रयास करते हैं या उनको बंद करने का प्रयास करते हैं, केवल ज्ञान मार्ग पर ही अनुभवों को जानने का प्रयास किया जाता है। 


जहां तक सम्भव हो शुरुआत ज्ञान मार्ग से ही करनी चाहिए, पर उसमें कुछ समझ नहीं आ रहा है तो दूसरे मार्गों पर चलने का प्रयास किया जा सकता है। ज्ञान मार्ग ऊपरी परतों पर कार्य करता है इसलिए इसका असर निचली परतों पर इतनी जल्दी नहीं दिखता है। लेकिन जो सबसे स्थाई है वो ज्ञान मार्ग ही है।


२) ज्ञानी का काम समाज को सुधारना नहीं है, बल्कि समाज से मुक्ति दिलवाना होता है। 


आध्यात्मिक सिद्धियों का यदि संसार में उपयोग किया जाए, बिना गुरु की आज्ञा से, तो उसका परिणाम अच्छा नहीं होता है। साधक के मार्ग से विघ्न हटाने के लिए थोड़ा बहुत उपयोग किया जा सकता है। 


यदि गुरुक्षेत्र को समर्पण है तो इस मनोशरीर उपकरण का गुरुक्षेत्र उपयोग कर लेते हैं। 


३) ज्ञान मार्ग पर पढ़ी लिखी बातों का कोई महत्व नहीं है, आपका अपरोक्ष अनुभव होना चाहिए और बुद्धि द्वारा स्वीकृत होना चाहिए, तो वो आपका अपना हो गया। जो अनुभव में आ गया है वो तो आपका ज्ञान हो गया, जो अनुभव में नहीं आया उसपर खोज शुरू कर देनी चाहिए, खोजी बनना है पाठक नहीं। प्रमाण अनुभव में खोजना चाहिए। 


ज्यादा समय वही होना चाहिए जिसमें रुचि है, यदि किसीने ज्ञान को हो जीवन बना लिया है तो वही उसके लिए उचित है। यह आपका चुनाव है कि आप अपने जीवन का बड़ा भाग किसे देना चाहते हैं। जो प्राकृतिक है वो करना सबसे अच्छा रहता है। 


४) जैसे जैसे जटिलता बड़ती जाती है जीवों की, उनका पूर्वनिर्धारण बताना कठिन होता जाता है। साधक का जीवन पूरी तरह से आत्म निर्धारित है, वो स्वयं निर्धारित करता है कि उसका जीवन कैसा होगा। गुरु वो हैं जो दूसरों का भी पूर्वनिधारण बदल सकते हैं। यह बहुत जटिल है और ऊपरी स्तर पर यह कहा जा सकता है कि पूर्व निर्धारण सत्य है। 


जो अधिक विकास कर गए हैं उनका पूर्व निर्धारण बताना बहुत कठिन होता है, यह बुद्धि के बाहर हो जाता है। पूर्व निर्धारण माया की एक बहुत ऊंची परत है जहां मनुष्य पहुंच नहीं पाया है। 


५) चिन्ह तीन तरह के होते हैं १) यह सही समय आ गया है आध्यात्मिक मार्ग पर आने का, २) तुम सही मार्ग पर हो, या ३)  तुम जो भी कर रहे हो वो बंद कर दो।


जब आत्मज्ञान होता है तो आनंद का अर्थ पता चलता है, और जब ब्रह्मज्ञान होगा तब समाधि का अर्थ पता चलता है। आनंद किसी अनुभव में नहीं मिलेगा, मैं स्वयं ही आनंद स्वरूप हूं। कोई भी चित्त वृत्ति विघ्न नहीं है, वो कुछ सिखाने के लिए ही आती हैं। 


६) निचली परतें तो संसार में ही रहेंगी, उनको कहीं और नहीं ले जाया जा सकता है। परतों में संतुलन जरूरी है, मनुष्य जीवन का तिरस्कार नहीं करना है, यही माध्यम है आगे बढ़ने का। 


निचली परतों के परे जाना है उनका नाश नहीं करना है। जब तक उसको अपनाओगे नहीं तब तक उससे परे नहीं जा सकते हो, जंगल से बाहर जाने का मार्ग जंगल से होकर जाता है। मनुष्य जीवन से परे जाने का मार्ग मनुष्य जीवन को भोगकर है। कुछ छोड़ा नहीं जाता है, प्रगति होने पर सब अपने आप छूटता जाता है। 


जीवन की विपरित परिस्थितियों को भी अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिए उपयोग करना भी साधना है। उसमें भी कुछ शिक्षा ढूंढ लेनी चाहिए। 


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सत्संग १३३, २५ मई २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) अनावश्यक कर्म करने से मन की पीड़ा होती है और वो मानसिक अशांति के रूप में प्रकट होती है। यदि कर्म सही कर लें तो मन में कम अशांति होगी। योग मार्ग में चित्त की परतों पर नियंत्रण और अशुद्धि दूर करने से शांति बनाई रखी जा सकती है। ज्ञान मार्ग पर सीधा पता चल जाता है कि जो शांत है वो मैं हूं, और जो अशांत है वो मैं नहीं हूं। जो अशांत है उससे तादात्म्य हटाना है, तो ऐसी शांति रहेगी जो चित्त वृतियों से प्रभावित नहीं होती है। 


अनुभव में नहीं ज्ञान में रस लीजिए, ज्ञान का परिणाम चेतना है। अज्ञेयता में जो संतुष्टि है वो जानने में नहीं है। ज्ञान को त्यागकर बुद्ध हुआ जाता है, ज्ञान लेकर नहीं। अज्ञेय अचार की तरह होता है, थोड़ा पुराना हो जाता है तो ज्यादा स्वादिष्ट हो जाता है। अज्ञेयता में एक अलग बेफिक्री है। 


२) मनुष्य का अनुभव होता है मनुष्य को अनुभव नहीं होते हैं। मैं कर्ता नहीं हूं, मैं दृष्टा हूं, कोई कर्ता है ही नहीं, कोई स्रोत या कारण भी नहीं है। 


सिद्धियां विघ्न हैं और इनका दुरुपयोग पतन का कारण है। अशुद्धियों के घटने से सिद्धियां स्वाभाविक रुप से प्रकट होने लगती हैं। 


सब खेल चल रहा है, जो लीला का दृष्टा है वही सत्य है। ज्ञान प्रसार भी एक खेल ही है, इसमें कहीं मेहनत मत करने लगना। आनंद अवस्था में रहकर झूठ बोलना है, नहीं तो आपको बहुत परेशानी झेलनी पड़ेगी क्योंकि आपके विचार सांसारिक व्यक्ति नहीं समझ पायेगा।


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दिल्ली सत्संग, २२ मई २२, के कुछ मुख्य बिंदु - "भाग दो"।


१) आप ब्रह्म स्वयं हैं अब कौनसा अनुभव लेना चाहते हो, कैसा प्रकाश देखना चाहते हो। ज्ञान मार्ग पर गुरु का डंडा साधक को केवल सही दिशा देने के लिए पड़ता है, ताकी उसकी कोई दुर्गति ना हो, उसीमें भी साधक की भलाई ही निहित है। चित्त अपनी तारीफ सुनना चाहता है, सदगुरु उसका भी इलाज कर देते हैं। 


ज्ञान होने के बाद गुरु और शिष्य में कोई भेद नहीं रह जाता है। ज्ञान की बहुत आवश्यकता है, और गुरु सब कुछ अकेले नहीं कर सकते, तो जो उनके ही रूप हैं वो भी वही करते हैं। वैसे बहुत सारे गुरु वही तत्व ज्ञान बताते हैं, पर जिस साधक को जिस गुरु से ज्ञान मिलना होता है, उसको उन्ही से मिलता है।


२) गुरु का जो अनुभव है वो उसको सबको बताते हैं, आप अपने अनुभव से दूसरों को सिखाइए। 


उपनिषद या किताबें पढ़कर मन ज्ञान नहीं पैदा करेगा, कल्पना करने लगता है, इसलिए ज्ञान गुरु से ही मिलता है। गुरु शिष्य की मान्यताओं को देखकर उसके उपयुक्त बात बताते हैं। 


पूर्व जन्म संस्कार के रूप में प्रकट होता है, कहानी के रूप में याद नहीं आता है।


जो आधा अधूरा बीच में से कुछ सत्संग सुनेगा वो तो कई गलतफहमीयां पैदा कर ही लेगा, ज्ञान मार्ग पर व्यवस्थित रूप से चलना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अज्ञानी जानबूझकर साधक का विरोध नहीं करते हैं, वो अज्ञानवश साधक की भलाई कहीं और है, ऐसा मानते हैं। 


३) जो मान्यताओं से भरा है उसे ज्ञान कैसे देगें, आप अंधे को आइना कैसे दिखा सकते हैं, वो क्या देखेगा। 


जो प्रगति कर लेता है उसके लिए पारिवारिक जीवन में भी कोई बुराई नहीं होती है। हर एक कर्म काण्ड साक्षी भाव में कीजिए। आपकी साधना का प्रभाव तो पड़ेगा ही, और आपकी कला यह है कि वो प्रभाव अच्छा पड़े, ना की बुरा। 


कई ढोंगी बाबाओं ने आध्यात्म में नुकसान भी बहुत पहुंचाया है, इससे सच्चे गुरु पर भी लोग विश्वास नहीं करते हैं। पर ये भी एक तरह की छलनी का काम करता है, जो अंधश्रद्धा से आते हैं वो छंट जाते हैं, और जो तैयार हैं वो मार्ग पर आगे बड़ जाते हैं। 


लोग ऐसा नहीं समझते की एक अपराधी जेल चला गया जो अपने आप को गुरु कहकर ठगी कर रहा था, बल्की वो कहेंगे देखो इतना बड़ा गुरु पकड़ा गया और उसको जेल हो गई। 


४) सभी कुछ चित्त निर्मित है, इसलिए सपने में भी वैसा ही डर लगता है जैसा कि जागृत अवस्था में लगता है। प्रमाण मिल जाए तो ज्ञान मार्ग पर व्याख्या है, प्रमाण नहीं मिले तो वो एक सिद्धांत है।


जो अपने अनुभवों को जितना विशेष समझता है वो उतने ही बड़े अंधकार में है। यहां हम उल जलूल कार्य करने नहीं आए हैं, सब अपने आप हो रहा है। हम यहां आराम करने आए हैं, और वो ऐसा आराम होता है की जैसे कोई आंधी तूफान चल रहा हो। जान लो, बाकी देखो क्या हो रहा है। कुछ छूटने का अर्थ है कि कुछ है तब भी आप आनंद में हैं, और कुछ नहीं है तब भी आप आनंद में ही हैं, यही तो असली छूटना हुआ। संसार है तो उसका उपयोग करो, नहीं है तो आराम करो। 


प्रकृति में जो कुछ भी है उसका एक एक कण जरूरी है, पूर्ण है। विकार उसे कहते हैं जो जरूरत से ज्यादा बड़ जाए। 


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सत्संग १३४, ३१ मई २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) गुरु के मार्ग दर्शन से ही आध्यात्म में प्रगति संभव है। इंद्रियों से अज्ञान मिल रहा है ये केवल गुरु के बताने पर ही जाना जा सकता है। 


अनुभव वो है जिसको और छोटा नहीं किया जा सकता है, जो इस समय आपके सामने प्रकट है वो ही अनुभव है। 


सभी जन मैं ही हूं, मैं अकेला नहीं हूं। एक होने का अर्थ अकेला होना नहीं होता है। 


२) साक्षी भाव बुद्धि को प्रकाशित करता है सही निर्णय लेने में, नहीं तो बुद्धि संस्कारों या भावनाओं के अनुसार काम करती रहती है। 


अज्ञानी को भी वोही बोला जाता है जो ज्ञानी को, पर उनको समझ अलग अलग आता है। ज्ञान है तो अर्थ सही निकलेगा। 


बचपन में जो मिलता है वही आदतें पड़ जाती हैं। इसलिए पसंद नापसंद का इतना अर्थ नहीं है, परिवर्तन विकास की तरफ है या नहीं, ये महत्वपूर्ण है।


३) आनंद या रस, ज्ञान में स्थित होने में है, केवल ज्ञान को सुनने में नहीं है। जो आनंद मैं स्वयं हूं, वो ज्ञान में स्थित होने से आयेगा, सत्संग सुनने मात्र से नहीं आयेगा। 


ज्ञान होने के बाद देखिए की कर्म में कुशलता कैसे लाई जाए, और साक्षी भाव में रहने से, सब अपने आप हो जायेगा। 


मैं नहीं है, मेरा कुछ नहीं हूं, मैं नहीं हूं; यहां समर्पण है। ज्ञान प्रसार भी खेल की तरह करना है, काम की तरह नहीं। जीव को कर्मों से नहीं रोका जा सकता है, केवल कर्मों को शुद्ध किया जा सकता है। 


४) मुक्ति मोक्ष निर्वाण, भविष्य में नहीं है, अभी है। अज्ञान है इसलिए दिखाई नहीं दे रहा है। विलीनता, प्रकट होना, दोनों मिथ्या हैं, और सब पहले ही हो चुका है। चेतना का अर्थ निष्क्रियता नहीं है, चेतना का आना प्रकाशित कर्म हैं। अज्ञान में खेल भी कर्म हैं, चेतना में कर्म भी खेल हैं। 


जिसकी आध्यात्मिक प्रगति हो गई है वो किसी भी अवस्था में भूत भविष्य कुछ भी जान सकता है, स्मृति समयहीन है और किसी अवस्था पर निर्भर नहीं है। सम्पूर्ण ज्ञान जागृति में भी है, ये भी सुक्ष्म अवस्था ही है। जागृति मिथ्या है यह जानने के लिए सुक्ष्म अवस्था में जाकर कुछ जानने की आवश्यकता नहीं है, जागृत में सम्पूर्ण ज्ञान उपलब्ध है। 


अज्ञानी मिथ्या को सत्य बताता है, जिसको पूर्ण ज्ञान है, वह बिना किसी अवस्था में जाए जान जायेगा की सभी कुछ, सभी अवस्थाएं, केवल मिथ्या हैं। 


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सत्संग १३५, ८ जून २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


सभी अनुभव चित्त के ही अनुभव होते हैं, चित्त केवल परिवर्तन मात्र है, परिवर्तन  संभावना है, और वो संभावना मैं स्वयं हूं।   अनुभव मूल है, व्याख्या के लिए नाद, चित्त बताए गए हैं। 


चैतन्य तत्व आप स्वयं हैं, बाकी सब जड़ है। जीव होने का अनुभव जीवन है। 


शुद्धिकरण योग मार्ग का विषय है, ये उनके लिए है जो ज्ञान मार्ग या साक्षी भाव में स्थित नहीं हो पा रहे हैं। 


सांसारिक व्यक्ति ज्ञान की बातें नहीं झेल सकते हैं। संबंधों को बोझ ना मानें, एक खेल की तरह लें। 


साधक की सफलता ही गुरु के लिए गुरु दक्षिणा है। जो भी आप बाहर ढूंढ रहे हैं, वो आप पहले से ही हैं, स्वयं में देखिए, स्रोत आप ही हैं। मुझे कुछ नहीं चाहिए, सब कुछ तो मैं ही हूं। करोड़पति सड़क पर खड़ा होकर भीख नहीं मांगता है।


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सत्संग १३७, २२ जून २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) मिट्टी को स्वयं का ही अनुभव हो रहा है घड़े के रूप में। अनुभव भी शून्य है अनुभवकर्ता भी शून्य है, इसी कारण अस्तित्व में कुछ भी सत्य उभर नहीं सकता है, जो भी उभरेगा वो मिथ्या, माया या संभावना ही होगा। अनुभवकर्ता संभावनाओं का अनंत सागर है, जिसमें स्वयं को अनुभव करने की क्षमता है। वही अनुभव है, वही अनुभवकर्ता है, दो नहीं हैं, एक ही है। 


मुझे मेरा ही अनुभव होता है और ये अनुभव संभावना मात्र है, संभावना प्रतित होती है। शून्य से उठकर, शून्य में विलीन होता है, और यह शून्य ही दृष्टा है। 


२) सभी अनुभव मानसिक ही हैं, इनको मानसिक इसलिए कहते हैं क्योंकि ये व्यक्तिनिष्ठ हैं, इंद्रियों द्वारा रचित हैं। 


चित्त वृत्तियों का ना दमन करना है ना अति करनी है। जो भौतिक जगत से परे है, जो इस पर निर्भर नहीं है, उसको सुक्ष्म कह दिया जाता है। 


बिना ज्ञान के कुछ नहीं छूटता और जिसको ज्ञान हो गया उसको बंधन नहीं होता है। ज्ञानी या जीवनमुक्त का यही भाव रहता है कि जो है वो अच्छा है, और अनावश्यक कर्म बंद हो जाते हैं। 


३) स्मृति जब प्रकट होती है तब उसको वृति कहेंगे। विचारों में ठहराव नहीं आता है, संतुलन आता है। ज्ञान से चेतना बड़ती है चेतना से ज्ञान बड़ता है, शांति आती है। कुछ करने से नहीं आता है, साक्षी भाव ज्ञान का परिणाम है। जब संस्कार गहरे होते हैं तो वो बार बार दोहराए जाते हैं। 


स्वप्न भी मेरा नहीं है, उसको अपना कहना भी अहम भाव है, स्वप्न चित्त का था। जागृति भी स्वप्न के समान ही है।


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सत्संग १३८, २९ जून २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) वृत्तियों का समूह अवस्था बनाता है। वृत्तियां किस प्रकार की हैं उससे अवस्था निर्धारित होती है। 


मैं ब्रह्म हूं, ये मनुष्य नहीं बोल रहा, ये ब्रह्म बोल रहा है मनुष्य के रूप से। क्योंकि सभी ब्रह्म है इसलिए यह अहम भाव नहीं है। 


२) साक्षी भाव में ज्ञान है, वहां निर्णय लिया नहीं जाता है, उसको देखा जाता है। और उसके आने वाले संभावित फल को भी ज्ञान के प्रकाश में देखा जा सकता है। 


साक्षी भाव में किए गए कर्म का फल तो आता है पर वो बंधन पैदा नहीं करता है। साक्षी भाव में यदि बंधन है भी तो वो लगता ही नहीं है कि वो बंधन है। साक्षी भाव में मैं नहीं है तो जिसका भी जो कुछ हो रहा है सब ठीक है। जब साक्षी भाव नहीं है तो वो तो बंधन बन ही जाता है। 


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सत्संग एक वार्तालाप के कुछ मुख्य बिंदु।


मैं ही माया रूप में प्रकट हूं और मैं ही सत्य रूप में प्रकट हूं। देवी जो जानने से अध्यात्म की शुरुआत होती है, अंत नहीं होता। 


समाज से भागना आध्यात्म नहीं है, उसको स्वीकार करके नियंत्रण में रहना आध्यात्म है। 


सामाजिक मान्यता ना भी मिले तो भी यदि कुछ इच्छा पूर्ति करनी है, यदि शादी नहीं की है, तो कर सकते हैं। आध्यात्मिक व्यक्ति समाज क्या सोचेगा इससे विचलित नहीं होता है। अपनी इच्छाएं आध्यात्मिक लोगों के साथ पूरी कीजिए। सभी इच्छाएं देवी की हैं, उनका दमन या अति करना गलत बात है। संतुलन ही तत्व है जीवन का। 


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सत्संग १४०, १८ जुलाई २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


अहिंसा का मापदंड रखिए, सही गलत का नहीं। फिर साधक को सब माफ है। सांसारिक अनुभव ही आध्यात्मिक हैं, बस उसमें साक्षी भाव जोड़ दीजिए। 


यदि आसक्ति ज्यादा है तो चित्त ही प्रभावित होता है, और चित्त ही कम प्रभावित होता है, अनुभवकर्ता दोनों का साक्षी मात्र है। चित्त पर प्रभाव पड़ता भी है, पर साक्षी भाव में उसपर कर्म नहीं होता है। 


यदि जीवन में असंतुष्टि, दुख, निरसता या कष्ट है तो अभी अज्ञान बाकी है। ज्ञान मार्ग पर, ना ज्ञान को मेरा कहने वाला रहेगा ना अज्ञान को मेरा कहने वाला ही रहेगा। 


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सत्संग १४१, २० जुलाई २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) सामाजिक और व्यक्तिनिष्ठ नैतिकता के नियमों में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। पाप और पुण्य ज्ञानी स्वयं निर्धारित करता है। ज्ञानी पर श्राप का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। 


स्मृति ही ज्ञान और अज्ञान दोनों का कारण है। स्मृति जब कर्म में परिवर्तित हो जाए तो वो संस्कार हैं। 


यदि किसी की अनुचित इच्छा आप पूरी नहीं कर सकते हैं तो उसके लिए अपने आप को दोषी नहीं मानना चाहिए। आप किसी के उपकार के नीचे नहीं दबे हैं, कि उचित अनुचित कुछ भी करना है। जितना आवश्यक है उतना ही करना है। 


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सत्संग १४२, २७ जुलाई २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


अस्तित्व स्वयं अनुभव है, ब्रह्म नाद है, इंद्रियां केवल सीमित कर देती हैं उनको। 


कारण शरीर के स्तर पर भौतिक समय नहीं है। सुक्ष्म अवस्था के प्रयोगों से जागृत अवस्था की माया सिद्ध हो जाती है। सरल होने से ज्ञान का महत्व कम नहीं हो जाता है। 


इंद्रिय जनित सुख विष की तरह हैं, बेहोश कर देते हैं, पूरी तरह से गुलाम बना देते हैं। विषय विष के समान हैं। साक्षी भाव में इंद्रियां आपके दास की तरह काम करेंगी। कारण शरीर में इंद्रियों की वजह से पुनर्जन्म होता है। इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं होने से जीवन दुखों से भर जाता है। देखो इंद्रियां क्या दिखा रही हैं ये देखना आवश्यक है।


ज्ञान मार्ग पर ध्यान से अधिक महत्व शुद्धिकरण पर देना चाहिए। साक्षी भाव में स्थिति के लिए संकल्प और समर्पण अधिक उपयोगी हैं। 


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सत्संग १४३, ३ अगस्त २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) व्यक्तियों, वस्तुओं और इंद्रियों से कोई सुख नहीं मिलता है। 


एक बार परीक्षा देने के बाद, साधक को गुरुक्षेत्र या पुराने जीवन के गुरु संभाल लेते हैं। थोड़ा सा भी यदि ज्ञान प्रसार का परोपकार किया तो साधक हमेशा के लिए गुरुक्षेत्र से प्रेम संबंध में बंध जाता है। एक बार आपने शुरू करके बंद भी कर दिया तब भी संबंध बना रहता है, क्योंकि यह बहुत ही बड़ा पुण्य है।


ज्ञान मार्ग पर ज्ञान प्रसार ही गुरु दक्षिणा है। उसके बाद आपको सब माफ है, जैसे किसी सपने का भाग है। जो ज्ञान प्रसार कर रहे हैं उनके लिए कोई नियम नहीं है।


२) ज्ञान से पता चलता है सत्य क्या है और असत्य क्या है, अनुभव से नहीं। ज्ञान होने के बाद किसी भी समस्या को समस्या के रूप में नहीं देखा जायेगा फिर। मिथ्या में समस्या भी मिथ्या ही है, और उसका प्रभाव बहुत कम हो जाता है मन शरीर पर। हमारी अधिकतर समस्याओं का मूल कारण मैं स्वयं ही होता हूं। कष्ट भी हमें मिलता है हमारे कर्मों की वजह से, वो भी नहीं मिलता तो आपकी प्रगति नहीं होती फिर। जो नहीं मिल रहा है उसके बिना भी संभव है रहना तो यह विरक्ति का संकेत है, फिर जो है या नहीं है, वही ठीक है।


समस्या या तो कर्म फल है या वहां से कुछ सीख लेना है। जीवन ही एक तरह की शिक्षा है, एक अवसर है कुछ सीखने का। यदि परिवार भी आध्यात्मिक होता तो उस कर्म बंधन से छुट्टी नहीं मिलती कभी। जहां प्रेम ना हो वो अनावश्यक बंधन है। जहां आपको सुख मिल रहा है वो कई जन्मों तक रहेगा। 


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सत्संग १४४, १० अगस्त २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


ज्ञान के साथ संसार में लिप्त होना कठिन है। जिसको भी आप महत्व देते हैं अगले जीवन में आप ठीक वही करेंगे, ये बात तय है।


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सत्संग १४५, १७ अगस्त २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


पत्थर में अनुभवकर्ता नहीं है, अनुभवकर्ता में पत्थर है, जैसे चित्र में परदा नहीं है, परदे पर चित्र है। ना जड़ है ना चेतन है, सभी कुछ जीवन है।


कई परतों से मिलकर एक शरीर बनाता है। सगुण मिथ्या है जो प्रकट है, निर्गुण मैं हूं। 


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सत्संग १४६, २४ अगस्त २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


सुक्ष्म अवस्था में जाने के लिए कोई योग्यता नहीं चाहिए, आप पहले से ही उसमें हैं। आसक्ति के कारण अपने आप को बंधा हुआ मान लिया है, जैसे एक भारी पत्थर बांध रखा है। जब संसार से विरक्ति हो जायेगी तो आपका ध्यान अपने आप ही ऊपरी अवस्थाओं में चला जायेगा।


अगर गुरुक्षेत्र की कृपा है तो वो आपका प्रारब्ध आपस में बांट लेते हैं। गुरु हैं तो कोई प्रारब्ध नहीं है, फिर सब खेल है। 


जब तक जीवन में कुछ लक्ष्य है नहीं तो कोई ना कोई सुख की चाहत उठने लगेगी। जब तक अंतर्मन से समाधि का सुख नहीं मिलता, तब तक जीव सुख बाहर ही ढूंढता रहता है। अच्छा है कि ऐसे कर्मों में सुख लिया जाए जिसमें दूसरों का हित हो। 


गुरु के पास झाड़ू, डंडा, शास्त्र और अभय मुद्रा रहते हैं। कारणों के बाहर आ जाना ही ज्ञान है, अस्तित्व कारणहीन है। शून्य ही आदि है और शून्य ही अंत भी है, इसलिए शून्य ही पूर्ण है। जिस दिन शून्य जान लिया उस दिन शून्य हो गया, कुछ करना नहीं है शून्य होने के लिए।


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सत्संग १४७, ३१ अगस्त २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जो तत्त्व नहीं है उसकी जानकारी विज्ञान है, तत्त्व क्या है यह जानना ज्ञान है। 


ज्ञान मार्ग में इच्छा पूर्ति भी आनंद है और उसका पूरी नहीं हो पाना भी आनंद है, इच्छा एक चित्त वृत्ति है। देवी स्वयं इच्छा है, इस वासना के कारण ही सम्पूर्ण श्रृष्टि है। इच्छाएं जीव से कर्म करवाती है, लेकिन मुझसे नहीं, मैं कर्महीन हूं, इच्छाओं का दृष्टा हूं। मैं कर्म और फल दोनों का दृष्टा हूं। इच्छाओं का दमन नहीं करना है, यदि उसमें परोपकार है, तो जो चाहे प्रपंच चाहिए, वो कर सकते हैं।


यदि अनावश्यक कर्म नहीं होंगे तो संस्कार और कर्म का चक्र टूट जाता है। इससे अनावश्यक इच्छाएं आनी ही बंद हो जाएंगी जिसको विकास या आध्यात्मिक प्रगति कहते हैं। 


२) स्मृति या ज्ञान नष्ट नहीं होता है, कुछ भी मेरा नहीं है, ज्ञान या कारण शरीर भी मेरा नहीं है। इतना होने के बाद शांति है, और आनंद है। दृष्टि सीमित है इसलिए बुद्धि छोटे चक्र देखती है, बड़े चक्र नहीं देख पाती है।


रक्षण, भक्षण और प्रजनन, ये मूल प्रवृतियां हैं जो विभिन्न स्तरों पर, जब तक रूप है, तब तक चलती रहती हैं। मैं पहले से ही अरूप हूं, शांत हूं, वृत्तिहीन हूं, बस ज्ञान नहीं हुआ है। शून्य जहां से शुरू होता है वहीं विलीन हो जाता है। सारी यात्रा आपमें ही शुरू होती है और आपमें ही समाप्त होती है। कहीं कुछ आता जाता नहीं है, शून्य ही पूर्ण है। 


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सत्संग १४८, ७ सितंबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


आवेग रूपी अपने स्वार्थ के लिए किए गए संकल्प सबसे कमजोर होते हैं, परहित वाले बहुत शक्तिशाली होते हैं।


पुराने गलत कर्मों का प्रभाव तो आयेगा, उसको साक्षी भाव से देखना है, फिर अपराध भाव नहीं आए इसलिए स्वीकार भाव आना चाहिए, उसके बाद क्षमा भाव, और उसके बाद विवेक जागृत होना चाहिए कि ये अब दोबारा नहीं होना चाहिए।


क्या सही है क्या गलत है इसकी पहचान ज्ञान मार्गी को स्वयं करनी है, कोई नियम नहीं है। 


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सत्संग १४९, १४ सितंबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


यदि कर्ता भाव नहीं है तो कर्म का प्रभाव ना के बराबर ही पड़ेगा। ज्ञानी प्रभावित नहीं होता, बल्कि प्रभाव छोड़ता है। ज्ञानी पर थोड़ा बहुत प्रभाव छूट भी गया तो क्या अंतर पड़ता है, जो भी होता है वो सर्वदा पूर्ण ही होता है। 


जो आवश्यक है वो होने देना है उसमें विघ्न नहीं डालना है, जो अनावश्यक है उसमें ऊर्जा नहीं डालनी चाहिए। 


परिकल्पना उपयोगी है तो प्रयोग कर ली जाती है, इसका अर्थ नहीं कि वो सत्य हो जाए। ध्यान भी चित्त की एक प्रिक्रिया है जिसके पीछे कर्ता कोई नहीं है। जहां आवश्यक है उस अनुसार, चित्त की परतें सक्रिय निष्क्रिय अपने आप होती रहती हैं। वृति को इच्छा से शक्ति मिलती है, और जो वृति शक्तिशाली होगी वहां ध्यान अपने आप पहुंच जाता है। इच्छा और शक्ति पर्यायवाची शब्द हैं, देवी इच्छा रूप में ही प्रकट है। 


प्रयास से ध्यान नहीं होगा, थोड़ा सा प्रेम है, समर्पण है, तो आसान हो जाएगा। मैं अभी मुक्त हूं, ये बात ध्यान में रखते हुए, जो आवश्यक है वो करते रहना है।


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सत्संग १५१, २८ सितंबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


पुस्तक अभिव्यक्ति है ज्ञान की, साधन नहीं है। 


आपके पास अनंत काल है, फिर आज ही क्यों चाहिए कि स्वप्न में चेतना आ जाए। जागृत को ठोस बना लीजिए, बाकी स्वाभाविक रूप से होने दीजिए। प्रयोग केवल प्रमाण लेने के लिए किए जा सकते हैं कि वो भी स्वप्न है और ये भी स्वप्न है। 


वृत्तियों के अंत का अर्थ है कि नाद नहीं रहा, और ऐसा हो नहीं सकता क्योंकि नाद मैं स्वयं हूं। स्वसमानता के कारण विलीनता अभी भी दिखेगी। निद्रा या विलीनता ही ब्रह्म की सही स्थिति है। निद्रा में विकृति होना जागृति है। 


मैं ही कर्ता हूं, मैं ही अकर्ता भी हूं, मैं ही दृष्टा भी हूं, जो भी है वो मैं ही हूं। 


यदि आपके कर्मों का बुरा प्रभाव पड़ने वाला है तो फिर वो नहीं करना है, वो आवशयक नहीं है। जिसको छोड़ना ही है उससे झगड़ा करके क्या फायदा है, उसमें अच्छा बुरा मानकर क्या फायदा है।


अधिकतर जीवन में पीड़ा का आना भी प्रगति का ही मार्ग है। 


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सत्संग १५२, ५ अक्टूबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) ज्ञान का माध्यम केवल गुरु ही होता है। जो नित्य है उसे सत्य कहा गया है, क्योंकि मानदंड ही ऐसा है। जीवन ही अनुभवकर्ता है। 


शरीर लोक और चित्त की परतें एक साथ पाई जाती हैं, अर्थात ये एक ही हैं। अध्यात्म की भाग दौड़ खत्म करने में समय लगता है, ब्रह्म होने में नहीं।


२) ज्ञान मार्ग पर समर्पण का अर्थ है कि बुद्धि का ज्ञान के प्रति जो अवरोध है उसको अर्पित कर देना, यानी अज्ञान है ये स्वीकारना, जानने की इच्छा होना।  


जो असीम है वो अनुभव लेता नहीं है, वो स्वयं ही अनुभव है। असीम को असीम का ही अनुभव होगा, पर इस रूप में नहीं होगा जिस रूप में हम जानते हैं। जैसे जैसे प्रगति होती है तो व्यक्तित्व खोने लगता है। अनुभव में ढूंढना बंद करो असीमित को, तो उसे स्वयं में ही पाओगे। 


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सत्संग १५३, १२ अक्टूबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जागृत अवस्था ही प्रमाण है, बाकी अवस्थाओं को प्रमाण नहीं मानना है। अनुभव के बिना अनुभवकर्ता का ज्ञान नहीं हो सकता है। मैं को यदि हटा दिया जाए तो केवल ब्रह्म है, जो कई रूपों में प्रकट है। 


अनुभव भिन्न नहीं हैं, यदि अनुभवों में भिन्नता दिखती है, तो वो भी मिथ्या है। सब नाद है, एक को वस्तु कह देते हैं, एक को विचार कह दिया गया है आदि। 


२) मैं ही अनुभवकर्ता हूं, और सभी अनुभव मिथ्या हैं, यह जानना ही चेतना है। यदि विचारों भावनाओं का सिलसिला शुरू नहीं करता है, बंद कर देता है, तो वही सही साक्षी भाव है। जागृति में कुछ अनावश्यक ना हो यही जागृति में साक्षी भाव रहने का अर्थ है। 


जब गुरुक्षेत्र से संपर्क हो जाता है तो शंका नहीं रहती की संपर्क हुआ कि नहीं।   हर साधना का अंतिम लक्ष्य साधना से मुक्ति है। 


एक तरह के प्रयोग में भौतिक जगत से ध्यान हटाते हैं बिना नींद में जाए हुए, तो जो सुक्ष्म है वो प्रकट होने लगता है। इससे ध्यान की सीमा बड़ जाती है। 


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सत्संग १५४, १९ अक्टूबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) रक्षण, भक्षण और प्रजनन मौलिक प्रक्रियाएं हैं उत्तर जीविता के लिए। इनमें भी प्रजनन सबसे मौलिक है, जो कि स्वयं देवी हैं। 


सांकेतिक प्रयास से कल्पना में इच्छा पूर्ति बहुत अच्छे रूप से करी जा सकती है, चित्त को पता नहीं चलेगा कि सच या झूठ में क्या भेद है। कहां भागते हो इच्छा पूरी करने के लिए, शांत बैठो जहां इच्छा उठती है वहीं इच्छा पूरी भी हो सकती है।  इच्छा सूक्ष्म रूप में प्रकट होती है और देवी की कृपा है कि वहीं उसको पूरा करने की सुविधा दी गई है। इससे इच्छाएं भी निर्मल हो जाती हैं। 


२) तंत्र में कोई ज्ञान नहीं होगा, वो खेल है लीला में, ज्ञान मार्ग अंत है अध्यात्म का। 


किसी के पीछे भागना नहीं है ज्ञान देने के लिए, केवल सेवा भाव से उपलब्ध हो जाइए। गुरु का कार्य करुणा है, प्रेम है। 


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मुंबई अक्टूबर २२ में हुए सत्संग के कुछ मुख्य बिंदु।


भाग २।


आपके कर्म ही विघ्न बनते हैं मार्ग पर, आप ही विघ्न हो और आप ही उपाय हो। 


जब तक प्रारब्ध में नहीं होता ना मार्ग मिलता है, ना गुरु, ना ही प्रगति, ना साधना होती है। ये सब कुछ पूर्व निर्धारित है। जिसकी इच्छा होती है आध्यात्म की वही प्रगति कर पाता है और उसीपर कृपा होती है। 


भाग ३


कर्मों का पहाड़ अनावश्यक कर्म करने से ही खड़ा हुआ है। आत्मज्ञान के बाद वो स्वाभाविक रुप से छूटने लगेंगे, आपका मन ही नहीं करेगा उन सबमें। 


भाग ४


बाकी सारे मार्ग अद्वैत ज्ञान मार्ग से ही निकले हैं, इसिका बदला हुआ रूप है। 


भाग ५


ज्ञान यही है कि, मैं हूं और मेरा सपना है और सपना भी मैं हूं। स्वप्न और स्वप्न दृष्टा एक ही है, अब कैसे क्यों पूछते हो। यदि दो होते तो कोई प्रक्रिया कोई संबंध होता, मैं ही तो हूं जो हो रहा है। उसमें प्रश्न करने वाला कोई अन्य नहीं है, शून्य है। ये प्रश्न बुद्धि पूछती है, क्योंकि उसे संसार में यही दिखता है, उसी से वो जीवित है। 


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एक बार आप अम्मा के गले मिल लो आपकी मनुष्य योनि समाप्त। गुरु का कार्य सिर्फ सिखाना नहीं है, बहुत कुछ चलता है वहां पर। 


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सत्संग १५५, २६ अक्टूबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


वृत्तियां अनावश्यक नहीं हैं, उनमें अशुद्धियां अनावश्यक हैं। ब्रह्म ही कह रहा है कि मैं मनुष्य रूप में प्रकट हूं। मिट्टी का कोई भी रूप सत्य नहीं है लेकिन मिट्टी सत्य है।


जो उत्तरजीविता के लिए उपयोगी है वो सुंदर दिखता है, और उसको ही नैतिक कह दिया जाता है। अध्यात्म अशुद्धियों, मूर्खताओं का अंत है, वृत्तियों का अंत नहीं है। वृत्तियों को संतुलन में लाना है, अति नहीं करनी है।


जो बताया गया है ज्ञान मार्ग पर उसका प्रमाण ढूंढिए, प्रश्न समाप्त हो जायेंगे। 


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सत्संग १५६, २ नवंबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


मेरा होना कोई अनुभव नहीं है, वो अनुभवकर्ता है। ना ज्ञान रहेगा ना ज्ञानी रहेगा, जिसका ज्ञान हो रहा है बस वो रहेगा। 


घटनाओं का उपयोग करना आना चाहिए, ना कि उनसे डरकर भागना। विशेष अनुभवों की कीमत साधना नहीं होनी चाहिए। जागृति में भी जो हो रहा है वो भी असाधारण है। सपने की मिथ्या को जान लेना ही सपने से मुक्ति है, ज्ञान ही मुक्ति है और कोई मुक्ति है ही नहीं। 


जिसने जागृति की मिथ्या देख ली, वो सपनों में क्यों उलझेगा। दूसरा ना सुख दे सकता है ना ही दुख दे सकता है, जो भी है मेरे ही कर्म हैं, मेरे ही कारण है। गुरु याद दिलाने ही आते हैं कि तुम यहां क्यों आए हो, आपको जगाने आते हैं। 


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सत्संग १५७, ९ नवंबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) अनुभव अच्छे बुरे नहीं होते, अनुभव जब हो जाएं तो बुद्धि उनपर अच्छे बुरे का ठप्पा लगा देती है। 


जीव अपने आपको ब्रह्म नहीं कह सकता, वो ब्रह्म ही कहता है कि मैं ब्रह्म हूं, और जीव के रूप में भी मैं ही हूं। ब्रह्म में सभी संभावनाएं हैं। 


२) मैं पहले से ही पूर्ण हूं, जिसमें ये खेल चल रहा है विकास या पतन का। अज्ञान तो अशुद्धि है ही, ज्ञान भी एक तरह की अशुद्धि ही है। तथ्यों का पहाड़ खड़ा कर लेना ज्ञान नहीं होता, वो भी अशुद्धि है। 


आनंद यानी अभाव, ना सुख ना दुख, जो आपका स्वभाव है। निर्गुणता में जो प्रतीत होता है वो सगुण है, पर वास्तव में वो निर्गुण ही है। ज्ञान प्रसार भी खेल है, लीला है, आवश्यक नहीं है। धर्म यानी जो धरातल है, जो नींव है। 


३) जो अनावश्यक है उसके पीछे भागना भी नहीं है, और जो आवश्यक है उसको त्यागना भी नहीं है। वस्तुएं, संबंध, हों तब भी दुख है, नहीं हैं तब भी दुख है, इसीलिए मध्य मार्ग लेना है। 


संकल्प धारण कीजिए कि जो भी कर्म होगा वो चेतना में होगा, बुद्धि से होगा, ना की पुराने संस्कारों, भावनाओं या आदतों से। आपकी ही कोई आसक्ति होगी, जिसने आपको अभी तक संसार में फंसा कर रखा हुआ है। 


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सत्संग १५७, ९ नवंबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) गुरु में जो गुण या अवगुण दिखते हैं दोनों झूठ हैं, ये शिष्य नहीं जान पाता है। जो आपके सामने अभी उपलब्ध है उसीमें संपूर्ण ज्ञान संभव है। मैं जहां हूं, वहीं आत्मज्ञान है। 


मनुष्य में गुण भिन्न हैं, पर तत्व एक ही है। अनुभवों से संस्कार बनते हैं और संस्कारों से व्यवहार। कोई कर्ता नहीं है, लेकिन चित्त का स्वयं ही वृत्तियों पर नियंत्रण प्रतीत होता है। यानी चित्त की ऊपरी परतें निचली परतों पर नियंत्रण करती हैं। 


२) ब्रह्म के सगुण रूप को ईश्वर कह दिया जाता है। अविद्या या अज्ञान के कारण जीव अपने आप को ब्रह्म से भिन्न मानता है। ज्ञान होने पर सब कुछ ब्रह्म का मिथ्या रूप दिखाई पड़ता है। तुरीया चौथी अवस्था नहीं है, सभी अवस्थाओं का एक हो जाना ही तुरीया है। 


सत्य असत्य बुद्धि द्वारा ही जाना जाता है, और ये भेद द्वैत में ही संभव है। जीवन का उद्देश्य है खुद को जानना, और उसके बाद सब खेल है। ज्ञान होने के बाद अहम का नाश नहीं होता है, अहम भी शुद्ध हो जाता है। 


यदि सत्य ठोस रूप से सामने प्रकट है तो कोई साधना आवश्यक नहीं है। यदि आप अंदर से शांत नहीं हैं तो सभी जगह अशांति ही है। अनेकता में एकता देख पाना ही एकांत है। एक बार गरम तवे को छू लिया फिर साधना नहीं करनी है कि उसको दुबारा नहीं छूना है। 


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सत्संग १६०, ३० नवंबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


अस्तित्व में अनुभव करने का गुण नहीं है, वो स्वयं ही अनुभवकर्ता है। दृष्टा और दृश्य का भेद यदि समाप्त हो जाए तो वही ब्रह्मज्ञान है।


दूसरों की इच्छाओं को पूरा करने के पीछे भागते रहना दुखदाई होता है। अपने जीवन का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में ले लीजिए। 


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सत्संग १६२, १४ दिसंबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) अनुभव मूल है, और स्मृति उसकी वैज्ञानिक व्याख्या है। जो मेरा परिवर्तनीय प्रकट रूप है वो अनुभव है, संपूर्ण अनुभव मिथ्या है, और उसकी व्याख्या भी मिथ्या ही है। 


दृष्टि सृष्टि का नियम चित्त पर लागू होता है, जीव पर नहीं, जीव स्वयं एक अनुभव मात्र है। जीव एक उपकरण है जो सृष्टि में प्रकट होता है, उसकी भी सृष्टि हो रही है। पहले सृष्टि हो जाती है, उसके बाद जीव कहता है मैंने कर दिया। कोई करने वाला नहीं है, केवल देखने वाला है। मनुष्य कर्ता नहीं क्रिया है। कुछ भी पहले से बना बनाया नहीं है, अनुभव होते समय ही वो है, उसके सिवा केवल संभावना मात्र है। 


२) तीन मौलिक प्रक्रियाएं सर्वदा चल रही हैं, रक्षण (निरंतरता), भक्षण (नश्वरता) और प्रजनन (प्रतिलिपि, दोहराव)। चित्त के नियम और चित्त की परतीय रचना जान लेने से माया का मूल ज्ञान हो जाता है। माया भी अज्ञेय है, उसका सत्य नहीं जाना जा सकता है, लेकिन सत्य हुआ जा सकता है। 


जो सपने में चरित्र है, जिसको आप मैं कहते हो, वो सपने के बारे में क्या जान सकता है, उसको स्वप्न दृष्टा कभी नहीं पता चलता है। बुद्धि की सीमा है, वो बस अपने आप को शुद्ध कर सकती है। स्वप्न में भी स्वप्न चरित्र इतना ही जानेगा कि स्वप्न की जो पृष्ठभूमि है, बस वोही सत्य है। 


३) जो आने वाला समय है वो इच्छा बनकर वर्तमान में प्रकट होता है। सपने का ज्ञान सपने में ही हो रहा है, अब इसका क्या अर्थ है। 


साक्षी भाव आवश्यक है, ये वृत्ति होनी चाहिए, ये नहीं,  ऐसा चाहना निरर्थक है। धुंध से आए हैं धुंध में जाना है, सुक्ष्म से आए हैं फिर सूक्ष्म में ही जाना है। एक मानव जीवन, पलक झपकने जैसा है। 


आत्मज्ञान के बाद कोई इच्छा आ गई मन में, तो उसको खेल समझ कर खेल लेना है, कि अभी थोड़ी सी चंचलता बची है मन में। जो भी हो रहा है यदि साक्षी भाव में होगा तो हानिकारक कर्मों से बच जाएंगे। ज्ञान होने के बाद यदि शांति आनंद मौन नहीं आया तो इसका मतलब है कि ज्ञान ही नहीं हुआ है। ज्ञानी न्यूनतावादी होता है, जितना आवश्यक है उतना साक्षी भाव में होते हुए देखता है। 


४) पहले आप युद्ध कर रहे थे, ज्ञान होने के बाद वही एक खेल की तरह हो जाता है, फिर संघर्ष भी संघर्ष नहीं लगता है। ज्ञान का परिणाम सुख नहीं है, शांति है, आनंद आप स्वयं ही हैं। 


जो अभी है वो ब्रह्म है, ब्रह्म शून्यता मात्र है, शून्यता में कौनसा अहंकार आ सकता है। 


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सत्संग १६३, २१ दिसंबर २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


मुझे मेरे स्वरूप की याद आना एक बहुत आनंददायी अनुभव है। 


निद्रा में भी इंद्रियां बंद नहीं होती हैं, जैसे पहले अलार्म की आवाज सुनाई देती है फिर निद्रा खुलती है। 


आत्मज्ञान हो जाना ही बुद्धत्व है, जो बुद्धि के परे है, या जिसकी बुद्धि शुद्ध है।


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