सत्संग 33, 1 May 21, के कुछ मुख्य बिंदु।
1) आनंद अनुभवकर्ता की अवस्था है, और सुख अनुभव है। सभी अनुभव द्वैत हैं तो सुख का विपरीत दुख है, पर आनंद का कुछ विपरीत नहीं है। आनंद चित्त की कोई अवस्था नहीं है, वह मेरा स्वरूप है। यह दुख सुख रहित स्थिति है, जहां केवल परम शांति होती है, जो सत्य है। शांति पटल है जिसपर मिथ्यात्मक सुख दुख आते जाते रहते हैं। अखण्ड शांति या आनंद स्वरूप मैं ही हूँ, यह मेरे ही नाम हैं।
आनंद सर्वदा नित्य है, कभी आता नहीं है क्योंकि कभी कहीं गया नहीं, और गया इसलिये नहीं क्योंकि वह मेरा ही स्वरूप है।
चित्त द्वैत और मिथ्या है। मैं पहले से ही पूर्ण हूँ, इसलिये मुझे कुछ मिलने से सुख नहीं मिलता, या कुछ नहीं मिलने से दुख नहीं होता। अनुभव से यह जाना जा सकता है कि सुख और दुख बराबर ही हैं, दोनों वृत्ति हैं, बंधन हैं।
चित्त दुख को प्राथमिकता देता है, और सुख भुला दिया जाता है। सुख जीव को प्रेरित करता है कुछ करने के लिए, जीवित रहने के लिए। दुख को प्राथमिकता इसलिये देते हैं क्योंकि दुख से पता चलता है कि जीवन को कोई खतरा है। दुख सुख का मूल चित्त में चलने वाले नाद मात्र हैं।
चलचित्र में अच्छी या बुरी घटनायें, दोनों एक तरह का अनुभव हैं, चित्र हैं, बनावटी हैं, मनोरंजन है, आनंद है। अज्ञानवश हम जीवन को रंगमंच की तरह नहीं देखते हैं।
ज्ञानी के लिए हर अनुभव एक मनोरंजन मात्र है, बराबर है। ज्ञानी कर्म करने के लिए सुख दुख का नहीं पर बुद्धि और तर्क का उपयोग करता है। सुख दुख को हटाना नहीं है जीवन से, पर वही करना है जो आवश्यक है।
सुख दुख को अधिक महत्व नहीं देना चाहिए, उसमें कुछ परिवर्तन या बंद करने की भी आवश्यकता नहीं है, दोनों पहले से ही पूर्ण हैं। ज्ञानी समभाव, समचित्त, चेतना या समाधि में रहता है। गधा डंडे या घास के कारण ही चलता है।
सुख दुख को एक प्रसाद की तरह ग्रहण करें, उससे छेड़छाड़ करने की आवश्यकता नहीं है। सुख दुख मनोशरीर यंत्र या चित्त निर्मित है, बाहर से नहीं मिलते हैं। दोनों का कारण और निवारण मैं ही हूँ। प्राकृतिक रुप से जो सुख मिले उसे ग्रहण कर लें, और दुख से कुछ सीख ले लें। कोई भी शारीरिक सुख अध्यात्मिक आनंद नहीं है, दोनों भिन्न हैं।
2) ज्ञानी जानता है कि मेरी स्थिति तो सर्वदा समाधि की ही है, इसलिये वो समाधि के पीछे नहीं भागता है। जबकि योग में ध्यान धारणा समाधि ही लक्ष्य है।
ज्ञान मार्ग पर हम यह जांच करते हैं कि ध्यान करने वाला या यह समाधि को लाने का प्रयास करने वाला कौन है? तो ऐसा कोई नहीं मिलता है। ज्ञान मार्ग पर समाधि के पीछे भागना भी मिथ्या है, क्योंकि अनुभवकर्ता की अवस्था पहले से ही समाधि की है, केवल अज्ञान के कारण यह पता नहीं चलता है।
अनुभवक्रिया या अस्तित्व की मूलभूत स्थिति समाधि की ही है। चित्त वृत्ति अस्तित्व या अनुभवक्रिया को दो में बांट देती है।
यदि यह अज्ञान या मान्यता नहीं रहे कि अनुभवक्रिया आती जाती है, तो यह ज्ञान हो जाता है कि केवल अनुभवक्रिया मात्र ही है। उसमें चित्त वृत्तियां आती जाती रहती हैं, जो की मिथ्या है, वो होकर भी नहीं हैं।
अस्तित्व में जो भी है वो पहले से ही प्राकृतिक रुप से सहज समाधि की स्थिति में ही है, बस यही है। जिस समाधि में समाधि कर्ता नहीं है, वही समाधि है। अज्ञान हट जाने से जो पहले से ही सम बुद्धि है, बीच की अवस्था दिखने लगेगी, वो अनुभवक्रिया ही है। अनुभवक्रिया के सिवा और कोई भी अवस्था नहीं है अस्तित्व की। चित्त वृत्ति के चलते हुए भी अनुभवक्रिया को देखा जा सकता है।
जो चित्त की बांटने वाली वृत्ति है उसको भी अनुभव में मिला दीजिये या अनुभव के रुप में देख लीजिये, इससे सारा बटवारा ही मिट जाता है। अनुभवकर्ता, अनुभव, अनुभवक्रिया, अस्तित्व, ब्रह्मं, आत्मन आदि सब एक ही हैं।
ज्ञान आवश्यक है, चित्त वृत्ति को बंद करना आवश्यक नहीं है। उसको बंद किये बिना भी सहज समाधि दिख जाती है। मेरा स्वरूप निर्गुण है इसको समझने के लिए बहुत प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। जैसे ही हम जान लेते हैं कि सारा अनुभव मिथ्या है, तो अस्तित्व निर्गुण है यह साफ देखा जा सकता है। यही सहज समाधि है।
अनुभवक्रिया या समाधि कहीं आ जा नहीं सकती है क्योंकि वह तो अस्तित्व स्वयं है। जो पहले से ही है उसको पाने में कितना प्रयास लगेगा। जो समाधि के पहले से ही है वही समाधि के बाद भी है। अस्तित्व का स्वभाव या तत्व ही समाधि है, केवल अज्ञान का नाश होता है।
शिव की योगी के रूप में आधी आंख बंद दिखाई जाती है, जो की समाधि की स्थिति है। पूरी बंद निद्रा है, पूरी खुली हुई जागृत अवस्था है। अनंतः मैं ही शिव हूँ।
3) चित्त की जब सीमायें टूट जाती हैं तो एक तरह के विस्तार का भ्रम होता है, ऐसा लगता है कि मैं ही सब जगह हूँ। और यह सत्य भी है, असत्य यह समझना है कि मैं एक जगह, अभी एक बिंदु में स्थित हूँ।
चित्त को एक रस्सी की तरह देख सकते हैं जिसमें दो गांठ या ग्रंथियां हैं। पहली ग्रंथि यह जानने से खुलती है कि 'मैं चित्त नहीं हूँ' और दूसरी यह जानने से खुलती है कि 'मैं यहां इस शरीर के अंदर नहीं हूँ'।
इससे व्यक्तित्व का नाश हो जाता है और हर अनुभव में मैं ही स्थित दिखाई देता हूँ, एक फैलाव सा हो जाता है। यह चित्त की अवस्था है जो थोड़ी देर ही रहती है, और उसके बाद वापस शरीर में स्थिति हो जाती है क्योंकि जीवन के लिए यह होना आवश्यक है।
सूक्ष्म अवस्था के प्रयोगों में जब तक दूसरे लोकों में ध्यान नहीं पहुंच जाता है तब तक एक अवस्था होती है जिसमें केवल आकाश तत्व होता है। यह दो लोकों के बीच की अवस्था है, जहां स्मृति का अनुभव नहीं है। कुछ लोग इसीको समाधि कहते हैं, लेकिन यह भी एक चित्त वृत्ति ही है। यहां विस्तार है, आनंद है, ऐसा लगता है कि सब जगह मैं ही मैं हूँ।
हमारी स्थिति शरीर में एक छोटी जगह प्रतीत होती है उसका कारण है इन्द्रियां। जिससे यह भ्रम पैदा हो जाता है कि मैं कहीं शरीर के अंदर हूँ, जो की जीवन के लिए आवश्यक है।
यह विस्तार की अवस्था माया के बाहर है, जब दूसरे लोक में प्रवेश करते हैं तो फिर माया के नियम लागू हो जाते हैं। शरीर भी अज्ञान के कारण भौतिक प्रतीत होता है, वास्तव में है तो वह भी नाद ही। यह सब तंत्र मार्ग के विषय हैं।
कुछ जीव भी ऐसा कर सकते हैं (जैसे मेंढक) जो शीतनिद्रा (hibernate) में चले जाते हैं।
4) चेतना भी एक तरह का अनुभव ही है, जिसमें हमें ज्ञान होता है कि मैं अनुभवकर्ता हूँ। अपने स्वरूप को जानना चेतना है।
जो भी परिवर्तनशील है वह नाद है, बस एक 'मैं' यानि अनुभवकर्ता ही नाद नहीं हूँ। प्राण, मन, शरीर, ऊर्जा आदि सभी नाद है।
5) सभी अनुभव स्मृति से ही आते हैं, इसमें नया पुराना कुछ नहीं है। जिसमें जागृत अवस्था की स्मृति बनी नहीं है उसको हम नया अनुभव कह देते हैं। जागृत अवस्था में नाद विश्व स्मृति से आ रहा है, वो पहले से ही है। जागृत स्मृति में चित्त इस भ्रम में रहता है कि यह कोई नई घटना है।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। या तो सारी घटनायें पुरानी हैं, जो की एक स्मृति से दूसरी स्मृति में आ गई हैं, पर है तो पुरानी वो। या फिर सभी कुछ नया ही है। नया पुराना भी भ्रम है। सब कुछ पहले ही हो चुका है, ना भूतकाल है ना भविष्य है, समय मिथ्या है।
यदि जागृत स्मृति निकाल दी जाये तो हर घटना नयी दिखेगी, चाहे उसको पहले कितनी बार भी अनुभव किया जा चुका हो। नया पुराना का भ्रम मनुष्य के द्वारा बनाया गया है। यदि जागृत स्मृति में संस्कार पड़े हैं तो वह उसको पुराना समझ लेता है। सब नाद है, तो कौनसा नाद नया है या कौनसा पुराना हो सकता है।
हर अनुभव नया ही होता है। जागृत स्मृति के कारण जागृत अवस्था का सामान्यकरण हो गया है। ज्ञानी या एक छोटे बच्चे की दृष्टि में सभी कुछ नया है, उसपर स्मृति का ठप्पा नहीं लगा है। मिलता जुलता हो सकता है, इसका मतलब यह नहीं है कि वो पुराना अनुभव है। नया पुराना कहना अज्ञान है, उसे छोड़ दें।
हमें वही संवेदना हो सकती है जिसको ग्रहण करने की क्षमता चित्त में पहले से ही है, चाहे वो किसी पहले जीवन काल में हुआ हो। इस जगत में कुछ नया नहीं होता है, सब पहले से ही हो चुका है। और यह भी सत्य है कि हर पल नया होता है, सब कुछ नया होता है।
यह अब विरोधी बात है, और बुद्धि के परे है। इसका कोई उपयोग भी नहीं है। हर अनुभव मिथ्या है, बस इतना जान लेना उपयोगी है।
कोई संवेदना नई है क्योंकि जागृत या सक्रिय स्मृति में पहली बार गई है, और पुरानी भी है क्योंकि चित्त में उसको ग्रहण करने की क्षमता पहले से ही है। अनंत जन्मों से वही चल रहा है। विश्वचित्त में सभी सम्भावनायें पहले से ही हैं।
6) मार्गदर्शन का अर्थ है कि जो बताया जा रहा है बस उतना ही करना है, और जो नहीं बताया जा रहा है वो नहीं करना है। ज्ञान मार्ग पर यदि प्रतिक्रिया होती है तो कोई अशुद्धि है, और ऐसे में थोड़ा समय देना उचित होता है।
चित्त या इन्द्रियों की रचना पर यह निर्भर करता है कि किस तरह के अनुभव होंगे। कितने भी प्रकार के अनुभव ले लें पर सभी मिथ्या ही हैं।
सूक्ष्म लोक में अलग तरह के अनुभव होते हैं, पर जागृत अवस्था में वह दिखाई नहीं पड़ते हैं क्योंकि जागृत इन्द्रियों से वो ग्रहण नहीं किये जा सकते हैं। जैसे एक फाइल एक तरह के ही प्रोग्राम में ही खोली जा सकती है।
अवस्था में निरंतरता स्मृति के कारण होती है और विभिन्न अवस्थाओं में स्मृति पुल बनाया जा सकता है। चित्त, इन्द्रियों, अनुभव आदि अनंत है उनकी कोई सीमा नहीं है, आप प्रयोग करके यह खुद सिद्ध कर सकते हैं। आम आदमी यह नहीं जानता क्योंकि अज्ञान है, कोई रुचि नहीं है, प्रयोग या साधना भी नहीं करते हैं।
इसका उपयोग बस इतना ज्ञान पाने के लिए ही है कि माया, प्रकृति, चित्त, अनुभव, मुझमें आदि इनकी कोई सीमा नहीं है, सब कुछ अनंत है। यदि कोई सीमा दिखती है तो वह अज्ञान के कारण है।
सारा ज्ञान तो अभी भी मौजूद है, पर उसका उपयोग करने वाले बहुत कम लोग हैं। मूल ज्ञान होने के बाद, धीरज और निष्ठा पूर्वक प्रयोग करने चाहिये, तभी उसके फल आयेंगे। सूक्ष्म अवस्था के प्रयोगों से मृत्यु का भय नष्ट हो जाता है। अनुभवकर्ता तो अमर है ही, चित्त जो की मेरा ही रुप है वह भी अमर है, बस चित्त में परिवर्तन होते रहते हैं।
ज्ञान सब जगह है, जिनकी रुचि होती है उनको मिल जाता है। यदि आप किसी साधना के लिए तैयार नहीं हैं तो उसमें गुरुक्षेत्र ही विघ्न पैदा कर देते हैं, क्योंकि उसीमें आपकी भलाई है।
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सत्संग 34, 8 May 21, के कुछ मुख्य बिंदु।
1) वस्तुयें जगत में कहीं नहीं हैं, वस्तुयें चित्त में हैं, चित्त निर्मित हैं, नाद मात्र हैं। स्मृति और इन्द्रियां भी नाद हैं। दृष्टि सृष्टि का नियम हमारी इस मान्यता को नष्ट करता है की जगत या वस्तुयें पहले से ही विद्यमान हैं।
जितना संकीर्ण अनुभव होगा वह उतना ही सत्य प्रतीत होता है। जगत सत्य इसलिये लगता है क्योंकि एक तरह की ही सम्भवाना बार बार प्रकट होती है, जो जीवस्मृति जागृत अवस्था में ग्रहण करती है।
दृष्टि सृष्टि का अर्थ यह नहीं है कि जो मैं चाहूँ वह प्रकट हो जाये, क्योंकि कोई चाहने वाला ही नहीं है। जो भी इच्छायें प्रकट होती हैं वो कारण शरीर की हैं, जीव या व्यक्ति की नहीं हैं। कारण शरीर बीज रुप में है, जबकि जीव वह है जो प्रकट है।
दृष्टि सृष्टि का अर्थ यह नहीं है कि जो कारण शरीर से जीव स्मृति में आये वह जागृत अवस्था में प्रकट हो जाये। ऐसा स्वप्न अवस्था में होता है। कारण शरीर से जो भी नाद आता है वो वासना के रुप में जीव स्मृति में दिखाई देता है, उसकी सृष्टि भौतिक वस्तु के रुप में विश्वस्मृति में नहीं होती है।
सूक्ष्म लोकों में यह सम्भव है कि जो स्मृति में है वह बाहर भी प्रकट हो सकता है। स्वप्न लोक में भी यही होता है, यह नियमबंध नहीं हुऐ हैं। जागृत अवस्था में जो अनुभव हो रहे हैं, उसका नाद महास्मृति से आ रहा है, जिसको जीव स्मृति बहुत अधिक प्रभावित नहीं कर सकती है। विकासक्रम के साथ जीव का स्मृति क्षेत्र बढ़ जाता है और उसका प्रभाव महास्मृति पर भी हो सकता है।
माया की गति बहुत विलक्षण है। मृत्यु लोक में साधक अध्यात्मिक वासनाओं की पूर्ति के लिए आता है।
दर्द होना एक प्रक्रिया है जिसको रोका भी जा सकता है, यह कोई नियम नहीं है। कर्म का नियम है कि यदि कोई नाद पैदा हुआ है तो वह दूसरी नाद रचनाओं से टकरा कर वापस वहीं आता है जहां से वह उठा था।
2) यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। जो मैं हूँ वही अन्य वस्तुओं में दिखाई पड़ता है, यह ब्रह्मज्ञान है। मेरा स्वरूप या अनुभवकर्ता ही अनुभव में दिखाई देता है। ब्रह्मज्ञान वह है जब अनुभवकर्ता और अनुभव के बीच का भेद मिट जाता है, केवल अनुभवक्रिया रह जाती है। कृष्ण यानि अनुभवकर्ता की दृष्टि से गीता पढ़ेंगे तो उसका कुछ और अर्थ समझ में आयेगा।
गुरु आपको आपका प्रत्यक्ष अनुभव दिखाते हैं, शास्त्रों में जो लिखा है उसको पढ़कर आत्मज्ञान नहीं होता है।
3) कर्मों से मुक्ति नहीं मिलती है, लेकिन कर्म बंधन नष्ट हो सकते हैं। चेतना नहीं होती है तो कर्म के बंधन बन जाते हैं। आत्मज्ञान होने से चेतना जागृत हो जाती है, तो कर्म तो वैसे ही होते हैं, पर उनके बंधन नहीं बनते हैं। क्योंकि जीव वो करने के लिए मुक्त होता है जो चेतना से प्रकाशित है।
कोई भी बंधन में नहीं है, केवल यह अज्ञान का अंधकार है कि मैं बंधन में हूँ।
4) सत् का अर्थ होता है तत्व, और जो तत्व नहीं है वह असत् है। जो आता जाता नहीं है वह सत्य है और असत्य का उपयोग प्रतीती के लिए किया गया है। सत् और असत् के बीच में माया है, यह केवल समझाने के लिए कहा गया है। क्योंकि ब्रह्मं निर्गुण है, माया का अस्तित्व ही नहीं है, बस प्रतिति मात्र है, शून्य है, केवल अद्वैत है। ना सत्य है ना असत्य है, सत्य भी है असत्य भी है, यह बुद्धि के परे है, अद्वैत अज्ञेय है।
ज्ञान मार्ग पर दो चरण हैं, पहला चरण है अनुभवकर्ता और अनुभव में भेद समझ लेना और दूसरा है अद्वैत। अनुभवकर्ता वह शून्यता है जिसके प्रकाश में मायावी अनुभव प्रतीत होते हैं।
सब कुछ विश्वस्मृति है और उसमें अनंत सम्भावनायें हैं। बुद्धि माया का हिस्सा है इसलिये, माया को बुद्धि से नहीं जाना जा सकता है। इतना जानना बहुत है कि माया असत्य है और उसके पीछे भागना व्यर्थ है, और इस ज्ञान का अभाव दुख का कारण है।
अनुभव स्मृति पर छाप छोड़ते हैं, पर अनुभव का आधार क्या है, यह नहीं जाना जा सकता है। अनुभवकर्ता, माया आदि क्या हैं, इसका नकारात्मक ज्ञान ही होता है, नेती नेती। मैं ही सब कुछ हूँ, या आप ही सब कुछ हैं, इसके बाद और क्या जानना रह जाता है, यहीं अद्वैत का अन्त हो जाता है।
ज्ञान की सम्पूर्णता ही अज्ञेयता है। अज्ञान का नाश होने पर यहां सभी प्रश्न समाप्त हो जाते हैं और समर्पण भाव आ जाता है। यहां ज्ञान की इच्छा भी नहीं रहती है, और ज्ञान से भी मुक्ति हो जाती है। ज्ञान भी अज्ञान का प्रतिबिम्ब है, जहां अज्ञान है वहां ज्ञान आता है, अद्वैत में ज्ञान नहीं है अज्ञेयता है। अज्ञेयता अंतिम चरण है।
योग मार्ग पर असत्य से शुरू करते हैं और सत्य की ओर ले जाया जाता है। ज्ञान मार्ग पर ज्ञान से शुरू करते हैं, अज्ञान का नाश होता है और उसका फल अज्ञेयता है। क्योंकि ज्ञान नकारात्मक है तो अन्त में अज्ञेयता ही बच जाती है।
ज्ञान भी चित्त निर्मित है, इसलिये सही ज्ञान वह है जो सकारात्मक नहीं है, जो स्मृति पर छाप नहीं छोड़े वह ज्ञान है।
जिसकी जो भावना होती है उसको वही दिखाई देता है। इसलिये कभी कभी साधक को समझाने के लिए गुरु को उसके अज्ञान के स्तर पर जाना पड़ता है। अज्ञान की विशेषता यह है कि उसे सूर्य का प्रकाश भी नहीं दिखता है।
5) जिज्ञासु जानना चाहता है और मुमुक्षु को मुक्ति की अभिलाषा होती है। ज्ञान मार्ग में दोनों आवश्यक हैं। ज्ञान मार्ग पर जिज्ञासा से शुरुआत करते हैं और बाद में जिज्ञासा का भी अन्त हो जाता है।
आलस भी दो प्रकार के होते हैं एक अहम का आलस है कि मुझे कुछ नहीं मिलेगा तो मैं क्यों करूं और दूसरा एक तरह का समर्पण है कि प्रयत्न से प्रगति नहीं होती है, कुछ नहीं जाना जा सकता है। जहां तक आवश्यकता है वहां बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए, और जब उसकी आवश्यकता नहीं रह जाती है, जहां उसकी सीमा है, वहां उसे छोड़ देना चाहिए। बुद्धि जीवन में उपयोगी है, जिज्ञासा से बुद्धि के परे जाया जाता है।
संसारिक व्यक्ति अपनी ऊर्जा नष्ट करते हैं, अध्यात्मिक साधक उतना ही उपयोग करते हैं जितना आवश्यक है। आलसी व्यक्ति में वासनायें बहुत हैं, समर्पण में वासनायें नहीं रहती हैं।
'अनुभवकर्ता है' यह ज्ञान चेतना है, और चेतना का विस्तार चेतना के प्रयोग में है, उसके ज्ञान में नहीं। आत्मज्ञान एक ही बार होता है बार बार नहीं। चेतना एक बार जब ज्ञान के रुप में प्रकट हो जाती है तो उसका उपयोग बहुत जगह किया जा सकता है। चेतना के प्रकाश में जीवन चलाना है, उसके प्रयोग चित्त की हर अवस्था में करने चाहिए।
आत्मज्ञान होने पर चेतना जागृत हो जाती है। इसमें अशुद्धि से विघ्न पैदा हो सकते हैं, जिनको अंतर्शुद्धि या शुद्धिकरण से दूर किया जा सकता है। अशुद्धि अधिकतर नींद के रुप में प्रकट होती है। जो अनावश्यक है उसको हटाना शुद्धिकरण है, कुछ नया नहीं करना है।
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सत्संग 35, 15 May 21, के कुछ मुख्य बिंदु।
1) अनुभवकर्ता अस्तित्व ही है जो अनुभवों का दृष्टा है, पर यहां कोई प्रक्रिया नहीं चल रही है। कर्ता एक अनुभव है, जो कर्म कर रहा है। साक्षी भाव अनुभव नहीं है, जबकि कर्ता भाव एक अनुभव है।
2) अद्वैत में सत्य का मानदंड है कि जो अपरिवर्तनीय है वह सत्य है। यही मानदंड इसलिये है क्योंकि सभी अनुभव अनुभवकर्ता पर निर्भर हैं और
अनुभवों या वस्तुओं का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं दिखता है। कोई भी अनुभव अपने आप में बिना परिवर्तित हुऐ नहीं रह सकता है। केवल अनुभवकर्ता का ही स्वतंत्र अस्तित्व है, वह किसी अन्य पर निर्भर नहीं है।
केवल अज्ञान का नाश होता है, ज्ञान शून्य है, ज्ञान होता नहीं है, अन्त में केवल अज्ञेयता ही बच जाती है। अज्ञान और ज्ञान दोनों ही मल हैं।
शून्यता का अर्थ है कि जो भी अस्तित्व में है उसका कोई तत्व नहीं है। शून्यता का अर्थ यह नहीं है कि कुछ है ही नहीं। शून्यता का अर्थ सर्वथा अभाव नहीं है। यदि तत्व नहीं मिलता है तो उसे अज्ञेय कह देते हैं। ब्रह्मं का भी तत्व नहीं मिलता है इसलिये उसको शून्यता कहते हैं।
ये मान्यता है कि जो प्रतीत होता है उसकी रचना की गई है, उसका कुछ कारण है। यदि यह मान्यता हटा दें तो यह प्रश्न अर्थहीन हो जाता है कि शून्यता से रचना कैसे सम्भव है।
मिट्टी घड़े का उपादान कारण है और कुम्हार निमित्त कारण है। यह दोनों कारण 'अनुभव' के लिये नहीं मिलेंगे। अनुभव का कोई तत्व नहीं है और ना ही कोई प्रक्रिया है, जिससे उसकी रचना को स्थापित किया जा सकता है।
अनुभव की स्थापना केवल अस्तित्व या अनुभवकर्ता को आधार मान कर ही करी जा सकती है। अस्तित्व और अनुभवकर्ता दोनों स्वयं सिद्ध हैं। बुद्धि अनुभव को पकड़ नहीं सकती है, लेकिन स्थापित कर सकती है।
दूसरे तरीके से अनुभव मिथ्या के रुप में भी नहीं है, इसको स्थापित नहीं किया जा सकता है। विचार, कल्पना, वाणी, बुद्धि आदि जिससे भी अनुभव को नकारा जायेगा वो खुद एक अनुभव ही रहेगा। इसलिये अनुभव भी स्वयं सिद्ध है।
3) बुद्धि अनुभूति के परे है, जिसकी अनुभूति नहीं होती है उसको भी बुद्धि पकड़ सकती है। बुद्धि अनुमान में सक्षम है। कलयुग में बुद्धि का नाश उतना नहीं हुआ है जितना कि आचरण का नाश हुआ है।
बुद्धि में अनुशाशन और भाषा शुद्धि आवश्यक है, ज्ञान मार्ग पर चलने वाले साधक के लिए। ऐसा कुछ नहीं करें जिससे बुद्धि भ्रष्ट हो, या अहम भाव को बढ़ावा मिले। नहीं तो आप भावनाओं, विचारों में बह जायेंगे, समय नष्ट होगा और सही से मनन नहीं हो पायेगा। सात्विक, साधारण, आरामदायक, सुखपूर्वक जीवन हो और अनावश्यक कार्यों, प्रतिस्पर्धा आदि से बचना चाहिए।
4) जांचने पर ब्रह्मं या आत्मन का कोई आधार नहीं मिलता है तो उसे शून्यता मान लेते हैं। शून्यता यानि जिसका ना कोई आधार हो, ना कुछ तत्व, प्रक्रिया आदि दिखे और ना ही कोई ज्ञान हो सकता है।
आत्मज्ञान होने से यह भी पता चलता है कि अनुभवकर्ता और अनुभव एक ही हैं और दोनों का तत्व शून्य है, यह सूत्र है। सूत्र से ज्ञान नहीं होगा, इनकी व्याख्या गुरु से समझी जा सकती है।
अनुभवकर्ता और ब्रह्मं को निर्गुण भी कहा गया है। अनुभवकर्ता के जो गुण बताये गये हैं, वो उसके गुण नहीं है, वह उसका स्वभाव है।
गुण आकर चले जाते हैं, स्थायी नहीं रहते हैं, स्वभाव कहीं आ जा नहीं सकता है। जैसे शांती, आनंद, शून्यता आदि अनुभवकर्ता का स्वभाव है गुण नहीं है।
5) 'पहले चित को शांत कर दें उसके बाद मौन होगा', ऐसा सोचना गलत है। दृष्टा या आपका स्वभाव सर्वदा मौन ही है। चित्त में जो भी चल रहा है वो आंतरिक नहीं है, वो भी अनुभवकर्ता के बाहर ही कहीं घट रहा है। यदि चित्त को मैं या मेरा मान लिया है तो मौन नहीं होगा।
साक्षी का साक्षी कोई नहीं होता है, केवल अनुभव का ही साक्षी होता है। बुद्धि में अशुद्धि या अज्ञान एक तरह का विघ्न हैं। केवल पढ़ने या सुनने से ज्ञान नहीं होता है, अपरोक्ष अनुभव और तर्क से उसका प्रमाण देखना आवश्यक है, और यह गुरु के मार्ग दर्शन में ही सम्भव है। मानने से नहीं बल्कि जानने से ही प्रगति होती है।
शून्यता में अभाव नहीं है, अस्तित्व में अनंत, असंख्य सम्भावनायें हैं, जो की अनुभव के रुप में दिखती हैं। अस्तित्व में सब कुछ है, पूर्णता है, और मिथ्या भी अस्तित्व का ही एक हिस्सा है।
विज्ञान का आधार आध्यात्म है, विज्ञान एक छोटा सा भाग है, एक शाखा है आध्यात्म की। विज्ञान परम नहीं है, ज्ञान परम है।
भाषा शुद्ध ना हो तो ज्ञान का संचारण नहीं हो पाता है। बुद्धि भाषा पर बहुत निर्भर है। भाषा शुद्धि से वाक् शुद्धि होती है, यानि आप जो भी कहेंगे वो सत्य ही होगा। अन्त में भाषा को भी छोड़ दिया जाता है क्योंकि सत्य को भाषा में सीमित नहीं किया जा सकता है।
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सत्संग 36, 22 May 21, के कुछ मुख्य बिंदु।
1) ज्ञान मार्ग का लक्ष्य है अस्तित्व, स्वयं, सत्य असत्य, मुक्ति कैसे मिले, मेरा स्वभाव क्या है, अद्वैत क्यों कहा गया है आदि का ज्ञान प्राप्त करना। योग मार्ग पर चित्त के अनुशाषण से भी इन प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं। ज्ञान मार्ग पर यह उत्तर सीधे मिलते हैं।
ज्ञान होने के बाद विरक्ति अपने आप हो जाती है। जैसे यह ज्ञान हो गया है कि फल सड़ा हुआ है तो उसे फेंक देते हैं, खाते नहीं हैं।
श्रवण के बाद मनन में गुरु की सहायता लगती है। कभी कभी ज्ञान होने के बाद, आपकी अवस्था ज्ञान की हो जाती है, जिसको निधिध्यासन भी कह सकते हैं। ज्ञान मार्ग का फल है आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान, कर्म बंधन / दुखों से मुक्ति, अनावश्यक कर्म छूट जाते हैं, चेतना बढ़ जाती है आदि। ज्ञान मार्ग में बुद्धि, विवेक, जिज्ञासा, मुमुक्षुत्व आदि गुणों का होना जरूरी है।
सभी अनुभव इन्द्रियों के माध्यम से ही होते हैं। स्मृति, चित्तवृत्ति, इन्द्रिय और फिर अनुभव होते हैं।
उपरति का अर्थ है कि सांसारिक कार्यों में अधिक रुचि नहीं होना, जितना आवश्यक है उतना ही करना।
अनुभव सत्य असत्य नहीं होते हैं। सत्य असत्य का निर्धारण बुद्धि मानदंड
के अनुसार करती है, जो की पूरी तरह से व्यक्तिनिष्ठ है। अनुभव या माया, दोनों अस्तित्व ही हैं। अद्वैत में सत्य भी है, असत्य भी है, और दोनों का अभाव भी है। यही परम सत्य है कि अस्तित्व के संदर्भ में सत्य असत्य दोनों ही अर्थहीन हैं।
2) जीवन का लक्ष्य सुख और मुक्ति ही है। मनुष्य केवल अपने आप से ही प्रेम कर सकता है, किसी अन्य से नहीं। जब सब में मुझे मेरी ही छवि दिखाई देती है, एक ही आत्मन सबमें दिखाई देता है, तभी सच्चा प्रेम होता है। नहीं तो वो स्वार्थ है।
अज्ञान दुख का कारण है। अहम एक वृत्ति मात्र है जो शरीर को बनाये रखने के लिए उपयोगी है। अज्ञान के कारण यदि अस्वस्थ अहम बढ़ जाये तो वो भी दुख पैदा करता है। जो शासन करना चाहता है वो मनोरीगी है।
सभी मार्ग शिखर की ओर पहुंचते पहुंचते, एक ही हो जाते हैं। ज्ञान मार्ग और भक्ति दोनों समर्पण भाव में ले जाते हैं।
सुख द्वैत में है, चित्त की एक अवस्था है, आता जाता है। आनंद अद्वैत है, कहीं आ जा नहीं सकता है, मेरा स्वभाव आनंद है।
3) अज्ञान माया का भाग है। अज्ञान मिथ्या है, आकर चला जाता है। अज्ञान का मूल माया है, और माया का मूल क्या है, वो नहीं जाना जा सकता है। अस्तित्व का स्वभाव पूर्णता है, उसमें ज्ञान भी है, अज्ञान भी है और दोनों का अभाव भी है।
माया की दो शक्तियां हैं, आवरण और विक्षेप, यानि माया छुपाती है और वास्तविकता को उलटा कर देती है। जब अद्वैत द्वैत में बदलता है, तो उसमें ज्ञान अज्ञान दोनों आ जाते हैं। अज्ञान का ना होना ही ज्ञान है।
अस्तित्व में समयहीनता है, इसलिये जो भी हो रहा है है वो पहले ही हो चुका है। माया में भी कुछ सुधारना नहीं है, सब पहले से ही पूर्ण है। मनुष्य जीवन को उलटे सीधे कर्मों में समय नहीं गंवाना चाहिये।
यदि साधक में उपयुक्त गुण हैं, अशुद्धियां नहीं रहीं, परिपक्वता और गुरु कृपा से, आत्मज्ञान ब्रह्मज्ञान सहज ही हो सकता है। जैसे आत्मज्ञान के बाद यह मनन किया कि 'दो क्यों हैं', तो ब्रह्मज्ञान सहज हो सकता है। अज्ञान बादल की तरह है, जल्दी ही बह जाता है, जबकि नीला आकाश प्राकृतिक है।
शून्यता से अज्ञान आता है और फिर शून्यता रह जाती है। अस्तित्व का स्वभाव ज्ञान नहीं है, कुछ होना नहीं है, अस्तित्व का तत्व नहीं मिलता है, केवल शून्यता है। जब तक अज्ञान है तभी तक लीला है, इसलिये यह कहा गया है कि विश्वचित्त में भी अज्ञान है।
जब अज्ञान होता है तो स्वप्न आता है, जिसको जीवन भी कहते हैं। चित्त माया है, जो है ही नहीं उसका विलय भी नहीं हो सकता है। यदि घर में भूत नहीं है तो उसको भगाया नहीं जा सकता है, केवल अज्ञान दूर किया जा सकता है कि भूत कहीं नहीं है।
4) आत्मज्ञान होने पर शरीर एक अनुभव या छाया मात्र दिखाई देता है, कि ना मैं शरीर हूँ और ना ही यह शरीर मेरा है। यह शरीर मैं नहीं हूँ, इसमें भी अहम भाव वापस आ गया है। जैसे दूसरों की सेवा करते हैं, वैसे ही शरीर का भी एक वाहन की तरह ध्यान रखना चाहिए। अहम को शरीर का दास नहीं, पर रक्षक बनाना है।
अद्वैत का अर्थ है कि अस्तित्व, मूल, तत्व आदि एक है, दो नहीं है। द्वैत का अर्थ है कि अस्तित्व कभी एक के रुप में दिखाई नहीं देता है। जैसे 0 = -1 + 1, यानि द्वैत का मूल अद्वैत है।
द्वैत में दो ही मूल तत्व हैं, अनुभव और अनुभवकर्ता। अनुभवकर्ता एक है बदलता नहीं है, जबकि अनुभव अनंत हैं और बदलते रहते हैं। पहले चरण में द्वैत समझ लीजिये, दूसरे चरण में द्वैत अद्वैत में बदल जायेगा।
5) जैसे विचार हैं, वैसे भाव भी चित्त वृत्ति ही हैं। ज्ञानी का लक्ष्य भाव पर नियंत्रण पाना और आनंद स्वरूप में स्थित रहना है। जैसे स्थूल होता जाता है उसपर नियंत्रण कम होता जाता है, विचार - भाव - पीड़ा - स्थूल शरीर।
सबके गुरु गुरुक्षेत्र हैं, जो की आकाश तत्व में विद्यमान हैं। गुरु व्यक्ति केवल एक माध्यम होता है। ज्ञान मार्ग में, जो भी आपको ज्ञान दें, वो ही आपके गुरु हैं। ज्ञान गुरुक्षेत्र से आता है, व्यक्ति से नहीं आता है।
शास्त्र पढ़कर बहुत लोग पंडित हो जाते हैं, पर ज्ञानी नहीं हो पाते हैं। शास्त्रों में जो भी लिखा है वो बिलकुल सही है, पर जो लेने वाला है उसकी बुद्धि में अशुद्धि है। शास्त्रों से बुद्धि शुद्ध नहीं होती है, गुरु के निर्देशन में यह सम्भव है।
संसार में निर्वाण भी है क्योंकि संसार में शून्यता है। जिसने संसार में शून्यता देख ली तो उसको निर्वाण से क्या मतलब है, सब कुछ यहीं है। अद्वैत में यह बताया गया है कि माया को जान लेने से माया में ही मुक्ति है, मैं पहले से ही मुक्त हूँ।
बुद्धि के प्रशिक्षण के लिए ध्यान बताया गया है, कि बुद्धि एकाग्र होकर एक जगह केंद्रित हो सके तो मनन अच्छी तरह से हो सकता है।
6) चित्त वृत्ति, चित्त में नियमित रूप से चलने वाली प्रक्रियाएं हैं, जैसे विचार, भाव, अहम, वासनायें आदि, जो एक वृत्त की तरह चलती रहती हैं।
जब गुरु और शिष्य के सत्य के मानदंड मिल जाते हैं तो ही गुरु के वचन सत्य होते हैं।
सभी कर्म पहले ही हो चुके हैं, कर्म हैं पर कोई कर्ता नहीं है। अद्वैत के स्तर पर समयहीनता है, इसलिये यह कह दिया जाता है कि सब कुछ पहले ही हो चुका है। या फिर ना कुछ हुआ है ना कभी कुछ होगा, बस प्रतीत होता है कि कुछ हो रहा है। जब तक यह सपना चल रहा है तब तक कर्म भी करने हैं, नहीं तो सपने का अन्त हो जायेगा।
कर्म यह भली भांति जानते हुऐ करने हैं कि कर्ता कोई नहीं है। जो है वो पहले से ही है, जो होना है वो पहले से ही हो चुका है। यह अनादि और अनंत है। कर्महीनता है, यानि जो कर्म कर रहा है वो मिथ्या है, और जो कर्म हो रहे हैं वो भी मिथ्या है। यह समझ ज्ञान के द्वारा सम्भव है। कर्म से अकर्म की ओर जाना चाहिये, ऐसा कर्म करें जो कर्म का नाश कर दे। आत्मज्ञान होने के बाद जीवन साधारण हो जाता है।
अनुभवक्रिया में अनुभव और अनुभवकर्ता का योग है, वहां अनुभवकर्ता का भी विलय हो गया है। अनुभवक्रिया ही अस्तित्व है।
सत्यापन कर लेने के बाद, साक्षी भाव और चेतना में ध्यान देना या स्थिर होना ही मुख्य कार्य रह जाता है।
7) व्यक्ति या शरीर का उपयोग उससे मुक्ति के लिए ही है। जीवन का लक्ष्य जीवन से मुक्ति है। नाव का उपयोग नदी के पार जाने के लिए करना है, उसके बाद उसे छोड़ देना ही समझदारी है। उसके बाद उस नाव का या शरीर के तत्व का उपयोग कोई और कर लेगा।
जो जीवन के उपर उठ जाये, वही जीवन का आनंद ले सकता है, नहीं तो लोग अपने जीवन से ही परेशान हैं। मरने से पहले ही शरीर से मोह त्याग देना चाहिये।
स्मृति नाद से बनी है, नाद स्मृति से नहीं बना है। नाद का अर्थ है परिवर्तन, जबकि स्मृति स्थायी नाद है। स्मृति, कर्म, संस्कार एक ही हैं।
करी हुई साधना बीज रुप में हमेशा रहती है। जब सही वातावरण मिलता है तो फिर शुरू हो जाती है। आध्यात्मिक भाव से जीवन जियें तो मृत्यु के समय भी वही भाव रहेगा, और कुछ नहीं करना है। साधना कब तक करते रहेंगे, साधना बंद करने का भी सोचिये। जब लक्ष्य समझ आ जाता है, तो साधना का भी अन्त दिखाई देने लगता है।
आध्यात्म में कुछ छोड़ना नहीं है, पर सब छूट जायेगा। जब नींद खुलती है, तो कोई सपने को पकड़कर बैठा नहीं रहता है। शून्यता में शून्यता मिल गई, तो अब क्या रह गया।
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सत्संग 37, 29 May 21, के कुछ मुख्य बिंदु।
1) जिस तरह के हम कर्म करते हैं उससे हमारे अनुभव प्रभावित होते हैं। इसलिये कर्म से ज्ञान पर प्रभाव होता है और ज्ञान से कर्मों पर प्रभाव पड़ता है। अच्छे कर्म करने से अच्छे अनुभव मिलेंगे, शांति होगी और समय बचेगा आध्यात्मिक कार्यों के लिए। बुरे कर्म का बुरा प्रभाव दूर करने में बहुत समय नष्ट हो जाता है।
दूसरों के कर्मों का प्रभाव ज्ञानी पर भी होता है, प्रतिक्रिया भी होती है, पर यह सब पूर्ण चेतना में होता है। ज्ञानी वह करेगा जो आवश्यक है, जबकि अज्ञानी मूर्खतापूर्ण कार्य करेगा।
यदि साधक में तैयारी है, योग्यता है, और थोड़ा प्रयास करने से, गुरु जल्दी ही मिल जाते हैं।
2) ज्ञान का अभाव अज्ञान है। अन्त में, 'आप क्या हैं' वो होना जरूरी है, जानना जरूरी नहीं है। अभी आपने अपने आप को कुछ और मान रखा है, इस अज्ञान का हटना जरूरी है। जब अपने सही स्वरूप को पहचान लिया तो उसके बाद शब्दों के पीछे भागते रहने का कुछ अर्थ नहीं है, फिर ज्ञान को भी त्यागा जा सकता है। जैसे नदी पार करने के बाद नाव को छोड़ देना चाहिए।
अस्तित्व में पूर्णता है, यानि अस्तित्व में ज्ञान भी है और अज्ञान भी है। अस्तित्व में अंधेरा उजाला, सुख दुख, ज्ञान अज्ञान आदि सभी कुछ है। इतना अज्ञान नष्ट हो जाये कि उससे होने वाला दुख दूर हो जाये, उतना ही बहुत है।
बुद्धि का दोष या अशुद्धि अज्ञान है, जैसे मान्यतायें, धारणायें, अंधविश्वास आदि, और इनको दूर भी किया जा सकता है। अज्ञान दूर इसलिये करना चाहते हैं, क्योंकि वह दुख का कारण है।
आध्यात्म का लक्ष्य जीवन को सुखी करना नहीं है, पर लक्ष्य यह है कि जीवन से ही मुक्ति हो जाये।
3) गुरु द्वारा बताये गये नैतिक कार्यों और नियम पालन करने से जीवन सरल हो जाता है और बुद्धि से अशुद्धियां दूर होने लगती हैं। अनैतिक कार्य करते रहने से आध्यात्म में रूचि नहीं हो पाती है।
ना कुछ भौतिक है ना मानसिक है, सब एक है, सब नाद है, चित्त है, स्मृति है जो अनेक रूपों में प्रकट है। भय, वासना, भावनायें, अहम आदि जो जीवन के लिए आवश्यक है वो सभी जीवों में प्रकट हो जाता है। प्रकृति ने सब बहुत अच्छा किया है, पर यदि मनोविकार आ जाता है तो उसको दूर कर लेना चाहिए। बुद्धि और चेतना से इनमें संतुलन बनाया जा सकता है। भावनायें बुरी नहीं है, पर जीवन में संतुलन होना आवश्यक है।
4) जिसकी चेतना जागृत हो गयी है, चित्त मिथ्या है, जो यह जानता है उसके लिये सब एक चलचित्र जैसा है। जीवन एक रंगमंच बन जायेगा जिसमें आप भी कलाकार हैं। चित्त अनुभवकर्ता की नकल करना चाहता है, वो अनुभवकर्ता बनना चाहता है। चेतना के प्रकाश से चित्त अपने आप सही जगह आने लगता है और उसे संसार में उतनी रुचि नहीं रहती है।
चित्त को संसार में सुखी रोटी खाने में या भोग में बहुत रस आता है। जब चित्त ज्ञान का अमृत चख लेता है तो उसे कचरे में रस नहीं आता है। संसार त्यागा नहीं जा सकता है, उसका त्याग हो जाता है। ज्ञान प्राप्त कर लीजिये, बाकी सब अपने आप हो जायेगा। ज्ञानी का सम्पूर्ण जीवन ही ध्यान हो जाता है, तो वह क्या साधना करेगा?
कुछ विशेष नहीं करना है, ज्ञानी साधारण जीवन को ही चेतना के रस में डूबा देता है, जैसे चाशनी में मिठाई।
5) ऐसा कुछ भी नहीं है जो अपरिवर्तनीय नहीं है। केवल अनुभवकर्ता अपरिवर्तनीय है, क्योंकि वो कोई वस्तु नहीं है, वो शून्य है। और जिसमें परिवर्तन हो भी रहा है वो भी शून्य ही है। जो शून्य है, अस्तित्व स्वयं है, जो अद्वैत है, उसमें ना परिवर्तन होता है ना ही ठहराव है, और उसमें परिवर्तन भी है और बदलाव भी है, उसके बारे में कुछ भी बोलना व्यर्थ है।
अनुभवकर्ता अस्तित्व स्वयं है, जिसको चित्त ने अनुभव से थोड़ा अलग कर दिया है। चित्त ने अनुभव और अनुभवकर्ता में भेद कर दिया है। पर अस्तित्व में कोई भेद नहीं है, अस्तित्व में ऐसा कुछ भी नहीं है जो शून्य ना हो। अब शून्यता को क्या कहा जा सकता है, ना उसमें कोई परिवर्तन है और ना ही वो ठहरा हुआ है। जो परिवर्तनीय है वो तो मिथ्या है ही, जिसको अपरिवर्तनीय कहते हैं वो भी अज्ञान है। अस्तित्व अज्ञेय है, शून्य में शून्य ही जाना जायेगा।
शून्यता में जानने का कुछ नहीं है, शून्यता हुआ जा सकता है, जो मैं पहले से ही हूँ। होना आवश्यक है जानना नहीं। पहले अज्ञान है, फिर आता है ज्ञान, फिर ज्ञान का भी कोई प्रयोजन नहीं रहता, तो जो बच जाता है वो आपका घर है।
इसके आगे कुछ नहीं जाना जा सकता है, फिर शब्दों के जाल में फंसना व्यर्थ है। जो आपकी सही स्थिति है, वहां क्या शब्दों के द्वारा पहुंचा जा सकता है? अब वाद विवाद, पांडित्य आदि का भी कोई अर्थ नहीं रहता है। मुझे किसी भी चीज से क्या फरक पड़ता है, मैं तो वो हूँ जो मुझे होना चाहिए, यह है अज्ञेयता का भाव।
6) यदि कर्म सही है, नैतिक है, तो ग्लानि नहीं होगी, बल्कि प्रसन्नता होगी।सबक यह है कि इस तरह के कर्म दोबारा ना करें जिनसे बाद में ग्लानि का अनुभव हो। मूल कारण को हटाने से पीड़ा नहीं होगी। सबक मिल गया है, तो अब स्वयं को भी क्षमा करना आना चाहिए।
जैसे जैसे अनुभव होते हैं, बुद्धि, तर्क, अनुमान की क्षमता बढ़ती है। इससे वो ज्ञान भी हो सकता है जो अभी अनुभव में नहीं है। यह जीवन के लिए उपयोगी है। तार्किक क्षमता का जब उपयोग और प्रयोग किया जाता है अनुभव पर, तब ज्ञान होता है। अनुभव को जब तर्क की आग में तपाया जाता है तो वह सोना बनता है। जैसे जैसे ज्ञान बढ़ेगा तो बुद्धि बढ़ेगी और बुद्धि बढ़ेगी तो ज्ञान बढ़ेगा।
7) चित्त विचार, बुद्धि, वस्तुओं, सम्बन्धों आदि का एक संग्रह है, लेकिन जब इनका स्रोत ही मिथ्या है तो आगे क्या रहा? ज्ञान नया नहीं है, अज्ञान में नयापन है। कुछ नयापन लगता है क्योंकि अज्ञान है। जब चित्त विकास कर जाता है तो उसके लिये कुछ भी नया नहीं रहता है, प्रश्न भी समाप्त हो जाते हैं, या उत्तर अपने आप मिलने लग जाते हैं। अज्ञान समाप्त हो जाने के बाद और कौनसी प्रगति की इच्छा है?
यह स्थति अंहकार के लिए नीरस है, पर यही शांति है, शून्यता है। सिनेमा के परदे में खालीपन है, शून्यता है, पर अहंकार एक ही चलचित्र बार बार देखना चाहता है। आध्यात्म में प्रगति होने पर ज्ञान भी एक खिलौना हो जाता है।
आध्यात्म में किसी को खींच कर नहीं लाया जा सकता है। जो भी होता है वह पूर्ण ही है, सांसारिकता भी आध्यात्मिकता है। संसार में भी निर्वाण है, थोड़ी देर का खेल है। परदा तो अभी भी खाली है, जो खेल चल रहा है वो मिथ्या है, उसका कोई सत्य नहीं है। देखने वाला ही खेलने वाला है, मैं ही देख रहा हूँ, मेरे ही रूपों को। इसलिये कई दर्शन में माया को भी सत्य मान लिया गया है।
नीरसता, ज्ञान, अज्ञान, संसार आदि सब कुछ पहले से ही पूर्ण है। कुछ आ गया परदे पर तो देखना है, कुछ नहीं आया, तो भी देखना है, अब रहा क्या है करने के लिए? इसलिये ज्ञानी का जीवन बहुत साधारण और सरल होता है। यह सरलता अनुभवकर्ता या अस्तित्व के स्वभाव की अभिव्यक्ति है। इस सरलता का ज्ञान होने के बाद यह जीवन में दिखाई देने लगती है। सिनेमा को बंद करने की जल्दी क्यों है, वो तो अपने आप बंद हो ही जायेगा।
जो भी कार्यक्रम में है, वो आत्मज्ञान की तैय्यारी ही है। भाषा और वाकशुद्धि होते होते, अन्त में वो मौन में बदल जायेगी।
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जो ज्ञानी है, जिसने जान लिया है कि मैं सर्वव्यापि हूँ, उसका क्या ठिकाना होगा।
जो मैंनें कहा था उसको थोड़ा और अच्छे तरह से लिख दिया है, गुरु भी ऐसे योग्य शिष्य को ढूंढते हैं।
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सत्संग ३८, ५ जून २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
1) जो भी प्रकट है वो अनुभव है। तीन ही तरह के अनुभव होते हैं, जगत का, शरीर का या मानसिक अनुभव। सारे अनुभव अन्त में मानसिक ही हैं, एक तरह के ही हैं। सभी अनुभव चित्त के ही अनुभव हैं।
जो भी प्रकट है उसीको चित्त कह देते हैं। दो ही चीज हैं, चित्त और चित्त का दृष्टा, यानि अनुभव और अनुभवकर्ता। सत्य स्वयंसिद्ध है, अपरोक्ष है, सामने प्रकट है।
जो प्रकाश का स्रोत है वो अनुभवकर्ता है, जो प्रकाषित हो रहा है वो अनुभव है। अनुभवकर्ता वो है जिसको अनुभव हो रहे हैं।
2) अनुभव और अनुभवकर्ता एक साथ ही मिलते हैं, उनका अलग अलग स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। लेकिन दोनों एक दूसरे में बदल नहीं सकते हैं। मुझे वस्तु का अनुभव होता है, वस्तु को मेरा अनुभव नहीं होता है। अनुभव को अनुभव नहीं हो सकता है। यह द्वैत का स्तर है।
अद्वैत के स्तर पर भी दोनों एक दूसरे में नहीं बदलते हैं। अद्वैत में केवल इतना कह सकते हैं कि दोनों का विलय हो गया। दो नहीं हैं, दोनों के अभाव में जो बचा उसको अस्तित्व, ब्रह्मं, शून्यता, अनुभवक्रिया आदि कहा गया है।
अद्वैत का ज्ञान नहीं होता है। अद्वैत में सत्य भी है, असत्य भी है, और दोनों का अभाव भी है।
जैसे सागर की गहराई निश्चल है, लहरें बदलती रहती हैं, लेकिन पानी के स्तर पर इनमें कोई भेद नहीं है। ऐसे ही मिट्टी नहीं बदलती है, और घड़े का बदलता हुआ नाम रुप है। उदाहरण से या किताब पढ़कर ज्ञान नहीं होता है, ज्ञान उससे होता है जो अपरोक्ष रुप से सामने है।
केवल होना आवश्यक है, जानना नहीं है। जानने के लिए अद्वैत को दो में बांटना पड़ता है। अद्वैत दो में टुटकर भी टूटता नहीं है, केवल द्वैत प्रतीत होता है।
जब चित्त वृत्ति को भी अनुभव के रुप में देख लिया जाता है, तो उसीको चित्त वृत्ति निरोध कह सकते हैं। जब यह ज्ञान हो गया कि मुझसे भिन्न कुछ नहीं है, तो वही ब्रह्मज्ञान है।
3) स्वयं को जानना ही आध्यात्म है, की क्या है जो अपरिवर्तनीय है। मैं चित्त नहीं हूँ, सब मिथ्या है, यही आत्मज्ञान है। हर बार वहां आ जायीए जो नहीं बदलता है, जब तक चेतना स्थायी नहीं हो जाती है।
सफाई चित्त करता है, बुद्धि से बुद्धि को काटा जा रहा है, सब चित्त के स्तर पर ही हो रहा है, इसका भी अनुभव हो रहा है अनुभवकर्ता को। अहम ही कह रहा है कि मैं अब नहीं हूँ। अनुभवकर्ता कुछ चाहता या करता नहीं है, वह स्वयं अखण्ड शांति और आनंद स्वरूप है।
मानना नहीं है, देखना है, जानना है। और अंततः जानना भी नहीं है, होना है, जो आप पहले से ही हैं। सत्य छूटेगा नहीं, और असत्य ठहरेगा नहीं। ज्ञान सरल है उसमें प्रयास नहीं लगता है। जो खुद को नहीं जानता है तो वो दूसरों का मार्गदर्शन कैसे करेगा?
4) बच्चों में जिज्ञासा का अन्त नहीं करना चाहिए, उसे जीवित रखना चाहिये। बच्चों में ज्ञानी के संस्कार डालने चाहिये, उन्हें खोजी बनायें।
सहज समाधि में चित्त वृत्ति शांत हो जाती है। जैसे छोटा बच्चा दर्पण में अपना चेहरा देखने पर थोड़ी देर रोना बंद कर देता है। चेतना जागृत होते ही चित्त की वास्तविकता दिख जाती है।
अद्वैत सर्वदा द्वैत के रुप में ही दिखाई देगा, लेकिन यह जाना जा सकता है कि अद्वैत ही है, अज्ञेयता है। अन्त में केवल अनुभवक्रिया मात्र ही है, जो की मौन है, और वो अभी भी है। अनुभवक्रिया में चित्त वृत्ति लगभग शांत होने लगती है, और अनुभव एवम अनुभवकर्ता में भेद मिटने लगता है।
5) अस्तित्व को स्वयं का अनुभव हो रहा है, बस यह कहा जा सकता है। अनुभव होता है, अनुभव माध्यम नहीं है, बल्कि अस्तित्व स्वयं अनुभव है।
सारा ज्ञान अनुभव से आता है, सत-चित-आनंद अनुभवकर्ता के नाम हैं, इनका अनुभव नहीं होता है, इसलिये वो अज्ञेय है। ब्रह्मं अज्ञेय है क्योंकि उसका अनुभव माया के रुप में होता है, सत्य या वस्तु के रुप में नहीं होता है।
ब्रह्मं हुआ जा सकता है, जाना नहीं जा सकता है। ब्रह्मं को जानने के लिये दो होना पड़ेगा। जानने वाले में और जो जाना जा रहा है, उसमें कोई दूरी नहीं है, दो नहीं हैं, इसलिये उसको अज्ञेय कहा गया है। वस्तु में और वस्तु को जानने वाले में भेद होना चाहिए तभी ज्ञान होगा। ब्रह्मं अद्वैत है और उसमें यह भेद नहीं है, अनुभव और अनुभवकर्ता में।
अनुभवकर्ता स्वयम्भू है, यानि उसका कोई कारण नहीं दिखता है, कोई प्रक्रिया नहीं दिखती है जो उसको बना रही है।
व्यक्ति नहीं है, मैं चित्त नहीं हूँ, यह आत्मज्ञान है। दो नहीं हैं, अद्वैत है, यह ब्रह्मज्ञान है।
6) ज्ञान चित्त या स्मृति में होता है। लेकिन चित्त में यदि स्मृति नहीं बनती अनुभवकर्ता की, तो उसका ज्ञान कैसे होगा?
पातंजलि ने भी बताया है कि स्मृति, विकल्प, निद्रा आदि प्रमाण के साधन नहीं हैं। ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से या अनुमान से सामने होना चाहिए, तभी वह ज्ञान है। जो सामने है वो ब्रह्मं है जिसको अनुभवक्रिया भी कह सकते हैं।
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हिंदी सत्संग 8 Jun 21
जिसको आत्मज्ञान नहीं हुआ है उसको जीव मिथ्या दिखेगा। जिसको ब्रह्मज्ञान हो गया है उसके जीव ब्रह्मं दिखेगा। ब्रह्मं मिथ्या भी है और सत्य भी है, सगुण भी है और निर्गुण भी है। और क्योंकि अद्वैत है तो दोनों नहीं हैं।
जीव ब्रह्मेव ना परः, यह अद्वैत के स्तर पर कहा गया है।
विचारों का बंद होना आध्यात्म नहीं है, चेतना का होना आध्यात्म है। बुद्धि का उपयोग करके बुद्धि से परे जाना है, बुद्ध होना है। आज्ञा चक्र तक मनुष्य के हाथ में है, उसके आगे नहीं है। चेतना के बाद सब अपने आप होगा, क्योंकि कोई करने वाला ही नहीं है।
चेतना जागृत होने के बाद कुछ करने को रह ही नहीं जाता है, कोई साधना नहीं है जो चेतना से उपर कहीं ले जा सके। चेतना में बने रहिये, बाकी सब अपने आप होगा। चेतना में किये हुऐ कर्म का कोई फल नहीं आता है, वो जली हुई रस्सी की तरह है। चेतना के अभाव में अच्छा कर्म भी बंधन का कारण बन जाता है।
कर्ताभाव और प्रयास त्याग दीजिये, समर्पण में रहना है। शांती होनी चाहिये, एक दो प्रश्नों के उत्तर नहीं भी आते तो भूल जाये उन्हें, क्या करना है सब कुछ जानकर। जो खो गया था वो तो मिल गया है, अब किस तरह की साधना कर रहे हो।
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सत्संग ३९, १२ जून २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) सत्य असत्य, नित्य अनित्य आदि में भेद जानना विवेक है। बहुत शास्त्रों में 'मोक्ष क्या है', इस ज्ञान को विवेक कहा गया है।
साधक के चरित्र और आम आदमी के चरित्र में बहुत अन्तर होता है। ज्ञान मार्ग पर ज्ञान दान ही सबसे बड़ी सेवा है, इससे बड़ा पुण्य कोई और नहीं है।
२) तन्मात्रा और नाद दोनों परिकल्पना हैं। तन्मात्रा के प्रत्यक्ष दर्शन या अनुभव होते हैं, नाद के नहीं होते हैं। नाद को सांख्य में महत् या महातत्व कहा गया है। हर इन्द्रिय से सम्बंधित एक तन्मात्रा है, जैसे रंग, गंध, स्वाद आदि तन्मात्रायें हैं, यानि सबसे छोटी मात्रा या माप।
आंतरिक या सूक्ष्म इन्द्रियों के माध्यम से जो अनुभव होते हैं, वो भी तन्मात्रा हैं। नाद अनुमानित है, ऐसा अनुमान लगाया गया है कि अनुभव नाद रचनाओं से बने हैं।
३) यदि अद्वैत या ज्ञान मार्ग समझ में नहीं आ रहा है तो अन्य मार्ग जैसे सांख्य, बोध, ध्यान, योग, तंत्र, कर्म आदि मार्ग का थोड़ा सहारा ले लिया जाता है। सभी मार्गों को ज्ञान मार्ग की दृष्टि से देखा जा सकता है।
ज्ञान मार्ग पर, शुद्ध अद्वैत जो शंकराचार्य और उपनिषद पर आधारित है उसको ही बताया गया है।
४) अहम का भ्रम 'किसीको' नहीं होता है, जीव भ्रमित है इसका अनुभव अनुभवकर्ता को होता है। अनुभवकर्ता अज्ञान, अहंकार आदि का भी साक्षी है। भ्रम यानि यह मान लेना कि मैं शरीर, मन, व्यक्ति, वस्तु आदि कुछ हूँ। जब यह ज्ञान होता है कि मैं यह सब नहीं हूँ, तो वही ज्ञान का प्रकाश है, या आत्मज्ञान है। पुराने अज्ञान या भ्रम के हटने पर, अनुभवकर्ता इस प्रकाश का भी साक्षी है।
कोई भी विचार या गतिविधि है, उसकी पृष्ठभूमि में केवल आनंद ही होता है, आनंद आपका स्वभाव है। दृष्टा की स्थिति सर्वदा आनंद की ही होती है।
इच्छा पूर्ति में सुख इसलिये प्रतीत होता है, क्योंकि इच्छाओं के होने से जो प्रताड़ना है, जो बेचैनी होती है, वो इच्छा पूर्ति होने पर, थोड़ी देर के लिए शांत हो जाती है। इससे आनंद की अनुभूति जो बादलों में ढक गई थी, थोड़ी देर के लिए बाहर आ जाती है। आनंद के स्रोत में सीधे जाना ज्यादा समझदारी है।
५) ज्ञान अनुभव से होता है, चित्त का ज्ञान चित्त में ही होता है। जो भी अनुभव हो रहे हैं उनका व्यवस्थिकरण, या सम्बंध चित्त में ही बनते हैं, वही ज्ञान है। अनुभव का अर्थ जानना नहीं होता है, ज्ञान का अर्थ जानना है। सारे अनुभव चित्त के ही अनुभव हैं।
चित्त का ज्ञान होने पर चित्त से आसक्ति टूटती है, की मैं चित्त नहीं हूँ। चित्त में जो होता है वो मैं नहीं हूँ, और ना ही कुछ मेरा है। इस तरह से जो रह जाता है, जो खाली है, जो शून्य है, वो मैं हूँ। ज्ञान आपको खाली कर देता है।
चित्त का ज्ञान भी चित्त के अनुभव से होता है, और चित्त का ज्ञान अनुभवकर्ता को ही होता है। चित्त को कोई अनुभव नहीं होता है।
६) अनुभवकर्ता और अनुभव, या अव्यक्त और व्यक्त दोनों का तत्व शून्य है। इसलिये कह देते हैं कि मुझे मेरा ही अनुभव हो रहा है, क्योंकि मैं भी शून्य ही हूँ।
जब इच्छा हो गई तो वो व्यक्त हो गया है, अव्यक्त नहीं रहा। अव्यक्त की व्यक्त होने की सम्भावना तो हमेशा से है। संसार का निर्माण नहीं होता है, संसार प्रतीत होता है। प्रतिति की ना कोई प्रक्रिया है और ना ही कोई कारण है, केवल सम्भावना मात्र है। ना कुछ व्यक्त है, ना कुछ अव्यक्त है, सब शून्य है।
७) साक्षी भाव, कर्म या क्रिया नहीं है। जो आवश्यक है वो कर्म अपने आप हो जाते हैं। साक्षी भाव में रहने में कोई प्रयास नहीं है, कर्म करने में प्रयास लगता है।
अज्ञान का प्रारम्भ या अन्त दोनों का कोई कारण नहीं है। अस्तित्व में सभी कुछ कारणहीन है, कोई प्रक्रिया या उदेश्य नहीं है। ज्ञान अज्ञान सब एक साथ है, सम्भावना मात्र है, समयहीनता है।
८) मैं क्या हूँ यह होने के लिए कोई प्रयास नहीं लगता है, मैं जो नहीं हूँ वो होने के लिए प्रयास लगता है। एक बार ज्ञान का रस चख लिया तो फिर अंधकार में जाने के लिए बहुत प्रयास लगेगा।
बूंद बूंद से बांध पर दबाब बनता है, जब बांध भर जाता है तो उचित समय पर टूट जाता है। पिछली करी हुई साधना कभी बेकार नहीं जाती है।
९) मोक्ष, कल्याण, आनंद आदि की कामना बाकी सभी कामनाओं का अन्त कर देती है। आध्यात्म में मुमुक्षत्व की प्रबल इच्छा होना अच्छा है। आध्यात्म मार्ग पर आने की इच्छा का विकास नहीं किया जा सकता है, वो तो कृपा है।
पहले दुख नहीं रहेगा, फिर जो 'दुखी' है वह भी नहीं रहता है।
१०) संकल्प के द्वारा सृष्टि में घटनाओं में कुछ बदलाव किया जा सकता है। स्वयं को बदल लीजिये, बाकी सब संकर्षण के नियम के कारण अपने आप बदलने लगेगा। संकल्प से चित्त में बदलाव होता है, जिससे अनुभव भी बदलने लगते हैं। अस्तित्व में सभी सम्भावनायें हैं।
स्वप्न का अर्थ है मेरा अपना ही है स्वप्न जगत। चेतना जागृत होने पर, स्वप्न में जो भी संकल्प है या इच्छा है, वैसा ही होने लगता है। ऐसे ही देव लोक में देव जो भी संकल्प लेते हैं तो उनके लोक में घटनायें उसी अनुसार बदल जाती हैं।
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गुरुक्षेत्र से सुबह और सोने से पहले, प्रार्थना करने से कि मेरी चेतना बनी रहे, इससे बहुत लाभ होता है।
आशू का ज्ञान ऐसा चमका की एक दो दिन में जमीन आसमान का अन्तर पड़ गया उनमें।
जब आप आज्ञा या चेतना पर पहुँचेंगे तो कोई मार्ग नहीं बचेगा, फिर कोई और साधना नहीं रहेगी।
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सत्संग, १५ जून २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
अनुभव असत्य है पर अनुभव का अभाव असम्भव है। अनुभव स्वयं अस्तित्व है। मैं व्यक्ति हूँ, यह सबसे बड़ा अज्ञान है।
होना जरूरी है, जानना जरूरी नहीं है। ना जानते हुऐ भी हुआ जा सकता है।
श्रवण मनन निधिध्यासन से ज्ञान आता है, ज्ञान से चेतना आती है। कुछ करने से नहीं आती है चेतना, जब आत्मज्ञान हो जाता है तो चेतना अपने आप प्रकट हो जाती है। चेतना का अर्थ है कि मैं चित्त नहीं हूँ, मैं अनुभवकर्ता हूँ, इस अवस्था में रहना चेतना है। अनुभवकर्ता क्या है, इसका किताबी ज्ञान चेतना नहीं है।
चेतना भाव है, विचार नहीं हैं चेतना में, जबकि ज्ञान विचारों के रुप में संग्रहित है। चेतना वर्तमान में है, वो स्मृति में नहीं मिलती है। 'चेतना क्या है', यह जानने का प्रयास करना स्मरण नहीं है। जो भी चित्त वृत्ति चल रही है वहां से ध्यान हटा कर, 'मैं क्या हूँ' इसपर ध्यान ले जाना है बस, यही चेतना में स्थिति है, यही स्मरण है।
दो ही सम्भावनायें हैं, या तो ध्यान चित्त वृत्ति पर है या फिर अनुभवकर्ता पर होता है। यदि एक जगह से ध्यान हटेगा तो दूसरी जगह ही जायेगा, और कोई विकल्प नहीं है। इसलिये इन्द्रियों को विष कहा गया है, बस यह विष में आसक्ति ना रखें। ध्यान को सूक्ष्म करते जाते हैं, तो अन्त में ध्यान अनुभवकर्ता पर ही पहुंचता है, जो की सूक्षतम तत्व है। इसलिये चेतना युक्त ध्यान होना चाहिए, जो की समावेशी ध्यान है।
अस्तित्व सीमित नहीं है, अनुभव सीमित है। मैं सीमित नहीं हूँ, अनुभव की सीमा को यदि मेरी सीमा मान लिया जाये, तो लगता है कि मैं सीमित हो गया हूँ। यही अज्ञान है।
किसी को जाके ज्ञान नहीं देना है, शांती का अनुभव करना है।
जन्म मृत्यु पर नियंत्रण मोक्ष है।
चित्त विसत्य है, यानि माना हुआ सत्य है। आप चित्त को बदलें समय बदल जाता है।
अणु का कोई स्वरूप नहीं होता है, वो जैसे नापा जा रहा है वैसा बन जाता है, जो उपकरण दिखाते हैं वैसा दिखता है। अणु शून्य है, परिवर्तन है, या नाद है ऐसा कह सकते हैं। नाद को जब नापा जाता है इन्द्रियों के माध्यम से, वो अनुभव में आता है, उसीको तन्मात्रा भी कहा गया है।
चित्त बदल गया तो अनुभव बदल जाता है, दृष्टा नहीं बदलता है। पदार्थ नहीं है, ऊर्जा भी नहीं है, केवल नाद है जो पराभौतिक परामानसिक है, सम्भावना मात्र है।
जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है, इसलिये न्यूनतावादी बनें। माया में दोहराव है, ज्ञानी उससे अनासक्त होकर अपने तत्व में लीन रहता है।
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सत्संग ४०, १९ जून २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
1) जगत, सभी शरीर, मन आदि अनुभव हैं, और मेरा मूल तत्व अनुभवकर्ता या साक्षी है। जैसे लहरों का मूल तत्व पानी है, पर पानी का मूल तत्व लहरें नहीं हैं।
अनुभवक्रिया में अनुभव, अनुभवकर्ता, चेतना आदि सभी कुछ सम्मलित है, उसमें कुछ भी जोड़ना सम्भव नहीं है, बस यह मेरे होने की स्थिति है।
कारण शरीर वो स्मृति है जो तरह तरह के रुपों में अनुभव का माध्यम होता है।
2) पूर्णता सर्वदा है, यदि आने जाने वाली वस्तुओं, शरीर, स्मृति आदि से आसक्ति नहीं हो, तो अभी भी विलीनता है, अभी भी आनंद है, शून्यता है, निर्मलता है। जो भी प्रतीत हो रहा है उसके आप दृष्टा मात्र हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि जो प्रकट है वो विलीन होता है और फिर से प्रकट हो जाता है। जैसे मिट्टी घड़े का रुप लेती है और घड़ा फिर मिट्टी में मिल जाता है, घड़ा केवल नाम रुप है, प्रतिति है, पर हमेशा तो केवल मिट्टी ही है।
सभी वासनायें कारण शरीर से ही आती हैं, थोड़ी देर के लिए रहती हैं फिर शांत हो जाती हैं।
3) यदि अज्ञान है, बुद्धि में अशुद्धि है, तो वो गलत तर्क या कुतर्क पैदा करेगी। अज्ञान से विज्ञान अच्छा, विज्ञान से ज्ञान अच्छा और ज्ञान से अज्ञेयता अच्छी।
नाद यानी परिवर्तन, इसलिये नाद से जो भी बना है वो नित्य नहीं है, अनित्य है। गति नाद का स्वभाव है, यदि गति नहीं है तो वो एक सम्भावना मात्र है।
साक्षी भाव यानी चित्त में निर्मलता आ जाती है और उसके आर पार देखा जा सकता है।
4) अस्तित्व में सत्य भी है, असत्य भी है और दोनों विलीन भी हैं, समयहीनता है, कारणहीनता है। अस्तित्व नित्य है। अनुभवकर्ता द्वैत में होने के बाद भी, वह अस्तित्व के सबसे पास है, उसमें भी निरंतरता का गुण है।
माया वो है जो प्रतीत होता है, और जो प्रतीत होता है वो अनित्य है। सत्य असत्य का मानदंड एक तरह का उपकरण है, आत्मज्ञान होने के बाद या अपने स्वरूप को पहचान लेने के बाद, इनका कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है।
सत्य असत्य स्वैच्छिक और व्यक्तिनिष्ठ मान्यता है। जब यह जान लिया कि मैं क्या हूँ तो उसको सत्य मान लिया जाता है। क्योंकि जो अज्ञेय है उसको सत्य या असत्य कहना भी सही नहीं है। और जो जीवन के लिए आवश्यक है वो सापेक्षिक रुप से व्यावहारिक सत्य है, उसमें भी सत्य असत्य का विभाजन नहीं किया जा सकता है।
चित्त की जागृत अवस्था को ही हम जीवन कहते हैं, उसमें कुछ जानने का नहीं है, उसमें सब असत्य है। और मेरा स्वरूप भी शून्य है उसमें भी कोई तत्व जानने के लिए नहीं है।
5) यदि ज्ञान हो गया है तो ना व्यक्ति है, ना कर्ता है, ना कर्म है और ना कुछ कर्म फल है। अनुभवकर्ता भी ना कोई कर्म करता है और ना ही उसे कुछ फल मिलता है। मैं चित्त के नियमों का दृष्टा हूँ, उसमें कर्मों का नियम भी चित्त का एक नियम है।
काल्पनिक जीव काल्पनिक कर्म करता है और काल्पनिक फल भोगता है। ज्ञान होते ही, ना कर्म है, ना बंधन है। कर्म का नियम टूटता नहीं है, पर ज्ञान के माध्यम से उससे उपर उठा जा सकता है।
जो मुक्त है वो हमेशा मुक्त है और जो बंधन में है वो हमेशा बंधन में ही रहेगा। जो बंधन में है, ज्ञानी उसमें आसक्त नहीं होता है। अशुद्धि, अज्ञान के हटते ही सभी नियम विलीन हो जाते हैं। जिसपर नियम लागू हैं वो हमेशा रहेगा, पर वो मैं नहीं हूँ।
6) मूल ज्ञान या आत्मज्ञान होने के बाद, समर्पण भाव आ जाता है, जिसमें प्रश्न नहीं रहते हैं, या उनके उत्तर साथ साथ प्रकट हो जाते हैं, कोई संघर्ष नहीं रहता है। इस अवस्था में आनंद है, शांति है, प्रश्न उत्तर दोनों निरर्थक लगते हैं। क्या होगा उत्तर जानकर भी, और साधक कुछ करता हुआ सा नहीं दिखता है।
समर्पण, त्याग, विरक्ती आदि किया नहीं जाता है, हो जाता है, इसमें कोई प्रयत्न या संघर्ष नहीं लगता है। यह कोई कर्म नहीं है, कोई विधि नहीं है, यह एक भाव है, जो की ज्ञान का परिणाम है।
शुरुआत में गुरु की आवश्यकता पड़ती है। गुरु गलती बताते हैं, शिष्य का काम है उसको सुधारना। समर्पण भाव आने के बाद, गुरु और शिष्य में कोई भेद नहीं रह जाता है।
आत्मज्ञान ब्रह्मज्ञान होने से, सभी मार्गों का अन्त हो जाता है। फिर कोई साधना नहीं बची, कुछ जानने को नहीं रहा, फिर वो करना है जो प्रिय है। जो समर्पण भाव में है वो पहले से ही लक्ष्य पर है। बेचैनी है, अशांति है, यानी कुछ अज्ञान शेष रह गया है।
7) अज्ञेयता में शांती है, ना जानते हुऐ भी समर्पण भाव होता है। मैं स्वयं प्रकाषित हूँ, होने से जाना जाता है, बुद्धि से नहीं जाना जा सकता है। शब्द माध्यम हैं अज्ञेयता तक पहुंचने के लिए, निशब्द मैं ही हूँ, मौन मेरा स्वभाव है।
अज्ञान शब्दों की खिचड़ी है। शुद्धि होने से अज्ञान का नाश होने लगता है, उसके बाद केवल मौन, सन्नाटा बचता है। पूर्णता, शून्यता आदि भी केवल शब्द मात्र हैं, अज्ञान और ज्ञान दोनों मल हैं, दोनों के परे निर्मलता है, समर्पण भाव है।
आप राजा हैं और सड़क पर पड़े हुए हैं, आपको बस अपने स्वरूप में स्थित हो जाना है। फिर बुद्धि भी आपकी दास है, सम्पूर्ण चित्त आपके अधीन है। फिर ज्ञान है या अज्ञान है, उससे क्या अन्तर पड़ता है। बुद्धि में कब तक अटके रहोगे, बुद्ध कब होगे।
गुरु केवल इतना ही बताते हैं कि यह वृत्ति चल रही है, उसको देखो और चेतना में स्थिर हो जाओ। चरण तीन के बाद बुद्धि का कार्य जगत में है, आध्यात्म में नहीं।
8) अस्तित्व, ब्रह्मं, अनुभवक्रिया, समाधि, अद्वैत आदि एक ही हैं। बुद्धि शुद्ध है तो, जैसे ही ज्ञान के साधन और सत्य के मानदंड बताये जाते हैं, वैसे ही अनुभवक्रिया में स्थित हुआ जा सकता है। जब सत्य असत्य मनगढ़ंत हैं, तो होना ही बचता है, जानना नहीं बचता।
माया का अन्त नहीं होगा, मुक्ति नहीं होगी, कुछ विलय नहीं होगा, बस सूर्य चमक रहा है और जिसपर भी चमक रहा है वो चमकता रहेगा। मैं ही वो चैतन्य स्वरूप सूर्य हूँ।
ज्ञान मार्ग पर घटना, खाली होना प्रगति है। ज्ञान को ज्ञान से ही काट दिया जाता है। तर्क का उपयोग तर्क से उपर उठने के लिए किया जाता है। जब यह समझ लिया कि हर अनुभव मिथ्या है, तो केवल जो अनुभव नहीं है उसपर ध्यान स्थिर होने लगेगा। सत्य वो है जो अपरिवर्तनीय है, यह भी एक मान्यता है, स्वयं के नित्य स्वरूप को पहचानने की।
9) व्यक्ति गुरु नहीं है, गुरु केवल गुरुक्षेत्र हैं। गुरु व्यक्ति केवल माध्यम है गुरुक्षेत्र से सीधा सम्पर्क कराने के लिए। गुरु प्रश्न के साथ आते हैं और उत्तर के साथ चला जाते हैं। गुरुक्षेत्र में केवल करुणा है और वह केवल अज्ञान मिटाना चाहते हैं।
गुरुक्षेत्र के लिए कोई नियम नहीं हैं, वो माया को काट सकते हैं, उनमें अनंत सम्भावनायें हैं। लेकिन वो कम से कम करते हैं, बाकी प्राकृतिक रुप से होता है। जैसे माली केवल पानी, खाद आदि देता है, पौधा अपने आप बढ़ता है।
तांत्रिक वासनापूर्ति चाहता है, और साधक वासनाओं से मुक्ति चाहता है।संकर्षण का नियम भी यही है, संकल्प बना लीजिये, विश्वचित्त की शक्ति वहां बहकर आ जाती है। जैसे पानी नीचे की तरफ अपने आप बहता है।
गुरुक्षेत्र जहां जैसी आवश्यकता होती है वैसे ही प्रकट हो जाते हैं, व्यक्ति को गुरु नहीं मान लेना चाहिए।
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सत्संग २२ जून २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) सम्पूर्ण ज्ञान अपरोक्ष अनुभव और तर्क के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। जानकारी और ज्ञान में भेद जानना बहुत महत्वपूर्ण है।
परिवर्तन स्मृतियों की तुलना है जो वर्तमान में होती है। परिवर्तन समय में नहीं होता है, यह कालहीन है। परिवर्तन नहीं होता है, यह प्रतीत होता है। नाद का प्रमाण परिवर्तन है। जो भी परिवर्तित होता है वह अस्थायी है, इसलिये द्वैत के स्तर पर परिवर्तन को असत्य माना गया है। अद्वैत के स्तर पर सत्य असत्य परिभाषित नहीं किया जा सकता है।
जीव या मैं सर्वदा ब्रह्मं ही हूँ, अज्ञान के नाश से जीव जान लेता है कि मैं ही ब्रह्मं हूँ।
चेतना जागृत करने के लिए प्रयास नहीं करना है, यह एक तरह से प्रयासहीन प्रयास है। कुछ करना नहीं है चेतना जागृत करने के लिए, ज्ञान और संकल्प बहुत है। गुरु का निर्देश छोटा सा है, स्मरण रखना की मैं क्या हूँ।
मैं बंधन में नहीं हूँ, मैं सर्वदा मुक्त ही हूँ। मुक्ति शब्द अनुभवकर्ता के लिए उपयोग नहीं किया जाता है, क्योंकि अनुभवकर्ता तो सर्वदा मुक्त ही है। जब तक अज्ञान है तब भी बंधन होता नहीं है, केवल प्रतीत होता है।
यदि जगत, वस्तु, शरीर, मन आदि से तदात्म्य नहीं रहा, तो बंधन मुक्ति की कोई चिंता नहीं रहती है। जो बंधन में है वो भी परिपूर्ण है, उसे भी स्वीकार करना है, तभी सच्ची शांती का अनुभव होगा जीवन में।
यदि मृत्यु नहीं होती तो विकास भी नहीं होता। देव योनि में ना दुख है ना मृत्यु है, तो विकास भी रुक जाता है। मेरा ना विकास होता है, ना विनाश होता है, मैं सदा नित्य स्थायी हूँ।
२) आत्मज्ञान होने के बाद कोई साधना नहीं बचती है, केवल आनंद पूर्वक अपनी दृष्टा अवस्था में स्थित रहना है।
जगत, शरीर, बुद्धि आदि को पहचान कर उनकी सीमाओं को जैसा है वैसा ही स्वीकार करना चाहिए। सीमित प्रतीत होते हुऐ भी मैं असीमित ही हूँ, मैं ही सब कुछ हूँ, और सब कुछ मुझमें है।
कल्पना कीजिये कि यदि लहरों में भी इन्द्रियां होती तो वो भी अपने आप को एक भिन्न जीव समझतीं। कारण शरीर का प्रकट रुप जीव है।
ज्ञान से चित्त बदलता है, और चित्त के बदलने से वह व्यवहार में भी प्रकट होने लगता है।
३) जागृत अवस्था को स्वप्न के संदर्भ में सत्य मानते हैं। यानी जागृत अवस्था को विसत्य भी कहा जा सकता है। जागृत अवस्था को जान लीजिये की स्वप्न है, और व्यावहारिक रूप से मान लीजिये की वह सत्य है।
जिसे हम जीवन कहते हैं वो केवल अनुभवों की शृंखला है, मिथ्या है। स्मृति यानी मिट्टी, सभी मनोशरीर उसी मिट्टी में से उठते हैं और उसीमें विलीन हो जाते हैं।
कारण शरीर की स्मृति घटना के रुप में नहीं आती हैं, वो वासनाओं के रुप में प्रकट होती हैं। जो वासनायें इस जीवन में प्रकट हैं, वो पिछली स्मृतियों का सार है, अर्क है।
अस्तित्व का कोई कारण नहीं है, कोई लक्ष्य नहीं है, लीला है, इसमें जो भी प्रतीत होता है वो मिथ्या है। मिथ्या का कारण भी मिथ्या ही होगा। अस्तित्व अज्ञेय है, और वो मुक्ति, वो आनंद, मैं ही हूँ। अब करने के लिए क्या रह गया है।
४) चेतना के प्रकट होने से चित्त में यदि कोई अनावश्यक प्रतिक्रिया हुई है तो वो शांत हो जाती है।
ज्ञान अज्ञान को भी त्यागना है वृत्ति मानकर, अज्ञेयता मेरा स्वभाव है।
धर्म का अर्थ होता है सत्य या स्वभाव। जो स्वधर्म पर चले उसका जीवन सफल है।
यह जीवन भी स्वप्न समान ही प्रतीत होता है, पर इस स्वप्न से जागा नहीं जा सकता है क्योंकि स्वप्न देखने वाला पहले से ही जगा हुआ है। केवल यह अज्ञान दूर किया जा सकता है कि यह स्वप्न नहीं है। यह स्वप्न चलता रहेगा अनंत काल तक क्योंकि स्वप्न के अलावा कुछ और अनुभव में नहीं आयेगा।
केवल स्वप्नों की अनंत शृंखला है, यह समाप्त नहीं होगा। मुक्ति का अर्थ केवल इतना ही है कि यह जान लेना कि यह स्वप्न है, बस यही मुक्ति है। मैं स्वप्न का दृष्टा हूँ, स्वप्न चरित्र नहीं हूँ, यही मुक्ति है।
यदि चित्त की प्रतिक्रिया देखने से मन शांत होने लगे तो उसे चेतना का प्रमाण मान सकते हैं। चेतना में शांती के साथ साथ ज्ञान भी होता है। कभी अशांत वातावरण में भी यदि यह ज्ञान हो की यह सब मिथ्या है, तो भी चेतना जागृत है। चेतना का प्रमाण ज्ञान है, यदि चेतना के साथ ज्ञान नहीं है तो उसे चेतना नहीं कहा जा सकता है।
५) जीव को आसक्ति होती है, जहां उसे कुछ मिलता है, जहां उसको कुछ फायदा हो रहा है, वहां जीव को आसक्ति हो जाती है।
एकता का ज्ञान या सब कुछ मैं ही हूँ, यह प्रेम है, यहां कोई सम्बंध या बंधन नहीं है। प्रेम मेरा धर्म है, प्रेम मेरा स्वभाव है। जबकि जीव प्रेम नहीं कर सकता है। कई परम्पराओं में ईश्वर को ही प्रेम माना गया है, क्योंकि सब एक ही है और वही प्रेम है। आसक्ति पशुवृति है और, प्रेम 'अहम ब्रह्मस्मी' यह ज्ञान है।
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जो ज्ञान प्रसार कर रहे हैं, उनके पीछे मैं अपना संकल्प डाल देता हूँ। आपको चेतना में बिठाना ही मेरा लक्ष्य है।
स्वप्न में चेतना जागृत होते ही पता चल जाता है कि ये सब नाटक चल रहा है या फिर नींद खुल जाती है।
ब्रह्मचर्य क्या है?
ब्रह्म हो जाना। स्वयं को जानना कि मैं ब्रह्म हूँ।
ब्रह्मचर्य का पालन क्यों करते हैं?
वही बता सकते हैं। ज्ञानी कुछ नहीं करता, दृष्टा मात्र है। जो चेतना में होता है वो सही है। जो अंधकार में होता है, वो चाहे कितना भी बड़ा कार्य हो, व्यर्थ है।
वासना पूर्ति क्यों आवश्यक है?
आपके लिए आवश्यक नहीं तो नहीं करना है। जो वासना आवश्यक है वो पूरी होकर रहेगी। आज दमन किया तो कई जन्म लेने होंगे उनको पूरा करने के लिए।
गलत आदत और वासना पूर्ति में कैसे भेद करें, दोनों एक जैसी प्रतीत होती हैं?
जिससे दुःख हो, पीड़ा हो, या दूसरों को हानि हो वो गलत हुआ। ज्ञानी को सही गलत की पहचान होनी चाहिए, तभी सही होगा।
क्या भावनाओं और प्रगति में कोई सम्बंध है?
हाँ, यदि भावनाएं कर्म नहीं बन जाती, कर्म बुद्धि से संचालित हो तो प्रगति हो रही है। पर भावनाओं का दमन या उनका आभाव प्रगति नहीं, मनोविकार है। उनको अनुभव करना है, सचेत रहकर और कर्म करते समय बुद्धि का उपयोग करना चाहिए।
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सत्संग ४१, २६ जून २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) कर्ता कोई है ही नहीं, केवल दृष्टा है। चेतना जागृत होने पर, समस्या आने पर भी हम विचलित नहीं होते हैं, और पशुवृतियों पर या प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण आ जाता है।
अनुभवक्रिया का ज्ञान तब तक नहीं होगा जब तक चेतना नहीं होगी। अनुभवक्रिया होने की अवस्था है, इसको समाधि भी कह सकते हैं।
स्थूल जगत को व्यावहारिक रुप से सत्य या विसत्य मान कर ही कार्य करना चाहिए। चेतना होने के बाद जो अनावश्यक है वो अपने आप ही बंद होने लगता है। ज्ञान मार्ग पर व्यवहार बदलना लक्ष्य नहीं है, अज्ञान का नाश लक्ष्य है।
व्यक्ति के कारण अस्तित्व में विभाजन प्रतीत होता है, योग का अर्थ होता है जो टूट गया है उसको जोड़ देना।
२) स्वप्न अवस्था में ध्यान स्थूल इन्द्रियों से हटकर सूक्ष्म इन्द्रियों पर आ जाता है। चेतना होने पर आप अवस्थाओं के परिवर्तन के भी साक्षी हो सकते हैं। चेतना कुंजी है ज्ञान, सिद्धि, बुद्धि आदि प्राप्त करने के लिए और इससे जागृत एवम अन्य सभी अवस्थाओं पर नियंत्रण हो जाता है।
नेती नेती, और आत्मज्ञान होने पर चेतना जागृत हो जाती है। उसके बाद संकल्प से चेतना बनाये रखना सम्भव है।
जो है जैसा है बस वैसा ही है, इसको तथाता भी कहते हैं, यही अनुभवक्रिया है, जब आप चित्त के आर पार देख लेते हैं। जब अनुभवक्रिया को जान लिया, योग में वही सहस्रहार का सक्रिय होना कहा गया है।
३) जब तक कार्यक्रम में हैं, तब तक अन्य कोई और साधना करने की आवश्यकता नहीं है। कोई भी साधना गुरु के निर्देशन में ही करनी चाहिये। बिना गुरु के मार्ग दर्शन में कोई भी साधना करना निरर्थक है।
योग या आध्यात्म का दुरुपयोग कर्मों के फलों को टालने के लिए करना सही नहीं है, माया से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिये। शारीरिक दुख को मेरा दुख समझना भी एक तरह का अज्ञान ही है। आध्यात्म मार्ग पर स्वीकार भाव आना चाहिए।
चित्त पर सुख और दुख का प्रभाव पड़ता है, पर सबकी प्रतिक्रिया भिन्न भिन्न होती है। संवेदना तो होती रहेंगी, पर चेतना आने पर स्वतंत्रता भी रहेगी कि कौनसी वासनाओं पर कर्म करने हैं और किसपर कर्म नहीं करना है।
४) परम तत्व का ज्ञान हो गया, यह पता चल गया कि यह सब मिथ्या है, स्वप्न जैसा है, तो जो अनावश्यक है वो छूट जाना चाहिये। जो कर रहा है, जिसकी पूजा कर रहे हैं, और उसका फल, सभी मिथ्या है, तो करने के लिए क्या रह जाता है। यदि अभी भी कुछ मांग रहे हैं, तो इसका अर्थ है कि संसार को तो अभी भी सत्य माना हुआ है, अभी भी अज्ञान बचा हुआ है।
ज्ञान हो गया है, चेतना जागृत हो, समर्पण भाव है, तो जीवन यापन के लिए जितना आवश्यक है बस उतना ही करना बहुत है। ज्ञानी तंत्र का प्रयोग ज्ञान प्राप्त करने के लिए ही करता है।
५) साधना का अन्त ज्ञान मार्ग है। ज्ञान होने के बाद सरल सात्विक जीवन जीना चाहिये, माया में जाकर कहीं कुछ बदलना या ठीक नहीं करना है। आप पहले से ही मुक्त हैं, कितनी भी साधना कर लीजिये, आप मुक्त ही रहेंगे।
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पूरी पृथ्वी पर इस तरह का कोई और कार्यक्रम नहीं है, इसमें सब गुरुक्षेत्र के निर्देश के अनुसार किया गया है। जो कार्यक्रम में अनुशाशित रुप से चल रहे हैं, उनका तेज देखकर ही आश्चर्य होता है।
यदि आवश्यक है तो जो भी पृथ्वी पर उपलब्ध है, उस तरह से साधक की सहायता करी जायेगी। गुरु ही आपको आपके कर्म फलों से बचा सकता है। यदि एक आदमी को भी आत्मज्ञान हो जाता है तो मैं कृतकृत्य हो जाता हूँ।
यदि बहुत आवश्यक है तो गुरुक्षेत्र से प्रार्थना कर सकते हैं।
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सत्संग २९ जून २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) केवल इतना जाना जा सकता है कि मेरी अवस्था पहले से ही परम है।
जो बदल रहा है वो भी वही है जो बदल नहीं रहा है, जैसे सागर और लहरें, स्वर्ण और आभूषण, या मिट्टी और घड़ा। अस्तित्व में जो परिवर्तनशील है वो भी अस्तित्व ही है। अद्वैत के स्तर पर नाद भी ब्रह्मं है, अनुभव और अनुभवकर्ता एक ही है। अद्वैत में कुछ भी असत्य नहीं रह जाता है। अद्वैत का ज्ञान सीधा ज्ञान है।
द्वैत के स्तर पर अनुभव अनुभवकर्ता नहीं हो सकता है। अहम के स्तर पर अनेक हैं और अधिक भिन्नता है।
चित्त की विभाजन क्रिया को भी अनुभव में डाल दिया जाये तो केवल अनुभवक्रिया रह जाती है। अनुभवक्रिया ही अस्तित्व है, यह पूरी तरह से बुद्धि के परे है, क्योंकि बुद्धि भी अनुभव मात्र है। यह केवल समर्पण भाव से ही जाना जा सकता है।
अनुभव और अनुभवकर्ता का अपना स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। बिना आकार के सोना नहीं पाया जाता है, वैसे ही बिना अनुभव के अस्तित्व नहीं जाना जाता है।
स्मृति के होने या ना होने को अस्तित्व नहीं मान लेना चाहिए। अनुभव, रुप आदि बदलते रहते हैं, उससे अस्तित्व कहीं आता जाता नहीं है।
२) मैं के नहीं होने का ज्ञान ही आत्मज्ञान है। केवल अस्तित्व है जो विभिन्न रूपों में प्रकट हो रहा है। भाषा की सीमा के कारण यह कह देते हैं कि मैं ही अस्तित्व हूँ। केवल इतना कहा जा सकता है कि 'अस्तित्व है'।
जो अस्थाई है उसको मैं मान लेना अज्ञान है, तो जो स्थाई है उसको मैं मान लिया जाता है, जैसे शिवोहम, अहम ब्रह्मस्मी।
अनुभवकर्ता अनुभव द्वैत है, अनुभवक्रिया अद्वैत है, जहां दोनों विलीन हो जाते हैं। अनुभवक्रिया क्या है यह बुद्धि से नहीं जाना जा सकता है, क्योंकि बुद्धि भी एक अनुभव मात्र ही है। जैसे पानी के स्तर पर, सागर और लहरें एक ही हैं।
जो भी कुछ है वह अस्तित्व है, या अनुभवक्रिया है, यहां कुछ मानना नहीं है, ऐसा ही है। यह माना जाता है कि अस्तित्व के दो रुप हैं, अनुभवकर्ता और अनुभव, एक स्थाई है और एक अस्थाई है। एक सत्य है और एक असत्य है, सत्य असत्य यह द्वैत के स्तर पर है।
अद्वैत सत्य असत्य, बुद्धि आदि के परे है, अद्वैत में क्या है यह आवश्यक नहीं है, केवल होना आवश्यक है, जो है जैसा है, वैसा ही है।
३) यदि ज्ञान लक्ष्य है, तो मनुष्य जीवन सर्वश्रेष्ठ है। चेतना के प्रकाश में जो भी हो रहा है, उसका साक्षी या दृष्टा भाव में रहना, यही परम अवस्था है, इससे उपर और कुछ नहीं है। कोई प्रयास नहीं करना है, केवल इतना संकल्प ही बहुत है कि चेतना रहे।
चेतना जागृत हो तो चित्त की सभी परतों, जगत, सगुण, प्रकट, अप्रकट आदि सभी की मिथ्या दिखाई देने लग जाती है।
४) भक्ति मार्ग के सिवा अन्य सभी मार्ग नास्तिक मार्ग हैं। ज्ञान मार्ग का लक्ष्य आत्मज्ञान है।
अवतार का अर्थ है जिसका अवतरण हुआ है, जो नीचे आया है।
गुरु यानी बोधी सत्व वृत्ति है, जो शिष्यों की मुक्ति के लिए जन्म लेते हैं।
स्त्री रुप पूर्ण रुप है, सभी जीव स्त्री रुप में हैं। पुरुष मादा का बदला हुआ रुप है, जो प्रजनन के लिए उपयोगी है।
ज्ञान मार्ग पर गुरु, ज्ञान और अज्ञेयता के लिए समर्पण होना चाहिए। ज्ञान मार्ग अज्ञेयता में आकर समाप्त हो जाता है।
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सत्संग ४२, ३ जूलाई २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) जितना भी समझ में आ गया है, उतना व्यवहार में उतरना चाहिये।
अहम वृत्ति है, और समय तो केवल कल्पना मात्र है।
अस्तित्व को ही दो रूपों में जाना जाता है, अनुभवकर्ता और अनुभव। जैसे सोना और उसका आकार या नाम रुप। चित्त की विभाजन वृत्ति अस्तित्व को तत्व और नाम रुप में विभाजित कर देती है। नाम रुप कभी तत्व से भिन्न मिलते नहीं हैं।
बिना सोने के रुप नहीं होता और बिना रुप का सोना नहीं होता है। इसी तरह से बिना अनुभव के अनुभवकर्ता नहीं है, और बिना अनुभवकर्ता के अनुभव नहीं होता, पर दोनों एक दूसरे का कारण नहीं हैं। अद्वैत में दोनों विलीन हैं और वो शून्यता है, वो अज्ञेय है। जब भी अस्तित्व का ज्ञान होगा वो द्वैत रुप में ही होगा।
२) अनुभव, माया, अनुभवकर्ता, अस्तित्व आदि सभी का तत्व शून्य है। जैसे बादल, दरिया या बर्फ तीनों का तत्व एक ही है, पानी या अच२ओ।
अस्तित्व यानी अस्ति + तत्व, होने का तत्व अस्तित्व है, और वो क्या है यह नहीं पता चलेगा। वो नहीं है, ऐसा भी नहीं है, केवल यह कहा जा सकता है कि वो शून्य है, खाली है, अज्ञेय है।
अस्तित्व को अपना ही अनुभव हो रहा है माया के रुप में, केवल सम्भावना मात्र है, ज्ञान बस इतना सा ही है। यहां बुद्धि को समर्पण भाव में आ जाना चाहिये।
जिसको ज्ञान हो जाता है, वो चाहता है कि दूसरों को भी यह दिखाये, यही गुरु भाविता है। गुरु केवल आपको आईना दिखाते हैं।
३) जिसको आप खेल मानते हैं वो दुख नहीं देगा, वो बोझ नहीं लगता है, उससे थकावट नहीं होती है। चेतना होने पर जीवन भी एक खेल जैसा प्रतीत होता है। माया को लीला या खेल के रुप में स्वीकार करना चाहिए।
दृष्टा का पहले से ही कुछ नहीं है, तो वो क्या त्यागेगा? ज्ञान होने के बाद कुछ त्यागना नहीं पड़ता, त्याग हो जाता है। जब सभी कुछ मिथ्या है, यह जान लिया तो क्या त्यागा जा सकता है? संसार नहीं छूटेगा, बस बदल जायेगा, परिवर्तन शाश्वत है।
अस्तित्व का तत्व शून्यता है, केवल सम्भावना मात्र है, इसलिये अनंत है। अस्तित्व में कुछ बनता नहीं है, केवल प्रतीत होता है, कुछ बन गया तो उसे अनंत नहीं कह सकते हैं।
४) जो बंधन में है वो बंधा ही रहेगा, जो मुक्त है वो मुक्त ही रहेगा, और मैं सर्वदा मुक्त हूँ। यदि बुद्धि को यह लगने लगे की मैं बंधन में हूँ, तो यह अज्ञान का संकेत है। जो नियमों में बंधा हुआ है उसमें भी कुछ बुरा नहीं है, वो भी पूर्ण ही है।
जो भी प्रतीत हो रहा है वह स्वप्न मात्र है, मैं कहीं है ही नहीं, यही परम मुक्ति है। ज्ञानी पहले से ही मुक्त है, आत्मज्ञान होते ही वह यह जान लेता है।
इच्छा को मेरा मान लेना बंधन का कारण है। यदि अहम है तो इच्छा पूर्ति होने पर भी संतुष्टि नहीं होती है, बल्कि अहम भाव और दृढ हो जाता है कि यह इच्छा मैंने पूरी कर ली।
५) मैं प्रशांत हूँ, और अधिक शांत नहीं हो सकता हूँ जितना पहले से ही हूँ, और जो अशांत है वो तो अशांत ही रहेगा। शांति अशांति, सुख दुख आदि द्वैत में हैं, वो ऐसा ही रहेगा। चलचित्र के चलने से परदे पर कुछ प्रभाव नहीं छूटता है।
नियम हैं और बंधन है, तभी खेल खेलने में मजा आता है। अवरोध के पार जाने में खुशी है, यही खेल है।
यह जगत जिसने बनाया है वो इसको सम्भाल भी लेगा। हमें यहां कुछ सुधारना या बदलना नहीं है, केवल उपयोग करना है। जैसे होटल में रुकते हैं तो वहां कुछ सुधारने नहीं लग जाते हैं।
सच्चे तांत्रिक को मुक्ति नहीं चाहिये, उसे माया चाहिये, माया उसकी देवी है। उसको यह भी ज्ञान है कि मैं मुक्त हूँ, और यह खेल चल रहा है। इच्छा का आकर्षण तभी तक है जब तक वो पूरी नहीं होती है। फिर उसका स्थान कोई और इच्छा ले लेती है, या यदि सारी इच्छायें पूरी हो गई हैं, तो इच्छाओं से मुक्ति हो जाती है।
६) ज्ञान मार्ग पर सभी प्रश्नों के इतने पूर्ण उत्तर मिल जायेंगे की कुछ और जानने के लिए ही नहीं बचेगा। उसके बाद भी रुचि है तो थोड़ी बहुत जानकारी मिल सकती है, पर मूलभूत ज्ञान में कुछ नया नहीं जुड़ेगा। यहीं पर साधना और ज्ञान मार्ग का अन्त हो जाता है, क्योंकि ज्ञान मार्ग पूर्ण है और एकदम सीधा मार्ग है।
ज्ञान मार्ग का अन्त समर्पण है, अज्ञेयता है, कि बुद्धि से सब कुछ नहीं जाना जा सकता है। लेकिन हुआ जा सकता है, और वो मैं पहले से ही हूँ, यही समर्पण भाव है।
जब जान लिया है कि मैं सिनेमा नहीं हूँ, परदा हूँ, तो भी चलचित्र तो चलता रहता है। आत्मज्ञान होने के बाद, जीवन सरल, सात्विक, सुख पूर्वक, सुन्दरता और व्यवस्थित रूप से चलता रहता है। ज्ञानी सहजता से साक्षी भाव में रहता है।
७) ज्ञानी को सभी मार्गों का थोड़ा बहुत मूल ज्ञान होना चाहिए, ज्ञानी स्वछन्द है। यदि जागृत अवस्था में चेतना है, तो वो अपने आप अन्य अवस्थाओं में जागृत होने लग जायेगी।
चित्त एक ही है उसमें कोई दीवारें नहीं हैं, केवल जागृत अवस्था में कुछ देर के लिए सीमाओं का अनुभव होता है। व्यक्तित्व क्षणिक है, उसके पहले और उसके बाद सब एक ही है, सब आपस में जुड़ा हुआ है।
८) अस्तित्व या अनुभवकर्ता का ज्ञान नहीं हो सकता है, पर हुआ जा सकता है, जो की आप पहले से ही हैं। केवल शून्यता है, और उसमें अपने आप को अनुभव करने की सम्भावना भी है।
एक होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि दोनों को परिवर्तनीय या अपरिवर्तनीय ही होना चाहिए। जैसे लहरें परिवर्तनीय हैं और सागर अपरिवर्तनीय, पर दोनों का तत्व एक पानी ही है। जो बदल रहा है वो भी वही है जो बदल नहीं रहा है, दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। ब्रह्मं नाद भी ब्रह्मं ही है।
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सत्संग ७ जूलाई २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) अनुभवकर्ता एक ही है, दूसरे का या व्यक्ति का अनुभव होता है, दूसरे को या व्यक्ति को अनुभव नहीं होता है। एक स्मृति में जो ज्ञान है वो दूसरी स्मृति में नहीं है, बस इतना कहा जा सकता है। जागृत अवस्था में यह सीमितता जीवित रहने के लिए आवश्यक है। ऊपरी परतों में सभी सीमायें टूटने लगती हैं।
अज्ञान के कारण ही मनुष्य जीवन मिला है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य मनुष्य जीवन से मुक्ति है। जीवन अनंत है, जीवन का कोई उदेश्य नहीं है। ज्ञान होने के बाद क्या करना है यह कहीं नहीं बताया गया है। ज्ञानी के लिए सब खेल है, ज्ञानी का लक्ष्य लक्ष्यहीनता होता है।
ये जान लीजिये की आप कौन हैं, की आप स्वयंभू, अजर, अमर, अजन्मे, शून्यता हैं, अन्य व्यर्थ की बातें जानकर क्या फायदा।
उपरिति का अर्थ अनावश्यक कार्यों से बचना है। जो कार्य आपकी साधना में बाधा बन सकते हैं, उनसे दूर रहना है, भटकना नहीं है इधर उधर, यह उपरिति है।
२) अनुभव और अनुभवकर्ता अद्वैत के स्तर पर एक ही हैं, द्वैत के स्तर पर अलग अलग हैं। अद्वैत या अस्तित्व के स्तर पर सत्य असत्य परिभाषित नहीं हैं, या सत्य भी है असत्य भी है और दोनों नहीं हैं, दोनों का विलय हो गया है।
दो स्तरों को मिलाना नहीं चाहिये, नहीं तो उलझन होगी। क्योंकि एक स्तर पर जिसको सत्य मान लिया है, वो दूसरे स्तर पर असत्य है, और इसका उलटा भी सही है। जितना अज्ञान है, उसी स्तर का ज्ञान होता है।
३) चेतना यानी क्या है जो देख रहा है, उसपर ध्यान रखिये, यह चेतना की परत है।
पहले दृष्टा को जान लीजिये, फिर यह प्रश्न नहीं आयेगा कि दृष्टि क्या है। दृष्टि अनुभवक्रिया को ही कहा गया है।
ज्ञान मार्ग पर कुछ मानना नहीं है, जानना है। और जो अपरोक्ष अनुभव और तर्क में नहीं आ रहा है उसपर प्रश्न करना चाहिए।
जब नाद थोड़ा स्थायी हो जाता है, तो उसको स्मृति कहते हैं। स्मृति की कई परतें हैं। जब सभी स्मृतियां मिला दी जायें, तो उसके योग को विश्वस्मृति कहते हैं। जो भी अनुभव हो रहे हैं, वो विश्वस्मृति के ही अनुभव हो रहे हैं। स्मृति एक ही है, विभिन्न अवस्थाओं में, स्मृति का एक छोटा सा भाग अनुभव में आता है। सम्पूर्ण स्मृति को विश्वस्मृति या विश्वचित्त कहा गया है।
४) सभी अनुभव परिवर्तनशील हैं, और परिवर्तन नाद है। जिसमें विपर्यय, विक्षेप, विकल्प, स्वप्न, निद्रा, कल्पना, मान्यतायें आदि नहीं है, जिसमें अज्ञान की छाया नहीं हो, वो अपरोक्ष अनुभव है। जैसे वस्तुओं का अनुभव नहीं होता है, इन्द्रियों का होता है; उससे अपरोक्ष स्मृति का अनुभव है, और उससे भी अपरोक्ष केवल परिवर्तन का अनुभव है। परोक्ष अनुभव में कुछ ना कुछ मिलावट होती है।
अवतार के रुप में आकर शिक्षा दी जाती है, इसलिये गुरु को गोविन्द से बड़ा कहा गया है।
कहानी सत्य नहीं है, उसमें जो शिक्षा दी गई है, वो सत्य है।
मनुष्य भी विश्वचित्त का एक अवतार है। विश्वचित्त को ही विष्णु या ईश्वर कहा जा सकता है।
यदि आपको शंका है कि आत्मज्ञान हुआ है कि नहीं हुआ है, तो मतलब अभी आत्मज्ञान हुआ नहीं है। जितना ज्ञान बढ़ता जायेगा, उतनी ही शांति बढ़ती जायेगी।
कर्मों के अन्त से मृत्यु हो जाती है, आत्मज्ञान होने से मुक्ति होती है या अहम की मृत्यु हो जाती है। कर्म जीव से सम्बंधित हैं, आत्मन से नहीं। आवाज में कुछ विशेष नहीं है, जो कहा जा रहा है, वो दिव्य है।
साक्षी, चैतन्य, अनुभवकर्ता कहीं आता जाता नहीं है, साक्षी भाव या चेतना आती जाती रहती है।
भक्ति का अर्थ शुद्ध प्रेम और समर्पण भाव है। सगुण को सूक्ष्म और सूक्ष्म को लुप्त कर देना, जहां केवल प्रेम भाव रहता है, यह भक्ति मार्ग है।
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सत्संग ४३, १० जूलाई २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) चित की विभाजन वृत्ति को नकार करके भी अस्तित्व का दर्शन हो सकता है, जहां एक गतिमान चैतन्य अनुभव दिखाई पड़ता है, और जहां अनुभव एवम अनुभवकर्ता का भेद नहीं दिखाई पड़े, उसे अनुभवक्रिया कहते हैं।
आत्मज्ञान होने पर, अनुभव और अनुभवकर्ता का तत्व जान लेने के बाद ही चित्त की अवस्था अनुभवक्रिया की सर्वदा है यह जानना सम्भव है। मैं चित्त नहीं हूँ, केवल एक नाद है जो विभिन्न तन्मात्राओं के रुप में उभर रहा है, बस यह ज्ञान होने पर अनुभवक्रिया का ज्ञान हो जायेगा, की ऐसा ही है।
जब द्वैत को स्थापित नहीं कर पायेंगे तो जो रह जाता है, वो अनुभवक्रिया है। अंदर बाहर की सीमाओं की कल्पना को अपरोक्ष अनुभव से जान लेने से चित्त की विभाजन वृत्ति बंद सी होने लगती है, और यह ज्ञात होता है जो भी है यही है; इसीको अनुभवक्रिया कह सकते हैं।
अनुभवक्रिया यानी ब्रह्मज्ञान, जब अनुभवकर्ता और अनुभव के बीच में चित्त की अवस्था होती है। अभी भी जो अवस्था है आपकी वो अनुभवक्रिया की ही है, क्योंकि द्वैत की अवस्था मिथ्या है।
२) अनुभव और अनुभवकर्ता में कोई सम्बंध नहीं है, वो एक ही हैं, दो नहीं हैं। व्यक्ति तो मिथ्या है, अनुभव और अनुभवकर्ता का तत्व एक ही है। सभी रूपों में एकता दिख गई तो वही श्रेष्ठ सम्बंध है, सब मुझमें हैं, और मैं ही सबमें हूँ। उस साधक को फिर सब मैं ही मैं दिखता है, यही आत्म प्रेम है, और यही प्रेम विभिन्न रूपों में प्रकट होता है।
सबसे बड़ा सम्बंध मित्रता का या गुरु शिष्य का होता है, जो निस्वार्थ भाव से होता है। प्रारम्भ में लगता है कि सम्बंध टूट रहे हैं, पर ज्ञान होने के बाद सब कुछ बराबर है या जैसा है वैसा ही, सम्पूर्ण दिखाई देता है।
३) एक बार जो अनुभव हो गया तो चित्त का बहाव बार बार उसकी तरफ खींचता है, बार बार वही दोहराना, इसको संकर्षण का नियम कहते हैं। जैसे नदिया की धारा अपना रास्ता बना लेती है और फिर पानी उसीमें बहता है।
संकल्प शक्ति से चित्त उसी दिशा में जाता है, और संकल्प प्रकट रुप लेने लगता है। चित्त के नियमों को तोड़ा नहीं जा सकता है, लेकिन गुरु कृपा, ज्ञान, नये अनुभवों, संकल्प शक्ति आदि से उनके उपर जाया जा सकता है और चित्त के विकासक्रम की गति बड़ाई जा सकती है।
४) संसार और आध्यात्म अलग अलग नहीं हैं, जो भी आप कर रहे हैं उसे पूरी चेतना के साथ करना चाहिए, बस इतना बहुत है। ज्ञानी के लिए संसार भी निर्वाण ही है। संसार से भागकर संसार से मुक्ति सम्भव नहीं है, जहां आप हैं ज्ञान वहीं होगा, गीता भी कुरुक्षेत्र में पढ़ाई गई है। साधारण दैनिक जीवन को ही आध्यात्मिक बना लें। पहले ज्ञान होता है उसके बाद त्याग होता है।
द्वैत मिथ्या है, और सापेक्षिक रुप में ही द्वैत का ज्ञान होता है, जैसे सुख दुख, प्रेम घृणा आदि। जैसे पानी का तापमान सापेक्षिक या तुलनात्मक रुप में ही जाना जाता है।
माया को भिन्न दर्शनों में अनेक नामों से जाना गया है, जैसे मिथ्या, असत्य, प्रकृति, अनुभव, देवी, चित्त, प्रतिति, आभास, स्वप्न, शक्ति, परिवर्तन, नाद आदि।
पहले सुनना चाहिये उसके बाद प्रश्न करना चाहिये। कार्यक्रम में व्यवस्थित और अनुशाशित रुप से चलने से सारे प्रश्न अपने आप समाप्त हो जायेंगे।
गुरु में सब गुरु हैं।
५) अज्ञान को देख लेना ही अज्ञान का नाश है। सूर्य को चमकने के लिए कुछ करना नहीं है, केवल बादलों का हटना मात्र है।
जब एकता की वृत्ति चित्त की परतों से रिसती है, तो हर परत उसको अपनी तरह से अभिव्यक्त करती है।
यदि आप आनंद अवस्था में हैं, तो यही लक्ष्य है जीवन का, यहां थोड़ा अज्ञान रह भी गया या कुछ प्रश्नों के उत्तर नहीं भी मिले, तो क्या अन्तर पड़ता है।
चेतना में किये गये कर्मों से थकान नहीं होती है।
यदि जागृति में ज्ञान नहीं हुआ तो स्वप्न में ज्ञान नहीं हो सकता है।
परमात्मा सर्वव्यापि है, एक ही है, मैं ही ब्रह्मं हूँ, और तत् त्वम् असी, तुम भी वही हो।
६) बड़े ज्ञानी महापुरुषों को किसी मार्ग में नहीं बांधा जा सकता है। ज्ञानी सब जानता है। कोई कर्म अच्छा या बुरा नहीं होता है, केवल अंधकार या प्रकाश में हुआ है इतना भेद है।
जो घटनाओं का कारण स्वयं के बाहर कहीं ढूंढ रहा है, तो वो स्वयं में स्थित नहीं है, अस्वस्थ है, और इसलिये दुखी है। मैं ही समस्या हूँ और मैं ही उपाय भी हूँ। कर्म हैं, यह सही है, पर कर्म आपके नहीं हैं। व्यक्ति मिथ्या है, अच्छा बुरा, सभी अनुभव द्वैत में ही सम्भव हैं, मिथ्या में मिथ्या ही होगा, सभी सम्भावनायें मात्र है।
७) ज्ञान मार्ग पर अनुभव और अनुभवकर्ता, दृष्टा और दृश्य में भेद जानना बहुत महत्वपूर्ण है, और जो अनावश्यक है उसको त्याग दीजिये, फिर जीवन आनंदमय हो जाता है।
केवल मैं, यानी आत्मन, ब्रह्मं ही कर्मों के उपर हैं, बाकी सब कर्मों के नियम से बंधे हुए हैं। केवल जो बंधा हुआ है उससे तदात्म्य, आसक्ति, अहम भाव हटा लेना है, और साक्षी भाव में आ जाइये, तो कोई कर्म नहीं छुएगा। कर्म के नियम तोड़ना नहीं है, उसके उपर उठना सम्भव है, केवल यह ज्ञान कि कोई भी कर्म मेरा नहीं है।
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जो मैंनें कह दिया उसके आगे कुछ और बचता नहीं है, क्योंकि यही शास्त्रों में लिखा है, यही अपरोक्ष अनुभव है, यही ज्ञानी कह रहे हैं।
ओशो कलयुग के महानतम गुरु थे। पर जो गलतियां उन्होनें कीं वो मत करना।
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सत्संग ४४, १५ जूलाई २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) अद्वैत के स्तर पर चित्त का उदय, विलय, विकासक्रम आदि कुछ नहीं है, सब मिथ्या है। जैसे स्वप्न में सब कुछ पहले से ही बना बनाया मिल जाता है, माया है, बस प्रकट है। अव्यक्त से रचनायें हो रही हैं, वो जटिल हो जाती हैं और फिर उनका विलय शुरू हो जाता है।
माया में तो सब सम्भव है, माया तो वो दिखाती है जो आप देखना चाहते हैं। सृष्टि चक्र, चक्र होकर भी चक्र नहीं है।
जितना चित्त का अवलोकन करेंगे, उतना चित्त का ज्ञान होगा, केवल चेतना में देखना मात्र है।
अशुद्धि है तो किसी भी मार्ग पर चलने में हानि भी हो सकती है। आपके हित में सारे जगत का हित है, यदि एक भी दिया जल गया तो कुछ अंधकार दूर होता ही है।
२) किसी को भी वस्तुओं का अनुभव नहीं होता है, सभी अनुभव चिदाकाश या शून्यता के परदे पर एक प्रतिति मात्र हैं, भ्रम है। यही सत्य है, बाकी सब अनुमान लगाया गया है।
सभी अनुभव इन्द्रियों के माध्यम से होते हैं। संवेदना का अर्थ है कि ज्ञान हो जाना। इन्द्रियों के माध्यम से जो संवेदनायें, नाद, या तरंगें आ रही हैं उनका ही हमें ज्ञान हो रहा है। हमें केवल इन्द्रिय जनित संवेदनाओं का ही अनुभव होता है, जो की बहुत सीमित है और उत्तरजीविता के लिए आवश्यक है।
दृष्टा तो एक ही है, सारी की सारी काया तो माया है, स्वप्न है। सम्पूर्ण अनुभव माया है, सत्य का अनुभव नहीं होता कभी। अज्ञेयता में आनंद है।
स्वप्न में यदि चेतना जागृत हो जाती है तो वहां सृष्टि ही सृष्टि है, जो भी इच्छा है वो प्रकट हो जाता है। ऐसे जागृत स्वप्न से जब जागते हैं तो जागृत अवस्था भी स्वप्न जैसी ही प्रतीत होती है।
एक संकल्प ले लीजिये की चेतना आ जाये जब जरूरी है, बस इतना बहुत है। तवा गरम है, यह बार बार दोहराने की आवश्यकता नहीं होती है, बस जब सामने है तो उसे छूते नहीं हैं।
३) आप कर्म से पहले से ही मुक्त हैं, और जीव कर्मों से मुक्त नहीं हो सकता है। कर्म का अंत यानी इच्छाओं का अंत होना है, जो कभी नहीं होता है, केवल इच्छाओं का शुद्धिकरण हो जाता है। कर्म स्मृति है, तो स्मृति का अंत नहीं होता है, क्योंकि वो तो प्रतिति है, वो तो है ही नहीं, जो है ही नहीं उसका अंत कैसे होगा।
आपका यानी अनुभवकर्ता का कोई कर्म नहीं है, कर्मों से मुक्ति पहले ही हो चुकी है। जीव के जो भी कर्म हैं वो मिथ्या हैं। पर माया के स्तर पर कर्म, कर्म फल, कर्मों से मुक्ति, नियम आदि सब कुछ है।
४) चित नहीं आता जाता है, चित्त वृत्ति आती जाती है।
अद्वैत में सृष्टि है और नहीं भी है, सृष्टि का अभाव भी है और नहीं भी है। ब्रह्मं को समझने का प्रयास नहीं करना है, ब्रह्मं हुआ जा सकता है।
जो बोला गया है उससे कर्म बंधन नहीं बनता है, पर उसके पीछे जो भावना है उससे कर्म बंधन बनता है।
युग बदलने से कुछ नहीं होता है, सभी युग लगभग एक जैसे ही होते हैं।
महाचित्त भी कर्म के नियम के अंदर है। चित्त के नियम ही चित्त है, दोनों भिन्न नहीं हैं। जो भी पूर्व निर्धारित है वो भी असत्य है, और उसको मिटा कर कुछ भी किया जा सकता है।
स्मृति निर्धारित करती है कि स्वप्न में क्या होगा। स्मृति मशीन की तरह है, कोई निर्धारित करने वाला नहीं है, निर्धारित हो जाता है। किसी भी स्तर पर कोई कर्ता नहीं है। समय स्मृति में चल रहा है, स्मृति समय में नहीं है।
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मैनें आशू से पूछा था कि क्या तुम्हारी चेतना रहती है? तो उन्होनें कहा नहीं सर जब आवश्यक होती है तब आ जाती है। तो मैंनें कहा ठीक है, अब तुम्हारा कार्यक्रम समाप्त हो गया है। मैनें भी यही संकल्प ले रखा है।
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सत्संग ४५, १७ जूलाई २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) जहां सम्भावना प्रकट हो जाती है ब्रह्मं में से वो ब्रह्माण्ड है, जो सृष्टि है वो भी मैं ही हूँ। अहम कहता है कि मैं यह हूँ और साथ ही यह भी भावना आती है कि मैं यह नहीं हूँ, ये मेरा है और यह मेरा नहीं है। अहम विभाजन करता है, जबकि सृष्टि में ऐसा कोई भेद कहीं नहीं है।
जब आत्मज्ञान में स्थित हो जाते हैं तो गुरु बताते हैं कि अब अनुभवकर्ता को भी छोड़ दीजिये, केवल ब्रह्मं सत्य है। सारा ज्ञान सीढ़ी की तरह है अज्ञेयता तक पहुंचाने के लिए।
गुरु सब छीन लेते हैं और फिर शिष्य का जैसे एक नया जन्म होता है। आसक्ति का कारण अज्ञान है। अज्ञान का नाश होते ही अनासक्ति हो जाती है, और फिर स्वीकार भाव आ जाता है।
आत्मज्ञान होने के बाद चेतना को बनाये रखना, या साक्षी भाव में रहना और ज्ञान के प्रती समर्पण में रहना, इसके सिवा कुछ और बचता नहीं है।
२) सभी रुप ब्रह्मं हैं, केवल अनंत सम्भावनायें हैं। आपमें और मुझमें कोई भेद नहीं है, इसको तीन स्तर पर देखा जा सकता है। पहला सभी परब्रह्मं के रुप हैं, दूसरा अनुभवकर्ता एक ही है, और तीसरा माया के स्तर पर भी एक ही चित्त है, जिसको विश्वचित्त भी कहा गया है। हर स्तर पर एकता ही है, सारी विविधता अज्ञान के कारण दिखाई देती है।
सभी नाम रुप मिथ्या हैं, कुछ है नहीं। जैसे स्वप्न समाप्त होने के बाद कुछ बचता नहीं है, केवल शून्यता है।
३) यदि कम नींद आने से थकावट हो रही है तो प्रकृति सुधार कर लेती है, और चेतना नींद से हटा देती है। जो प्राकृतिक रुप से होता है उसमें विघ्न पैदा नहीं करना है।
चेतना को प्रयास से लाना नहीं है, क्योंकि लाने वाला कोई नहीं है, जब चेतना प्रकट है तो उसे बनाये रखना चाहिए। ज्ञान, स्मरण और संकल्प चेतना बनाये रखने में सहायक हैं।
जिसके शरीर का नाद के साथ समन्व्य हो गया, और ब्रह्म मुहूर्त में नींद खुल जाती है तो उसकी आध्यात्मिक प्रगति प्राकृतिक रुप से होने लगती है, उसपर गुरुक्षेत्र की कृपा दृष्टि है।
४) जब आत्मज्ञान होता है तो पता चलता है कि मैं नहीं हूँ, केवल अनुभवकर्ता है, और उसीको मैं कह दिया जाता है। मैं की स्थिति अहम से आत्मन पर आ जाती है। अनुभव और अनुभवकर्ता का जहां विलय हो गया है वो ब्रह्मं है, या अस्तित्व है।
जैसे सागर और लहरों का तत्व पानी है, वैसे ही ब्रह्मं में अनुभवकर्ता भी है और माया भी है। अन्त में सब कुछ एक ही है, आत्मन भी ब्रह्मं है। द्वैत की दृष्टि में भिन्नता प्रतित होती है, अद्वैत की दृष्टि से सब एक ही हैं।
५) विश्वचित्त या विष्णु की मूल स्थिति निद्रा की है। जो प्राकृतिक रुप से होता है उसमें विघ्न पैदा नहीं करना है, जीवन भी सिनेमा की तरह है उसका आनंद लेना चाहिए। सिनेमा में जो भी चल रहा है वो माया है, मनोरंजन है, कहानी पहले लिखी गई है, शूटिंग पहले ही हो चुकी है।
आत्मज्ञान होने के बाद गुरु शिष्य एक ही हैं, पर आदर भाव रहता है।
कर्म करके कर्म से मुक्ति नहीं मिलती है, ज्ञान और त्याग से मिलती है, कि कुछ भी मेरा नहीं है। कर्महीनता होते हुए भी कर्म करना है। जिनके मन में अथाह शांती है उनका जीवन तूफान की तरह होता है। जिनका मन अशांत है वो कुछ कर भी नहीं पाता है, असफलता मिलती है। मैं शांत हूँ, जीव शांत नहीं होता है। जीवन जैसा है वैसा ही सम्पूर्ण है, सब अपने आप हो रहा है।
६) आत्मज्ञान होने के बाद समर्पण भाव, मौन और प्रेम भाव प्रकट हो जाता है। गुरुक्षेत्र मौन तोड़ता है ताकि आप मौन हो जायें। जो भी अनावश्यक है वो स्वतः बंद हो जाता है।
ज्ञानी सब कुछ करते हुए भी कुछ नहीं करता, अज्ञानी कुछ नहीं करते हुऐ भी बहुत कुछ करता है। अज्ञान में किया गया कोई भी कर्म निरर्थक है।
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जहां मुझे सम्भवाना दिखाई देती है, उसके लिए विशेष रूप से कृपा भेजी जाती है, और उसका परिणाम बहुत अच्छा आता है।
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सत्संग ४६, २० जूलाई २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) मुक्ति का अर्थ है बंधन का नाश। जीव का विलय होने को सबसे बड़ी मुक्ति कहा गया है। उससे पहले छोटे छोटे बंधनों से मुक्त होना एक तरह की मुक्ति है, जैसे गरीबी से मुक्ति, भावनाओं पर नियंत्रण, चेतना में रहना आदि। अलग अलग मार्गों पर मुक्ति की परिभाषा भिन्न है, आपको जैसी मुक्ति चाहिये वो ले लीजिये, पर किसी और की मुक्ति की परिभाषा का आंख बंद कर अनुसरण ना करें।
आप जिस स्तर पर हैं आपको उसी तरह की मुक्ति दिखाई देगी, और वैसे ही ज्ञान समझ आयेगा। आत्मज्ञान होते ही मुक्ति हो जाती है, फिर और किसी अन्य मुक्ति की इच्छा नहीं रहती है। पर इसको आत्मसात करने में कुछ समय लग सकता है। आत्मज्ञान ही सबसे बड़ी मुक्ति है, उसके बाद दूसरे स्तर से मुक्ति अपने आप होने लगती हैं।
२) पहले ज्ञान ले लीजिये फिर गुरुक्षेत्र से भी सम्पर्क हो जायेगा। यदि चेतना जागृत है, और आप आध्यात्मिक कार्य कर रहे हैं तो संकर्षण के नियम के कारण, जीव स्मृति का सम्बंध या तारतम्य गुरुक्षेत्र की स्मृति से होने लगता है। गुरुक्षेत्र कहीं दूर नहीं है, अभी है और यहीं है। सम्पर्क होने पर वहां पर जो ज्ञान है वो प्रकट होने लगता है।
पर यदि अशुद्धि बहुत हैं, शोर बहुत है तो वो आवाज छुप जाती है। सभी स्मृति आपस में जुड़ी हैं, तो धागे का एक सिरा पकड़ने से सारी स्मृति आ जाती है। यह जीवंत गुरु के संकेत से ही सम्भव होता है। गुरुक्षेत्र से जितना मिलेगा उतनी शांती बढ़ेगी, अशांति संसार में आसक्ति और अज्ञान से आती है।
गुरु केवल गुरुक्षेत्र हैं, और वो एक ही है, गुरुव्यक्ति माध्यम हैं। गुरु चिंगारी का काम करते हैं, अज्ञान को जलाने के लिए। अज्ञान को जलाने के बाद जो शून्यता बच जाती है, वो ज्ञान है। सभी महात्माओं ने वही शून्यता देखी है, उनमें गुरुक्षेत्र प्रकट हो गया है। वो चाहकर भी कुछ गलत नहीं कर सकते हैं।
जीवन तो कुरुक्षेत्र में घटता है, आंख बंद करके आसन पर तो जीवन व्यतीत नहीं किया जा सकता है। आसन पर तो केवल अभ्यास होता है, पर असली अभ्यास जीवन में करना चाहिए।
३) स्मृति नाद रचनायें हैं जो थोड़ी स्थायी हो गई हैं। सबका तत्व एक ही है, अनंत ही सब रूपों में प्रकट है और वो मैं ही हूँ। जो हमारा तत्व है वो पहले से ही नाद के महासागर से अछूता है, क्योंकि नाद शून्य है प्रतीत मात्र होता है। यही ब्रह्मज्ञान है, और यही परम अवस्था है, इससे उपर और कुछ नहीं है।
जैसे जैसे ज्ञान मिलता है बुद्धि शुद्ध होती जाती है। गुरुक्षेत्र से कुछ बड़ा मांगना चाहिये कि मुझे मेरे गुरु से सम्पर्क करा दिजीये, अज्ञान या दुखों से मुक्ति चाहिये आदि।
४) ज्ञान मार्ग पर ईश्वर नहीं है। अहम या व्यक्ति को हटा दिया जाये, तो जो सम्पूर्णता बचती है उसको ईश्वर कहा जा सकता है। जो भी प्रकट है वो ईश्वर ही है, आपको अभी जो भी अनुभव हो रहे हैं वो ईश्वर के ही दर्शन हो रहे हैं, यही ब्रह्मं है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो ईश्वर नहीं है।
अबोध ईश्वर का ही रुप है, ज्ञानी जानता है कि मैं ही ईश्वर हूँ, अहम ब्रह्मस्मी। केवल अज्ञानी अपने आप को कोई व्यक्ति मान लेता है, और ईश्वर की कोई कल्पना कर लेता है। पतांजलि ने कहा है पुरुष विशेष ईश्वर है।
मुझे मेरा ही अनुभव हो रहा है, मायावी और सीमित रूपों में, बस यही ज्ञान का अन्त है।
ज्ञानी जानता है कि व्यक्ति मिथ्या है और अज्ञानी मानता है कि व्यक्ति सत्य है, दोनों में केवल इतना ही भेद है।
५) जब जो व्यक्त है उसकी मिथ्या जान ली जाती है, तो जो अव्यक्त है वो प्रकाषित हो जाता है।
विष्णु वो प्रक्रिया है जो नाद रचनाओं को संगठित या बनाये रखती है।
यदि मैं ही ईश्वर हो गया तो घमंड करने के लिए कोई रहा ही नहीं। ईश्वर और व्यक्ति एक साथ नहीं हो सकते हैं। व्यक्ति का नाश सम्पूर्णता का उदय है। ज्ञान होने के बाद व्यक्ति विनम्र हो जाता है। यदि दम्भ है तो अभी बहुत अज्ञान बाकी है।
६) मृत्यु के समय चेतना बनाये रखना अच्छा होता है। मृत्यु मिथ्या है, भौतिक शरीर का नाश होता है, निचली परत का त्याग होता है, जैसे पुराने कपड़े उतार देते हैं। कुछ योगियों में सिद्धि होती है सूक्ष्म शरीर को भी मृत्यु लोक में प्रकट कर लेने की, जैसे महावतार बाबाजी हैं।
हर तरह का लोक स्वप्न है, मिथ्या है, कोई भेद नहीं है। मैं हूँ और स्वप्न की शृंखला है, यह ज्ञान का अन्त है।
यदि आप खाली हैं तो जो अप्रकट वृत्ति है जिसका दमन हुआ है वो वृत्ति, या कोई शौक, इच्छा आदि सामने आती है।
जो आध्यात्म में आ गया है गुरुक्षेत्र उसको सहायता प्रदान करते हैं। ज्ञान मार्ग पर जो आता है वो कृपा है और जो इसमें प्रगति करता है वो भी कृपा ही है।
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सत्संग ४७, २५ जूलाई २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) अनुभवकर्ता क्रियाशील नहीं है, सब कुछ माया का खेल है, ज्ञान अज्ञान सब माया में ही है। ज्ञानी देवी का भक्त है, देवी से दोस्ती कीजिये, माया को भी स्वीकार करना है। जो भी देवी ने दिया है वो देवी का ही वरदान है। ज्ञान का उपयोग कीजिये अपना जीवन ठीक करने के लिए। अज्ञान का नाश होना ही मुक्ति है।
माया में आपकी रुचि है और माया का जितना ज्ञान होगा, शक्ति आपपर प्रसन्न होंगी। देवी मेरा स्वरूप है, अर्ध भाग मेरा देवी है। शिव का सम्पूर्ण रुप अर्धनारेश्वर है, वही मैं हूँ और वही आप भी हैं।
२) अद्वैत में कोई परिवर्तन नहीं है, द्वैत के स्तर पर भी कोई परिवर्तन नहीं है। परिवर्तन चित्त के स्तर पर है, जहां नाद की परिभाषा है। जो नाद स्थायी हो गया है उसको ही हम स्मृति कह देते हैं।
द्वैत के स्तर पर अनुभव है, अनुभव बुद्धि के उपर है, बुद्धि अनुभव से बनी है। बहुस्तरीय ज्ञान का ज्ञान होना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। अज्ञेयता, समर्पण, स्वीकार ज्ञान मार्ग पर अंतिम चरण है।
३) तीन मौलिक प्रक्रियायें होती हैं, रचना, स्थायित्व और विलय। ज्ञानी जानता है कि इनपर नियंत्रण नहीं हो सकता है, पर इनके उपर उठा जा सकता है, या इनका साक्षी हुआ जा सकता है। जैसे विचारों, इच्छाओं, भावनाओं आदि पर नियंत्रण सम्भव नहीं है, पर उनका साक्षी हुआ जा सकता है। जब अनुभव चेतना में आते हैं तो यह नियंत्रण के बराबर ही है, कि मैं तो यह विचार, वृत्ति आदि नहीं हूँ, इससे अनावश्यक विचारों का अन्त हो जाता है।
इन्द्रियों, बुद्धि, विचारों, भावनाओं आदि की सीमा है, पर चेतना की कोई सीमा नहीं है, उसको विश्वचित्त के स्तर तक ले जा सकते हैं। जो अनुशाशित रुप से चलना चाहता है, गुरु भी ऐसे शिष्य का इंतजार करते हैं। ज्ञान मार्ग पर भी प्रायोगिक योग का उपयोग शुद्धिकरण के लिए किया जा सकता है। जब सब मार्ग मिल जाते हैं तो उस समय आध्यात्मिक सफलता मिलती है।
४) अद्वैत को जाना नहीं जा सकता है, वह अज्ञेय है, पर अद्वैत तक पहुंचा जा सकता है। द्वैत का नकारात्मक ज्ञान हो सकता है, और माया का ज्ञान सकारात्मक रूप से हो सकता है।
ब्रह्मं निर्गुण है, सगुण मिथ्या है केवल प्रतीत होता है। क्रिया है, लेकिन कर्ता कोई नहीं है। व्यक्ति माया है, जब बंधने वाला कोई नहीं है तो बंधन कैसे हो सकता है। कर्म हैं लेकिन कोई करने वाला नहीं है। चित्त के स्तर पर भी कोई कर्ता नहीं है, कर्म नहीं हैं, बस नियमबद्ध रुप से क्रियायें हो रही हैं। व्यवहारिक और संसार के स्तर पर कर्ता है, और समझने के लिए तीन तरह के कर्म होते हैं, विचारों, वाणी और कर्मन्द्रियों से।
५) ज्ञान मार्ग पर स्पष्ट कहा गया है कि सब कुछ जानते हुए भी कि यह संसार मिथ्या है, लेकिन फिर भी इसको सत्य मानते हुए कर्म करना चाहिए। जो संसार को मिथ्या मानकर इसको त्यागने का प्रयास कर रहा है, वो तो मूर्खता है। ज्ञान मार्ग पर सन्यास का अर्थ है कि इतना जान लेना कि सब कुछ मिथ्या है। मैं जहां भी हूँ, वहां पहले से ही परम अवस्था में ही हूँ।
ज्ञानी की साधना केवल इतनी है कि दुख, बंधन में ना पड़े, यानी चेतना में रहना। चेतना आने के बाद जो अनावश्यक है वो छूट जाता है, और जो आवश्यक है वो अपने आप होता है। कोई आपपर आक्रमण करता है तो उसका सामना करना है और किसी से जाकर लड़ाई करना, गाली देना अनावश्यक है।
६) या तो हम कह सकते हैं कि परिवर्तन किसी में भी नहीं हो रहा है, या कह सकते हैं कि सभी परिवर्तन मुझमें ही हो रहे हैं। जो शून्य है, जो अपरिवर्तनीय है उसीमें परिवर्तन प्रतीत हो रहा है पर वास्तव में हो कुछ नहीं रहा है।
बुद्धि का प्रयोग कुछ जानने के लिए नहीं करना है पर अज्ञान का नाश करने के लिए करना चाहिए।
७) चेतना में आने के बाद कर्म होते हुऐ भी बांधते नहीं हैं, जैसे जली हुई रस्सी। ज्ञानी में अंदर शांती रहती है और जीवन में तूफान की तरह घटनायें घटती रहती हैं। आपका जीवन चमत्कार की तरह हो जाता है, और जो प्राकृतिक है वो भी चमत्कार जैसा ही है। ज्ञानी के हर कर्म का तुरंत फल आता है, जैसे स्वप्न में होता है। फिर ज्ञानी भिन्न अवस्थाओं के प्रयोग बंद कर देता है, क्योंकि जो भी है वो तो यहीं, अभी मौजूद है।
ज्ञान होते ही सब कुछ सुलझने लगता है, सारी शिकायतें समाप्त हो जाती हैं, अब उसे मुक्ति भी नहीं चाहिये, उसके लिए सब एक खेल जैसा प्रतीत होता है। फिर वो काम करते हुए भी कुछ नहीं करता है, केवल आराम करता है।
८) इच्छा स्मृति से ही प्रकट होती है, इच्छा किसी की नहीं होती है। नाद हर अनुभव का धरातल है और इच्छा भी एक अनुभव ही है। वासना अनुभव और सृष्टि के मूल में है।
आपके लिये जो उपयुक्त मार्ग है उसपर चलने से आनंद, शांती, सुख और मुक्ति बढ़ते जायेंगे, ये मापदंड है आपको सही मार्ग पहचानने के लिए।
शुरुआत में जीवित गुरु आवश्यक हैं, जब चित्त पुरस्कृत या उन्नत हो जाता है, तो सब ठीक है, सब बराबर है। अब गुरुक्षेत्र से सीधे सम्पर्क हो सकता है, वहां कोई भी गुरु मूर्ती, गुरु की छाया बनकर प्रकट हो जाते हैं, जो की गुरु का सूक्ष्म रुप है। जो आपको आपसे मिला दे वो सद्गुरु हैं।
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जो व्यवस्थित रूप से चलता है उसको सौ खून माफ हैं, उसको जो चाहिये वो मैं दूंगा।
चरण सात पर आपका सम्पर्क सीधे गुरुक्षेत्र से करवा दिया जाता है ताकि आपको शरीर वाले गुरु की आवश्यकता नहीं रहे। जो गुरुक्षेत्र के सम्पर्क में आ जायेगा वो मेरे सम्पर्क में सदा रहेगा। हम तो कहीं जाने नहीं वाले हैं, हमेशा मिलते रहेंगे। ज्ञान मार्ग पर सम्पूर्ण नाश हो जाता है, गुरु शिष्य, साधना आदि सभी का।
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सत्संग २७ जूलाई २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) माया में सत्य ढूंढना निरर्थक है। अस्तित्व है, बस इतना ही कहा जा सकता है, समय एक कल्पना मात्र है। शून्य पहले से ही है, कुछ करके शून्य हुआ नहीं जा सकता है। शब्दों में मत उलझें, अपना अनुभव देखिये कि वो क्या है।
चित्त वृत्ति ही चित्त है, और चित्त भी एक तरह की कल्पना मात्र है। अनुभवों की व्याख्या करने के लिए हमने चित्त की कल्पना कर ली है। चित्त को महत् या पराभौतिक परामानसिक पदार्थ भी कहा गया है। केवल अपरोक्ष अनुभव ही दिखेगा, चित्त नहीं दिखेगा कभी भी।
चित्त ब्रह्मनाद है, चित्त वृत्ति कभी बंद नहीं हो सकती है। अज्ञान नाश करने की योग्यता ही सबसे बड़ी सिद्धि है। बिना आत्मज्ञान के चित्त पर नियंत्रण का प्रयास करना निरर्थक है।
२) चित्त वृत्ति निरोध का अर्थ है कि जो अनावश्यक है वो रुक जाता है। रुकना और बंद होना अलग अलग हैं, समाधि में चित्त वृत्ति प्रभाव नहीं छोड़ती हैं, कर्म नहीं बनते हैं। अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच स्थिर हो जाना समाधि है।
चेतना में आते ही चित्त की विभाजन वृत्ति नियंत्रण में आ जाती है, ऐसा लगता है कि चित्त का कुछ भाग थोड़ी देर के लिए रुक गया है। ज्ञान मार्ग पर यह पता चल जाता है कि विभाजन केवल प्रतीत होता है, जबकि समाधि शाश्वत है। अनुभवक्रिया की स्थिति में चित्त का होना ना होना बराबर है। समाधि का अनुभव नहीं होता है, वह आनंदमयी अवस्था है।
३) स्मृति सभी अवस्थाओं में एक समान है, उसमें विभाजन अज्ञान के कारण है। मैं हूँ और स्वप्नों की अनंत शृंखला है, केवल इतना सा ही सत्य है।
जो यह जान गया उसको सूक्ष्म लोकों के प्रयोगों में भी कोई रुचि नहीं रह जायेगी। चिड़ियाघर में कितनी बार घूमने जायेंगे। ज्ञानी जानता है कि सभी अवस्थायें अभी हैं और यहीं हैं।
केवल मैं हूँ, और मैं जो चाहे वो कल्पना कर लेता हूँ। माया आपके संकल्प के अनुरूप अनुभव दिखा देती है, सब मिथ्या ही है। जिसको ज्ञान नहीं हुआ है, उसको अज्ञानवश सब सत्य लगता है।
४) दो अनुभवों के बीच कोई सीमा नहीं होती है, केवल मनगढ़ंत रेखा खींच दी जाती है। जन्म मृत्यु की सीमा भी काल्पनिक है। अवस्था बदलती रहती है, अनुभव कभी बंद नहीं होता है, अनुभवों की अनंत शृंखला है बस।
योगी, ज्ञानी, तांत्रिक का जो संकल्प होता है, वही देवी की कृपा से प्रकट होने लगता है।
५) यह मनुष्य जीवन क्यों लिया है उसको याद करना और फिर उसे लक्ष्य या संकल्प के रुप में स्थापित करना चाहिए। जिसने आध्यात्मिक मार्ग चुन लिया, बाकी गुरुक्षेत्र कर देते हैं, जो जीवन के लिए आवश्यक है वो सरलता से मिलता है। अच्छा है कि सारा प्रारब्ध यहीं खर्च कर दिया जाये, तो जन्म मरण से मुक्ति हो जाती है।
सत्संग में जागने का तरीका बताया जा रहा है, जो सो नहीं रहा है, जो कभी नहीं सोता है, जो सदा दृष्टा है, बस उसे जान लीजिये।
यदि ज्ञान से जागृति में नहीं जागे तो एक और प्रयास करते हैं स्वप्न और सूक्ष्म अवस्था के प्रयोगों के द्वारा यह जानने का की सभी दृश्य केवल मिथ्या मात्र हैं। इस तरह के एक दो अनुभव बहुत हैं। इससे जीवन, मृत्यु या किसी भी चीज से अनावश्यक डर नहीं लगेगा।
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सत्संग ४८, ३१ जूलाई २१, के कुछ मुख्य बिंदु।
१) ब्रह्मज्ञान या जब अनुभव और अनुभवकर्ता भी विलय हो जाते हैं, वो ज्ञान मार्ग का अन्त है।
अद्वैत में सत्य परिभाषित नहीं है। सत्य असत्य द्वैत में ही है।
चित्त की विभाजन क्रिया को भी अनुभव में मिला देने से भी अनुभवक्रिया में स्थित हुआ जा सकता है। ब्रह्मज्ञान शब्दों से नहीं होगा, यह होने वाली बात है।
आत्मज्ञान होता है पर आत्मज्ञानी कोई नहीं होता है।
२) पूर्वाभास एक तरह से विश्वचित्त का प्रमाण है कि चित्त एक ही है।
निधिध्यासन का अर्थ है कि जो ज्ञान हुआ है वो हो जाना है, उसको अपनी जीवन शैली बना लेना। साक्षी भाव यानी अनुभवकर्ता हो जाना है। भाव में भव है, यानी वो हो जाना। ज्ञान मार्ग पर चलना ही श्रवण मनन निधिध्यासन है। व्यवहार, व्यक्तित्व में ज्ञान का प्रकट होना निधिध्यासन है। नित + धी + आसन, निरंतर बुद्धि (प्रज्ञा, चेतना) में बैठना ही निधिध्यासन है।
३) अहम बीज रुप में होता है और बाद में वह दृढ होने लगता है। संस्कारों के कारण स्वप्न अवस्था में स्वप्न अहम भी होता है। सूक्ष्म अवस्था में अहम थोड़ा अधिक स्थिर होता है।
हर अवस्था में परतीय रचना दिखाई देंगी, यानी जगत, शरीर, अहम, बुद्धि आदि। सम्पूर्ण चित्त या स्मृति हर अवस्था में मौजूद है। माया कहीं नहीं जायेगी। अनुभव में जो हो रहा है वो अनित्य है बदलता रहता है, लेकिन अनुभवों का बहाव, शृंखला नित्य, अनंत है। जैसे नदी में पानी बह रहा है, पर नदी नित्य है।
'होने' के भाव को, या 'मैं हूँ' यह ज्ञान, इसको चेतना या साक्षी भाव भी कहा जा सकता है। अनुभवकर्ता को होने का भाव नहीं कहते हैं, अनुभवकर्ता ही अस्तित्व भी है। शब्दों में नहीं उलझना चाहिये, शब्द किस तरफ संकेत कर रहे हैं वो देखिये।
अहम तो ना शरीर है ना मन है, अहम एक प्रक्रिया है, एक वृत्ति है, जो चित्त में चल रही है। आत्मज्ञान होने से यह वृत्ति बंद नहीं हो जाती है, केवल उसका असत्य प्रकट हो जाता है।
अहम की स्थिति ब्रह्मं या अद्वैत में भी हो सकती है, इसलिये कहा जाता है अहम ब्रह्मस्मी। अहम एक झोले की तरह है, ज्ञान लेने के बाद उसका कोई प्रयोजन नहीं है, उसको खाली कर देना है।
४) क्रिया योग शक्ति या कुण्डलिनी मार्ग है।
विश्वचित्त ही तीन गुणों के रुप में प्रकट है, यहीं सृजन, स्थायित्व और विलय हो रहा है।
अद्वैत में सम्भावना मात्र है, जो विलीनता की अवस्था है। अद्वैत में समयहीनता है, सब कुछ पहले ही हो चुका है, केवल सम्भावना मात्र है।
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