रविवार, 19 फ़रवरी 2023

हिंदी सत्संग ३

 


सत्संग ४९, ३ अगस्त २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) मुख से बोला हुआ मंत्र केवल स्मरण दिलाने के लिए उपयोगी है। मंत्र संकल्प द्वारा धारण किया जाता है, उससे नाद, जगत आदि पर प्रभाव पड़ता है, या नाद बदलने लगता है। स्वयं का मंत्र बना लें, वो सबसे अधिक प्रभावशाली होगा।


आत्मज्ञान होने के बाद अहिंसा में स्थिति स्वाभाविक रूप से ही हो जाती है। ज्ञान मार्गी को वो करना है जो उसे पसंद है और जो गुरु ने बताया है। 


२) विश्वचित्त की मूल अवस्था सुषुप्ति की है, अन्य अवस्थायें उसमें बुलबुलों की तरह उठती रहती और विलय हो जाती हैं। 


अंधकार या अज्ञान में किये गये कर्मों का फल उलटा सीधा ही आता है। 


कोई भी अवस्था हो, स्वप्नों की अनंत शृंखला है, और मैं हूँ, यह ज्ञान का अन्त है। 


ज्ञान मार्ग पर आध्यात्मिक प्रगति का अर्थ होता है कि ज्ञान में अवस्थित होना। 


३) यदि ज्ञान होने के बाद भी आनंद की अवस्था नहीं है तो कोई ना कोई बाधा है। आनंद तक पहुंचने के लिए बाधायें आती हैं, जब आनंद मिल गया है तो और क्या चाहिये। 


प्राणी पहले से ही मिथ्या है, उसका मुक्त होना या नहीं होना बराबर है।


आत्मज्ञान से आनंद की स्थिति आ जाती है, ब्रह्मज्ञान से आनंद की भी परवाह नहीं रहेगी। आध्यात्मिक शब्दों का मनगढ़ंत मतलब नहीं लगाना चाहिए। परमानंद सूक्ष्म आनंद होता है जिसमें आनंद की चिंता नहीं होती है। अभी भी आप परमानंद की स्थिति में हैं, केवल जानते नहीं हैं।


जब इच्छा पूर्ति का दबाब नहीं होता है, तो आपके अंदर का आनंद प्रकट हो जाता है। आनंद खालीपन की अवस्था है। जिसकी वजह से आनंद छुप जाता है, यदि वह नहीं रहे तो आनंद है। सुख और दुःख दोनों अभाव हैं, और आनंद इन दोनों का अभाव है।


४) ज्ञान के लिए वेद पड़ना आवश्यक नहीं है। गुरु कृपा से ज्ञान लेने के बाद वेद पढ़िये सब कुछ स्पष्ट समझ में आने लगेगा। 


'कर्म' स्मृति को ही कहते हैं और 'क्रिया' प्रक्रिया है जो स्मृति में बदलाव लाती है। देवी, नाद, स्मृति आदि दिखाई नहीं देती है, वो क्रिया के रुप में प्रकट होती है। अनुभव को देखिये और अपने शब्दों में उसको प्रकट कीजिये। 


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सत्संग ५०, ७ अगस्त २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) नाद रचनायें जब स्थायी हो जाये तो उसे स्मृति कहते हैं। 


जो बदल रहा है वो है ही नहीं, जो पहले नहीं था या बाद में नहीं होगा, वो बीच में भी नहीं है।


ज्ञान मार्ग पर आत्मा परमात्मा नहीं है। ज्ञान मार्ग पर आत्मन और ब्रह्मं कहते हैं, और ये दोनों एक ही हैं। 


२) स्मृति में जो टमाटर है उसको खाया नहीं जा सकता है। ज्ञानी यह जानते ही सारी स्मृति त्याग देता है, कि ये तो मैं नहीं हूँ, और उसी समय कर्म बंधन से मुक्ति हो जाती है। 


पुराना छोड़ देना चाहिए, हर दिन नया है। ज्ञान आते ही जीवन में बड़ा परिवर्तन आता है, क्योंकि आपका सारा जीवन, सम्बंध आदि स्मृति आधारित हैं। ज्ञान होने से विरक्ति आ जाती है, प्रेम मैत्री भाव में बदल जाता है। मोह लेने की चीज है, प्रेम देने की चीज है। 


साधना को गोपनीय बनाये रखना चाहिए, नहीं तो बहुत विरोध आ सकता है। 


ज्ञान का धन कितना भी बांटिये कम नहीं होता है। गुरु सब छीन लेते हैं और इतना दे देते हैं कि और कुछ चाहिये नहीं होता है। 


ज्ञानी किसीको अपने उपर हावी नहीं होने देता है, चालाक भी होता है, ऐसा नहीं है कि वो पायदान बन जाता है, अहम को भी बनाये रखता है आदि, और साथ ही मित्रता, प्रेम से भरा हुआ होता है।


३) परिवर्तन के लिए साधक को तैयार रहना चाहिये। प्रगति का अर्थ ही परिवर्तन है। घटनाओं से आसक्ति नहीं रहनी चाहिये।


एक अवस्था का सत्य दूसरी अवस्था में मिटने लगता है। मृत्यु के बाद इस जीवन में क्या हुआ, सब भुला दिया जाता है। एक ही स्मृति के यदि अनुभव हो गये तो वही सर्वसम्मति है।


जो जान गया है कि मैं कौन हूँ, सबसे उपर वो है, उसकी हर इच्छा पूरी होती है। आप स्वयं ब्रह्मं हो, अपने आप को पहचान लो, यह आपकी लीला है, यही मौज है।


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सत्संग ५१, १० अगस्त २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) अनुभव मूलभूत है, फिर उसको समझने के लिए नाद, स्मृति आदि की परिकल्पना की जाती है। स्वप्न दिखाई देगा पर उसकी प्रक्रिया दिखाई नहीं देती है।


जो उपर की परतों में है, वही नीचे की परतों में भी है, यही स्वसमानता का नियम है। 


२) मैं कोई शरीर, मन आदि नहीं हूँ, मैं ही ब्रह्मं हूँ, मैं पहले से ही पूर्ण हूँ। जैसे सभी कुछ आकाश में ही है, आकाश कहीं नहीं जाता है, वैसे ही सम्पूर्णता कहीं आती जाती नहीं है। सम्पूर्णता की अवस्था अभी और यहीं है, कुछ प्रयास नहीं करना है, उसमें आने के लिए। 


अद्वैत में ज्ञान अज्ञान दोनों नहीं हैं, केवल अज्ञेयता, ज्ञानहीनता, कारणहीनता आदि है। पूर्ण होने के लिए ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। 


३) संधर्भ, स्तर और मार्ग बदलने से सत्य बदल जाता है। 


परिवर्तन का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, उसका आधार अपरिवर्तनीय ही है, दोनों का तत्व भी एक ही है, और वह शून्यता है। 


अज्ञान दुख का कारण है। इच्छा तो मेरी नहीं है, वो तो एक प्रक्रिया चल रही है चित्त में। जब अज्ञानवश यह मान लें कि यह मेरी इच्छा है तो वो दुख देती है।  ज्ञान से दुखों का नाश हो जाता है, दुख भी मिथ्या प्रतीत होता है। ज्ञानी किसी को भी दोष नहीं देता है, वो जानता है कि मेरे ही कर्म हैं। 


अन्त में यह भी ज्ञान हो जाता है कि कर्म भी मेरे नहीं हैं। कैसा भी कर्म कीजिये फल हमारे हाथ में नहीं है, जैसे कि कई बार सम्बन्धों में देखा जा सकता है। 


४) दुख सुख द्वैत हैं, जबकि आनंद मेरा स्वभाव है। सुख दुख, कर्म, चित्त आदि सभी कुछ मिथ्या है, मैं ही सत्य हूँ। 


इच्छा के साथ आसक्ति और अहम भाव जुड़ा हुआ होता है।


सबसे बड़ा धन ज्ञान है। गुरु वही देते हैं आपको जो आपके पास पहले से ही है। जब सब छूट जाता है, तो सब मिल जाता है। जब सब खो जाता है तभी सब कुछ पाया जाता है। 


कर्म से ज्यादा, कर्म के पीछे जो भावना है वह अधिक महत्वपूर्ण होती है। 


५) जो ज्ञान दिया जाता है उसका सार ग्रहण कर लेना चाहिए। मैं ही कृष्ण हूँ यह ज्ञान होने के बाद ही गीता समझ में आयेगी।


एकांतवास का अर्थ है कि मानसिक रूप से दूरी बना लेना, इससे नये गुण दोष इकठ्ठे नहीं होते हैं। साधक जानता है कि सभी कुछ मैं ही हूँ, इसलिये उसका कोई सम्बन्धी नहीं होता है। यदि आत्मिक या आध्यात्मिक सम्बंध नहीं है तो मार्ग में बाधा आ सकती है। 


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सत्संग ५२, १४ अगस्त २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) सम्बन्धों में विचार मिलने आवश्यक हैं, नहीं मिलते हैं तो मैत्री और स्वीकार भाव में रहना चाहिये। जहां विचार मिलने लगते हैं, वहां प्रेम स्वतः ही आ जाता है। ज्ञान के अभाव में अहिंसा भी हिंसा जैसी ही है। 


अहम मिथ्या है लेकिन यह जीवन के लिए उपयोगी है, पर निस्वार्थ भाव से जीना भी सम्भव है। 


२) संकल्प शक्ति, गुरु को समर्पण, कृपा, प्रेम भाव और ग्रहण मुद्रा, चेतना बनाये रखने में सहायक हैं। 


परिवर्तनीय अनुभवों का या जो प्रतीत हो रहा है, उसके बनने या परिवर्तन का कारण ढूंढना निरर्थक है, क्योंकि वस्तुओं का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है। अस्तित्व स्वयं ही अनुभवों के रुप में प्रतीत हो रहा है।


स्मृति के कारण टमाटर थोड़ा स्थायी लगता है, अन्यथा वहां केवल परिवर्तन है। 


३) हम किसी और के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, पर स्वयं के प्रती जिम्मेदारी है हमारी। बाकी आपके स्वयं के नैतिकता के नियमों पर निर्भर करता है। 


आपकी कोई मजबूरी नहीं है, आप पूरी तरह से स्वतंत्र हैं, आप इसी क्षण सब कुछ त्याग सकते हैं। आप जांच लीजिये की यह नैतिक है, हिंसा है या फिर मोह से उपजा हुआ दुख है।


४) चेतना में सब कुछ अच्छा ही होता है। जो अज्ञानवश सोचा गया है वो नहीं होता है। बदलाव ही प्रगति है। 


ज्ञानी ही ज्ञानी को पहचान सकता है। यदि आपको गुरुक्षेत्र से जुड़ने की इच्छा है तो आपकी इच्छा उनकी इच्छा एक हो जाती है। 


५) जब बुद्धि, विचारधारा और भावनायें मिलती हैं तभी सम्बंध गहरे बने रहते हैं। सम्बन्धों की वजह से ही कई बार पुनर्जन्म होता है। ज्ञान मार्ग पर पुराने सम्बंध टूटते हैं पर नये आध्यात्मिक सम्बंध बनते हैं, जिसका एक अपना अलग स्वार्गिक आनंद होता है। 


ज्ञानी का संग और उनसे सम्बंध सबसे अच्छे हैं। सांसारिक व्यक्ति को ठीक करने का प्रयास भी निरर्थक ही होता है। सांसारिक व्यक्ति की बातों को अनदेखा कर दें और उनका विरोध नहीं करें। स्वयं को ठीक करना बहुत है।


ज्ञान मार्ग पर गुरु पूजा वर्जित है। जो गुरु बता रहे हैं उसको देखना है अपने अनुभव और तर्क में। यदि पुरानी साधना छूट नहीं रही है तो ज्ञान मार्ग पर आपकी प्रगति नहीं हो रही है। हर मार्ग आपको ज्ञान मार्ग के लिए तैयार करता है।


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सत्संग ५३, १७ अगस्त २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) सभी अनुभवों के अन्त में तन्मात्रायें दिखती हैं जो अनुभवकर्ता का ही मिथ्या रुप हैं। जो भी प्रकट है वो मिथ्या ही है, सम्भावना मात्र है। सम्भावनाओं का खेल है जो माया के रुप में प्रकट है, जो की होते हुऐ भी नहीं है।


मृत्यु के बाद अहम की अवस्था बहुत क्षीण होती है, क्योंकि अहम का मुख्य कार्य होता है शरीर को जीवित रखना। 


चेतना को मापने के लिए आत्म मूल्यांकन या यह देखने से पता चलता है की वृत्तियों पर कितना नियंत्रण आया है। चेतना जागृत होने पर सुख और मुक्ति बढ़ती जाती है। 


२) ग्रह नक्षत्र को संकल्प के द्वारा हम प्रभावित कर सकते हैं, वो हमको प्रभावित नहीं करते हैं, वो भी माया ही हैं। साधक प्रभाव लेता नहीं है, प्रभाव देता है, क्योंकि अस्तित्व आप स्वयं हैं। कृष्ण अनुभवकर्ता हैं, मैं ही कृष्ण हूँ। 


साधक कम में ही तृप्त रहता है, या न्युन्तावादी होता है। आश्रम को घर मत बनाइये, घर को आश्रम बनाइये, और समाज से एक मानसिक दूरी बना लें।


३) जितना आप माया को प्रसन्न करने का प्रयास कर रहे हैं, माया भी आपको प्रसन्न करने में लगी हुई है। माया को छोड़ना भी नहीं है और इसमें फंसना भी नहीं है। जहां साधक होता है वहां वातावरण शुद्ध होने लगता है।


सबको अपना नहीं समझना है, सब कुछ मैं ही हूँ यह देखना मात्र है। जैसे जीभ दांतों के बीच में रहती है वैसे ही संसार में रहना चाहिये। 


४) जो भी हो रहा है वो अच्छा ही होता है, दुख भी प्रगति में सहायक है। जीवन में सुख और दुःख दोनों लगभग बराबर ही हैं। जो भी ज्ञान और मुक्ति के लिए आवश्यक है वो इसी संसार में मिलेगा। जो आवश्यक है उसे ग्रहण करें, अनावश्यक को छोड़ देना चाहिए।


अस्तित्व में सभी कुछ है, निश्चित, अनिश्चित, सभी सम्भावनायें मौजूद हैं। 


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सत्संग ५४, २० अगस्त २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) चेतना का अर्थ है कि सारे अनुभवों का एक ही दृष्टा है, और वो मैं ही हूँ। मृत्यु का रोज अनुभव करते हैं लेकिन चेतना नहीं रहने के कारण कुछ याद नहीं रहता है। जैसे सबका जीवन अलग अलग होता है, वैसे ही सबकी मृत्यु अलग अलग होती है।


द्वैत का अर्थ है कि अस्तित्व दो रूपों में ही प्रकट होता है, अनुभव और अनुभवकर्ता। जब दोनों को मिला के देखा जाता है तो चित्त विलीन होता है, यानी वो अनुभव का भाग हो जाता है। अद्वैत अस्तित्व की वो अवस्था है जिसमें अनुभव और अनुभवकर्ता में भेद नहीं दिखाई देता है, यही ब्रह्मज्ञान है। मैं हूँ और स्वप्नों की अनंत शृंखला है, यही ब्रह्मज्ञान है, जो की अभी भी आपके सामने प्रत्यक्ष है।


२) जो दिख रहा है वही तो बन रहा है और जो बन रहा है वही दिख रहा है, एक ही क्रिया है। जो बोला जा रहा है उसकी रचना वहां हो रही है जहां सुना जा रहा है, जो अनुभव है वही सृजन है। चित्त की हर अवस्था में यही नियम लागू होता है।


कोई भी तन्मात्रा आपसे भिन्न कहीं और नहीं हो सकती है। मैं जहां हूँ वहीं तन्मात्रा है और इसी का अनुभव होता है। यही सृजन हो रहा है, और इसीको दृष्टि सृष्टि का नियम भी कहते हैं। चित्त के नियम ही चित्त है। मनुष्य स्वयं दृष्टि सृष्टि का परिणाम है। नियम को तोड़ा नहीं जा सकता है, पर उनसे उपर उठा जा सकता है। 


इस स्वप्न का दृष्टा ही सत्य है, वही मैं हूँ। इसी अवस्था को कैवल्य, शिवोहम, समाधि या आत्मज्ञान कहा जा सकता है। 


३) ज्ञान मार्ग में अज्ञान का नाश होता है, कर्म मार्ग पर कर्ता भाव का नाश है, जो अनावश्यक है वो नहीं करना है। ऐसे मार्ग पर चलिये जिसमें आपको स्वाद आये, जो आपको प्रिय हो। 


तन्मात्रा का अर्थ है, तनु (छोटा) और मात्रा (मापना), यानी अनुभव का सबसे छोटा माप। नाद एक अवधारणा है, नाद जहां स्मृति में छपता है, वही तन्मात्रा के रुप में प्रकट होता है। मूल अनुभव नाद नहीं है, पर नाद के द्वारा अनुभव को समझा जा सकता है। नाद स्वयं ऊर्जा या पदार्थ है, पदार्थ और ऊर्जा एक ही हैं। 


पुरुष या अनुभवकर्ता की कोई मात्रा नहीं है। इस तरह शून्य से स्थूल प्रकट है।


४) ब्रह्मं का सगुण रुप प्रकट है और निर्गुण अप्रकट है। मेरा स्वरूप निर्गुण ब्रह्मं है, सगुण माया है। दोनों मैं ही हूँ, यह एक ही के दो नाम हैं, केवल अद्वैत है। 


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सत्संग ५५, २५ अगस्त २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) किसी से नफरत करना भी एक तरह की हिंसा है। ये दुनिया जैसी है वैसी ही ठीक है, इसको कोई ठीक नहीं कर पाया है। ज्ञानी हमेशा अहिंसा चुनता है। दूसरे आपके नियंत्रण में नहीं आयेंगे, जो आप करते हैं उसपर नियंत्रण रखें।


जिसकी चेतना जागृत है वो ना अन्याय सहता है और ना ही अन्याय करता है। अज्ञानी अपनी आसक्ति के कारण ही अन्याय सहता है, और दोष दूसरों को देते हैं। 


भावना जरूरी है कर्म नहीं, मौन के पीछे भावना क्या है वह देखना ज्यादा आवश्यक है। जो उचित है वो करें, और मुझे ऐसा नहीं बनना है इतना ध्यान रहे, यही हमारी शिक्षा है। खुद को सुधारने से अच्छा कोई अन्य कर्म नहीं है।


अपना प्रकाश स्वयं बन जाइये। जो दिखाता है कि कैसे करना है और खुद भी वही करता है, वो गुरु है।


२) मौन रहते हुए अपना विकास कर लीजिये, तो आपकी परिस्थितियां बदलने लग जायेंगी। 


एक हाथ से लेकर दूसरे हाथ से दे देना चाहिए, अपने पास नहीं रखना चाहिये।ज्ञानी का भाव होता है कि जो भी लेन देन है वो मेरे द्वारा नहीं है, या सब कुछ मैं ही हूँ, तो फिर उसके लिये कोई नियम नहीं है। जो देवी के कदमों में है उसको जो चाहिये वो दे दिया जाता है।


३) जब तक आपकी आसक्ति या समर्थन नहीं है तब तक कोई आपको बांध नहीं सकता है। 


जिनका प्रेम भाव उनकी मुक्ति की इच्छा से बढ़कर है, ऐसे महात्मा को संत कहा जाता है। 


ज्ञानी खाना, काम वासना, अहम वृत्ति आदि के प्रती न्युन्तावादी होता है। अहम आपको नहीं चलाये, आप अहम को चला सकें, साक्षी भाव से इतना नियंत्रण आ जाना चाहिए। 


४) यदि सारा ज्ञान होने के बाद प्रेम भाव नहीं आया तो ज्ञान भी नहीं हुआ है। सही से जीवन यदि जी रहे हैं तो संसार भी निर्वाण ही है।


समयहीनता है, यानी सब पहले ही हो चुका है, या फिर कुछ हुआ ही नहीं है। अस्तित्व में सब कुछ है, वो भी है जो पूर्व निर्धारित है, और वो भी है जो अनियमित है, या जो इच्छा शक्ति से होता है, सारी सम्भावनायें हैं यहां पर। पर अन्त में यहां सभी मिथ्या है।


स्वप्न टूटने के बाद भी स्वप्न शुरू रहता है केवल दृश्य बदल जाता है, ऐसा ही मृत्यु के बाद भी होता है। 


५) आत्मज्ञान होने के बाद वो कीजिये जो आपको सबसे अधिक प्रिय है, प्राकृतिक रुप से रहना चाहिए।


जो आपके गुरु हैं वही आपको अच्छे लगेंगे, उन्हीं की बात समझ में आयेगी। गुरुक्षेत्र आपके साथ सदा रहेगा। यही संकल्प लें कि यदि पुनर्जन्म हो भी जाये तो वो सम्पूर्ण चेतना में ही होये, फिर से वही गुरु मिलें और ज्ञान मार्ग मिले। गुरु व्यक्ति भी मिथ्या है, जो यही बताते हैं कि सभी कुछ मिथ्या है। 


जैसे खुद को स्वीकार करते हैं वैसे ही देवी को भी स्वीकार करना चाहिए। शिव और शक्ति मैं ही हूँ। भावना जरूरी है दिखावा जरूरी नहीं है।


६) ज्ञान मार्ग एक जीवन शैली है। अकेले के लिए तो दो होना आवश्यक है, लेकिन यहां तो एक ही है, सभी रुप तो मेरे ही हैं। अगर आप गलत जगह अपनापन ढूँढेंगे तो अकेलापन ही मिलेगा। ज्ञान मार्ग पर चल रहे हैं विकास हो, और परिवर्तन नहीं आये ऐसा तो सम्भव नहीं है।


जो अस्थिर है उसे त्याग दीजिये तो स्थिरता अपने आप आ जाती है। क्षमा, सेवा और दान, साधक के लिए अच्छे गुण हैं।


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मैं हर जन्म में तुमको अलग अलग रुप में मिलूंगा। मेरी कई प्रतिलिपियां अनेक लोकों में घूम रही हैं। माया में तो सब सम्भव है, पर इन सबको सत्य नहीं मानना चाहिये।


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सत्संग ५६, २८ अगस्त २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) व्यक्ति नहीं है यह यदि जान लिया तो सम्पूर्णता ही रह जाती है। चित्त वृत्ति होते हुऐ भी जाना जा सकता है कि केवल अस्तित्व ही है। 'मैं अस्तित्व हूँ', यह भी अहम ही कहता है। केवल ब्रह्मं मात्र है, इतना कहना ही बहुत है। 


सब कुछ ब्रह्मं है, यही जान लेना सभी मार्गों का अन्त है। यही कर्महीनता, लक्ष्यहीनता, मुक्ति और आनंद है। 


२) जो जितना विकसित होगा आध्यात्मिक रुप से, उसका जीवन उतना कम पूर्वनिर्धारित होगा। साधक का कोई भविष्य नहीं होता है, क्योंकि साधक कर्म त्याग देता है, तो उसके जीवन में कुछ नया होने की सम्भावना बढ़ जाती है। 


साधक के कर्म विश्वस्मृति या गुरुक्षेत्र से आने लगते हैं, क्योंकि गुरु कृपा, साधना, चेतना आदि के कारण उसका प्रारब्ध समाप्त हो जाता है। 


शंका और समर्पण में एक तरह का संतुलन रखना चाहिये। 


३) स्वप्न से बाहर आने का रास्ता स्वप्न के अंदर नहीं है, रास्ता आपके हृदय में है। कुछ कर्म करके नहीं निकलते हैं, साक्षी भाव से निकला जा सकता है।


असत्य का प्रमाण ढूंढना मुश्किल है, मिथ्या का प्रमाण मिथ्या ही मिलता है। जबकि सत्य स्वयंप्रकाषित है। 


४) ज्ञान मार्ग पर जिसका प्रमाण नहीं दे सकते हैं उसके लिये प्रयोग बता दिया जाता है, कि स्वयं प्रयोग करके पता कर सकते हैं। 


कारण शरीर में यह योग्यता आ सकती है कि वो एक साथ अनेक जन्म ले सकता है। जिसको आप मेरा कारण शरीर कहते हैं वो मेरा नहीं है, ना मैं हूँ, ना कुछ मेरा है।


गुरु कभी शिष्य को पकड़ता नहीं है, इसलिये कभी त्यागता नहीं है, शिष्य त्याग देता है कभी कभी गुरु को। गुरु शिष्य का सम्बंध कभी टूटता नहीं है, वैसे भी हम सब एक ही हैं।


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सत्संग ५७, ३१ अगस्त २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) मेरा स्वरूप क्या है, बस यही जानने योग्य है। किसी की भी मृत्यु नहीं होती है केवल परिवर्तन होता है। 


जीवन मिथ्या होने के बाद भी, अपने स्वरूप को पहचानने के लिए उपयोगी है।


सबसे निचले स्तर पर 'मैं' अहम भाव है, द्वैत के स्तर पर मैं अनुभवकर्ता हूँ और अद्वैत के स्तर पर मैं ही ब्रह्मं हूँ और मैं है ही नहीं। ज्ञान के भिन्न स्तर पर मैं का अर्थ बदलता रहता है।


२) ज्ञान के सभी साधनों का तत्व अपरोक्ष अनुभव ही आता है। तर्क भी अनुभवों पर ही आधारित होता है।


अपने स्वरूप का स्मरण एक अच्छी विधि है साक्षी भाव में रहने के लिए।


सब कुछ मैं ही हूँ, सबमें एक ही तत्व है, इस तरह से अभिन्नता देख पाना प्रेम या मैत्री भाव है। मोह का त्याग प्रेम है।


३) माया के ज्ञान को विज्ञान कहते हैं। विज्ञान ज्ञानमार्ग की ही एक शाखा है, लेकिन सीमित है।


जो भी आपको आपकी गलती बता दे, वही आपके गुरु हैं। जिसका क्षय हो रहा है वो शरीर है।


अस्तित्व पूर्ण और सुन्दर है क्योंकि उसमें कुछ भी जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता है।


४) व्यक्ति की मिथ्या जान लेने से, सब कुछ ब्रह्मं है, यह दिखाई देने लग जाता है। जब एक व्यक्ति नहीं है, तो अन्य कोई व्यक्ति भी नहीं हैं।


केवल होना मात्र ही समाधि है, अनुभव और अनुभवकर्ता में भेद समाप्त हो जाना, उसीको अनुभवक्रिया कहा गया है। 


मृत्यु लोक में हिंसा या भक्षण के बिना जीवन सम्भव नहीं है, यहां मृत्यु ही जीवन है। आत्म रक्षा के लिए यदि कोई हानी पहुंचाई जाती है तो वो उचित है।


चित्त का ज्ञान चित्त के नियंत्रण में सहायक होता है।


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सत्संग ५८, ४ सितम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) साधक का ध्यान केवल साधना और गुरु पर ही होता है, उसको समाज से कुछ लेना देना नहीं होता है। अज्ञानी का सच भी सुना सुनाया ही होता है। जिस दिन आपको ज्ञान हो गया, उसी समय से आपको स्वतंत्र सोच रखनी चाहिए।


मेरे व्यवहार से किसी को हानि ना हो उतना बहुत है, यदि किसी को मेरे उचित व्यवहार से भी परेशानी होती है तो उसपर ध्यान नहीं देना चाहिए, और उनसे भौतिक या मानसिक दूरी बना लें। सत्य आप जानते हैं, अब अज्ञान में रुचि लेकर क्या फायदा।


आपको आसपास भीड़ इकठ्ठी करके कोई फायदा नहीं होगा। ज्ञानी और अज्ञानी एक छत के नीचे बहुत समय तक नहीं रह सकते हैं। 


२) जो अपने साथ नहीं रह सकता है वह दूसरों के साथ क्या रहेगा। अपने में रमने में जो आनंद है वो उधार के आनंद में नहीं है। 


सब मेरे ही रुप हैं लेकिन व्यवहारिकता में हम सबको अपना समझकर छोड़ देते हैं। 


३) जब बाहर के असर आपपर बेअसर हो जायेंगे तो आपका असर जगत पर पड़ने लगता है। जब एक मार्ग, लक्ष्य और गुरु से जुड़ जाते हैं, तो संकल्प शक्ति बनने लगती है। 


जिस दिन आपको स्वधर्म मिल जायेगा उस दिन आपका जीवन सफल होगा। अनुशाशन और स्वतंत्रता साथ साथ चलते हैं।


मनुष्य के जीवन का लक्ष्य है मनुष्य जीवन से मुक्ति और जीवन का लक्ष्य है सुख और मुक्ति। 


४) स्वयं पर शाशन ही अनुशाशन है। संकल्प होने से जीवन अनुशाशित चलता है। ज्ञान मार्ग पर अनुशाशन, रुचि और संकल्प यदि है, तो बहुत जल्दी ही सफलता मिल सकती है।


प्रेम में अभय होता है, यदि भय है तो कोई ना कोई आसक्ति है। भय अहम को होता है, और प्रेम से अहम का नाश होता है। ब्रह्मज्ञान होना ही प्रेम है। 


कृपा तो बरस रही है, छाता बंद कर दीजिये। अहम भाव का समर्पण कर दिया और जो मिल रहा है, वो ले लेने से गुरुक्षेत्र की कृपा हो जाती है। 


५) जैसे जागृति में कर्ता नहीं है वैसे ही स्वप्न में भी कोई कर्ता नहीं है। स्वप्न अवस्था के प्रयोग सूक्ष्म लोक का द्वार है। चेतना प्रयत्न से नहीं आती है, संकल्प से आती है।


स्मृति से मुक्ति नहीं हो सकती है, ये मेरी स्मृति के अनुभव मेरे नहीं है यह जानते ही, उनसे मुक्ति हो जाती है। अहम जो प्रतिक्रिया करता है उसका भी साक्षी हो जाना चाहिए।


जो बुद्धि चेतना के प्रकाश से निखर जाती है, जो शुद्ध है, वो प्रज्ञा है। लोकों से छुट्टी नहीं है, लेकिन निचले लोकों से मुक्ति सम्भव है।


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सत्संग ५९, ८ सितम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जीव रुप के माध्यम से अनुभव हो रहे हैं, और अनुभवों की शृंखला ही जीवन है। जीवन कालहीन है।


कर्म करते समय बुद्धि का उपयोग कम करते हैं, आदत का ज्यादा उपयोग होता है।


मुमुक्षु साधना कर रहा है मुक्ति के लिए, जब ज्ञान हो गया तो वो जीवनमुक्त होता है, उसने जान लिया है कि मैं पहले ही मुक्त हूँ।


ज्ञान मार्ग में लक्ष्य आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान और माया का ज्ञान है, इसमें भी सबसे महत्वपूर्ण आत्मज्ञान है जिसके बाद बाकी सब अपने आप हो जाता है।


२) चेतना जागृत होने पर, शुद्धि, शांती, आनंद, सभी तरह के अनुभव होने लगेंगे, अधिक नियंत्रण, प्रेम भाव बढ़ जाता है, आदि स्वतः होने लगता है। वृत्तियां शांत होने लगती हैं, जिससे चेतना बढ़ती है, और चेतना बढ़ने से वृत्तियां शांत होने लगती हैं।


अहम भाव समाप्त होते ही कर्म से मुक्ति है। सभी परतों पर अपने अपने कर्म हो रहे हैं, पर कर्ता कोई नहीं है। सभी परतें भी मिथ्या हैं, नाद मात्र है जो की तरह तरह रूपों में प्रकट है, वो भी केवल प्रतीत होता है। अब कौनसा कर्म बच गया। 


अज्ञान का नाश होता है, कर्म चलता रहता है, वो जीव का नहीं है, किसी का नहीं है। कर्म ही स्मृति है, स्मृति ही कर्म है। अद्वैत, द्वैत के स्तर पर कोई कर्म नहीं है। माया के स्तर पर कर्म मेरा प्रतीत होता है। कुछ बदला नहीं जा सकता है, बस स्तरों में उपर उठा जा सकता है।


३) यदि कोई आपको मार्ग से नीचे खींच रहा है, तो उनका साथ देना ठीक नहीं है। किसी को खुश करने के लिए अपना मार्ग छोड़ देना भी ठीक नहीं है। लोग क्या कहेंगे, ये सोचकर अनावश्यक कर्म करने का मतलब है कि चेतना नहीं है। 


साधक को स्वतंत्र होना चाहिए, किसी के कहने में आकर कर्म नहीं करने चाहिये। ज्ञानी में साहस या वीरता का गुण होना चाहिए।


४) जो है नहीं वो माया है, और स्मृति परिकल्पना है, दोनों कारणहीन हैं। धर्म का अर्थ होता है सत्य, जो आधार है।


मैं कर्ता नहीं हूँ, यह जान लेना कर्महीनता है। इसका प्रभाव पड़ता है कि जो अनावश्यक है वो छूट जाता है। जीवन अनंत है, और उससे जुड़े हुए कर्म भी अनंत ही हैं।


एक मार्ग, एक गुरु, एक साधना में स्थिर रहिये तब प्रगति होगी, नहीं तो नहीं होगी। जो शिष्य होता है, वो आध्यात्म को प्राथमिकता देता है।


ज्ञानी के सपने में भी ज्ञान ही होता है। समाधि चित्त की अवस्था है, मृत्यु शरीर का नष्ट होना है। जिसको अभी ज्ञान हुआ है, वही ब्रह्मलीन हो सकता है।


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सत्संग ६०, ११ सितम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) यदि पुरानी मान्यतायें त्याग दें तो बहुत सरलता से आत्मज्ञान हो सकता है। मान्यताओं से बुद्धि अशुद्ध हो जाती है।


ब्रह्मं निर्गुण है, ब्रह्मं ने कोई रुप लिया नहीं है, केवल प्रतिति है, सम्भावना मात्र है। गुण भी माया ही है। माया क्यों है, इसका कोई कारण नहीं है। 


ज्ञान के बाद चित्त में बदलाव और स्वीकार भाव आ जाता है। ज्ञान का लक्षण है आनंद अवस्था में स्वाभाविक रूप से स्थिति। अज्ञान का लक्षण है चित्त वृत्ति को सत्य मान लेना। 


२) चित्त में अवरोध तभी दिखते हैं जब चेतना जागृत हो जाती है। चित्त ही माया है, माया ही चित्त है।


एक ही कारण शरीर कई जन्म ले सकता है, भागों में बँट जाता है, या कई शरीरों में एक साथ प्रकट हो सकता है, और उसका सामानांतर विकासक्रम सम्भव है। जैसे गाड़ी चलाते चलाते और भी कई कार्य किये जा सकते हैं। इस तरह से महापरीवार बनता है। 


नाद अवधारणा मात्र है और अप्रकट है, केवल तन्मात्रायें प्रकट हैं। 


३) अनुभवक्रिया में भेद नहीं दिखाई देता है, अनुभव और अनुभवकर्ता में। अनुभवक्रिया में सब कुछ है, आपकी अभी भी वही अवस्था है। यही ब्रह्मज्ञान है, इसी रुप में ब्रह्मं दिखाई पड़ता है। जो है वो है, यानी तथाता है। सब मान्यताओं को खाली करके ये जान लेना, यही सहज समाधि है। 


यह एक तरह का त्याग है, और जो भी है, वही है, यही अनुभवक्रिया है। अनुभव और अनुभवकर्ता का विलय हो जायेगा, यही ब्रह्मज्ञान है, यही योग है, यही पुरुष और प्रकृति का मिलन है। एकता का अनुभव नहीं हो सकता है, क्योंकि अनुभव है तो द्वैत हो जाता है।


४) सत्य बताने से अधिक, साधक की प्रगति ज्यादा जरूरी है। जब प्रगति होती जायेगी, तो गुरु का झूठ कम होता जाता है।


जब आप आत्मनिर्भर हो जाते हैं, तो मुक्त हो जाते हैं। गुरु से सहायता लेने में कोई बंधन नहीं है। सब एक तरह का प्रपंच मात्र है। 


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सत्संग ६१, १५ सितम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) मेरा स्वरूप क्या है, या तत्व ज्ञान में स्थिर रहना चेतना है। 


अन्तर सम्पर्कता का नियम यानी चित्त की सभी परतें आपस में एक दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं। सबका सम्पर्क सबके साथ है। सब कुछ यहीं है, न स्थान है ना काल है।


जैसे शरीर की रक्षा करते हैं, वैसे मन की रक्षा भी करनी चाहिये। 


२) जो महत्वहीन है उसको महत्व देना भी नहीं चाहिये, जिसके लिये जन्म लिया है, जो स्वधर्म है, जो आवश्यक है, उसको महत्व देना चाहिए। 


कर्म पराभौतिक हैं, इसलिये जहां कर्म होते हैं, उनको वहीं पर नष्ट भी किया जा सकता है। 


३) जब सम्पूर्ण चित्त एक ही अनुभव पर केंद्रित है, तो उसको ध्यान कहते हैं। 


सम्भावना सब प्रपंच करने के बाद फिर सम्भावना मात्र रहती है, उसमें क्या विकास और क्या पतन होगा। कुछ नहीं हुआ है, ना पतन हुआ है और ना ही प्रगति होती है, मैं सत्य हूँ, मैं सर्वदा वैसा ही रहता हूँ।


४) यदि आत्मज्ञान नहीं हुआ है तो साधना निरर्थक है केवल अनुशाशन होना चाहिए। और आत्मज्ञान होने के बाद कोई साधना नहीं है। सभी प्रयोग साक्षी भाव में आने के लिए ही बताये गये हैं। 


ज्ञान टपकता रहता है, उस बारिश में भीगते रहना है। चेतना सर्वदा बनी रह सकती है, उसकी कोई सीमा नहीं है। 


५) आपकी जो स्वाभाविक स्थिति है वही सबसे अच्छी है, उसमें कोई दोष नहीं है। ना कोई कर्म आपका है, और ना ही कुछ बुरा है। साधक उलझता नहीं है संसार में। 


सारी इच्छायें तो अस्तित्व की इच्छायें हैं, तो वो तो फिर होकर ही रहेगा। स्वछन्द आनंद में यदि आप हैं तो कोई साधना नहीं करनी है। खेल चल रहा है, सुन्दर सात्विक जीवन व्यतीत करना चाहिए।


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सत्संग ६२, १८ सितम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) सत्य का संधर्भ अवस्था, स्थिति के अनुसार बदलता रहता है। पर अद्वैत में सत्य का मानदंड हर संधर्भ में, हर परिस्थिति, हर लोक, हर अवस्था आदि में सही बैठता है। 


सत्य का मानदंड बहुत उपयोगी है, उसके आधार पर किसी भी संधर्भ में आपको सब कुछ मिथ्या ही मिलेगा। हर संधर्भ में केवल अनुभवकर्ता ही सत्य निकलता है।


२) अहम और अनुभवकर्ता में वही सम्बंध है जो अनुभव और अनुभवकर्ता में है, अहम भी एक अनुभव ही है। अनुभव और अनुभवकर्ता या तो वो अद्वैत के स्तर पर एक ही हैं या फिर द्वैत के स्तर पर इनमें कोई सम्बन्ध नहीं है। जो बदल रहा है उसका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। 


सुख का मतलब दुख का अभाव है, सुख कुछ कर्म करने से नहीं मिलता है। साक्षी भाव में किये गये कर्म सुखदायी होते हैं। कर्म करने से सुख नहीं मिलता है, कर्म करने से फल मिलता है। सुख और दुख दोनों मिथ्या हैं। 


चेतना का अर्थ है कि सुख और दुख दोनों का साक्षी हो जाना है। मेरा स्वभाव सुख दुख के परे है, आनंद है, कर्महीनता में सुख है। 


३) आत्मज्ञान से पूर्ण आनंद, सुख, मुक्ति यहीं पर, इसी क्षण सम्भव है। 


मेरे सिवा कुछ अन्य है ही नहीं, यही अस्तित्व का प्रमाण है, अनुभव भी मैं ही हूँ। अद्वैत या अस्तित्व के स्तर पर दो नहीं हैं, अस्तित्व एक ही है, और वो मैं ही हूँ। जिसने यह जान लिया कि 'मैं' एक ही हूँ, वही कह सकता है कि मैं ही ब्रह्मं हूँ, या मैं ही अस्तित्व का सार या तत्व हूँ, और यही अनुभवकर्ता है। 


अस्तित्व में एक शक्ती है अनुभव करने की और एक शक्ती है प्रकट होने की। 


४) शरीर, व्यक्ति, स्मृति आदि नियंत्रण नहीं कर सकते हैं, नियंत्रण प्रतीत होता है। नियंत्रण करने वाला कोई नहीं है, पर चित्त के नियम लागू होते हैं। कर्ता भाव भी एक तरह की चित्त वृत्ति ही है।


जो सत्य ढूंढ रहा है वही सत्य है। चेतना वो सूर्य है जो बादलों को हटा देती है। चेतना के प्रकाश में सब आनंद युक्त होता है। अपनी स्मरण शक्ति बड़ा लेनी चाहिए, किसी बैसाखी पर निर्भर नहीं रहना है चेतना बनाये रखने के लिए। साक्षी भाव की आदत डाल लेनी है, फिर वह स्वाभाविक रूप से ही बनी रहती है।


५) धारणा एक तरह की मान्यता है, जो मान लिया गया है। परिकल्पना एक तरह की कल्पना मात्र है, कोई उपयोग है इसलिये मान लिया गया है। अवधारणा का मतलब है कि जान लिया है कि यह धारणा है।


अस्तित्व बंधनहीन है, अस्तित्व सम्पूर्ण रुप से मुक्त है, वहां पूरी तरह से लक्ष्यहीनता है, खेल है। सत्य नित्य है।


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सत्संग ६३, २२ सितम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) कुछ करने से सत्य नहीं मिलता है। कर्ता, कर्म, कर्मफल सभी मिथ्या है। 


अनुभवकर्ता का होना और मैं एक ही है, यही आत्मज्ञान है। 


माया में रहने के लिए माया का ज्ञान होना आवश्यक है, सपने से जागने में ज्ञान काम आता है। 


ज्ञान नहीं होता है, अज्ञान का नाश होता है। सकारत्मक या संचित ज्ञान, विज्ञान होता है। 


समर्पण भाव में निर्भरता नहीं होती है। पूजा में भक्ति और अंधविश्वास आ जाता है। 


२) जागृति में यदि चेतना जागृत है तो इच्छा परेशान नहीं करती हैं। 


सब कुछ होते हुए भी सब कुछ पूर्ण है, यही है अनुभवक्रिया, अभी भी यही है, और यही मैं हूँ। अनुभवक्रिया में स्थापित होने की कोई प्रक्रिया नहीं है।


जिसकी शुरुआत नहीं हुई है उसका अन्त नहीं होता है, स्वीकार भाव में आ जाना ही मुक्ति है। 


३) आत्मज्ञान से इच्छापूर्ति, इच्छाशुद्धि और इच्छामुक्ति जल्दी ही हो जाते है, और स्थिरता आ जाती है। 


इच्छा मेरी नहीं है, मिथ्या है, यह मानते हुए इच्छा पूर्ती करना इच्छा मुक्ति के बराबर ही है। ज्ञानी को खुद तय करना चाहिए कि क्या सही है।


जैसे जैसे ज्ञान होगा शुद्धि शुरू हो जाती है, अनावश्यक, अपवित्र और गलत कार्य बंद हो जायेंगे। ज्ञानी इच्छाओं के वश में नहीं आता, इच्छायें उसके वश में आ जाती हैं। यदि जीवन नहीं बदला है तो फिर ज्ञान नहीं हुआ है।


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सत्संग ६४, २५ सितम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) आप किसी को सुधार नहीं सकते हैं, वो तो उसको स्वयं ही करना पड़ता है।


मैं दृष्टा हूँ, और सभी अनुभव मिथ्या हैं, जब यह भाव होता है, तो उसीको साक्षी भाव कहते हैं।


ऊपरी परतों में बदलाव होने से वो धीरे धीरे निचली परतों में भी दिखाई देते हैं।


समझदार मनुष्य का एक अपना जीवन होता है, अपने लक्ष्य होते हैं, अपनी दुनिया होती है, और वो स्वतंत्र होता है। जो लेने वाला होता है उसको बहुत कुछ अनचाहा भी लेना पड़ता है।


२) जब गति व्यवस्थित रूप से चलने लगती है तो वही प्रगती है। 


अनुभव मेरा ही परिवर्तनशील चेहरा है। नाम रुप और तत्व में भेद चित्त करता है, जो की उपयोगी है। केवल अनुभवक्रिया है, और यह होना मात्र ही अस्तित्व है। यहां इसी पल आनंद, शांती, समाधि है, होना है, सम्पूर्ण है, बाकी सब आने जाने वाले चित्र हैं।


३) ना कर्म करने वाला कोई है ना कर्म रोकने वाला कोई है, पर स्थूल कर्मों के प्रती सचेत रहना चाहिए।


स्वर्ग भी यहीं है नर्क भी यहीं है, चुनाव आपको करना है। 


४) होना अस्तित्व की तरफ संकेत करता है। अस्तित्व में होना ना होना दोनों हैं और दोनों का अभाव भी है। अस्तित्व में अनुभव और अनुभवकर्ता दोनों हैं, दोनों का मिलना ही अद्वैत है। दो प्रतीत होते हुऐ भी एक ही होना, अद्वैत है। उसका तत्व शून्य है, और शून्य ही पूर्ण है।


सारे जन्मों का निचोड़ यहीं है, अभी भी प्रकट है, कारण शरीर में स्मृति के रुप में। 


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सत्संग ६५, २९ सितम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) आकाश या समय का अनुभव नहीं होता है, यह बस कल्पना मात्र है। केवल वस्तुओं का अनुभव तन्मात्रा के रुप में होता है, जो की एक परिवर्तन है।


पंच तत्वों का भी एक मॉडल है जो की उपयोगी है। जैसे अणु का मॉडल रसायन शास्त्र में, या तरंगों का मॉडल भौतिक शास्त्र में उपयोगी हैं।


मुक्ति भागने या कुछ करने से नहीं होती है, जानने से होती है। 


२) ज्ञानी अपने आनंद स्वरूप को पहचान कर, दुख और सुख दोनों के परे चला जाता है। स्वप्न में कुछ ग्रहण करना या त्यागना, दोनों अर्थहीन हैं। 


कल्पना का अर्थ है कि जो स्मृति में है उसको बदल कर देखना। 


जब वृत्तियों पर से ध्यान हटा देंगे, जब वृत्तियां शांत हो जाती हैं, या वृत्तियों का प्रभाव नहीं होता है, इस तरह चेतना में जो आपका नित्य आनंद स्वरूप है, वही रहता है। साक्षी भाव से अन्य चित्त वृत्तियों में भी आनंद की अभिव्यक्ति होने लगती है।


३) सभी अनुभव शून्यता से ही आ रहे हैं और फिर उसमें ही विलीन हो जाते हैं।


जब समय भी मिथ्या है, तो पूर्वनिर्धारित का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता है। 


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सत्संग ६६, ३ अक्टूबर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) सभी अनुभव केवल अनुभवकर्ता को ही होते हैं। 


ज्ञान होने से शरीर भी स्वस्थ होने लगता है। क्या नहीं करना है वही बुद्धिमानी है, फिर जो करना है वो अपने आप ही होता है। 


जिसमें धैर्य नहीं होता है उसकी इच्छायें बहुत प्रबल होती हैं, और वो उसको शांत नहीं बैठने देती हैं। अज्ञान होने से उतावलापन, क्रोध या दम्भ आ जाता है।


२) ज्ञान मार्ग पर साधक को स्वयं को बदलकर बुरे प्रभाव लेना छोड़ देना चाहिये, और गुरुक्षेत्र से प्रभाव लेना प्रारम्भ कर देना चाहिए। जैसे रेडियो पर चेनल बदल दिया जाता है। 


सांकेतिक प्रयास करते रहते चाहिये। कोई भी कर्म आपके नहीं हैं। बहुत सारे कर्म जो समाज द्वारा दिये गये हैं हम उनको लादे रहते हैं, जैसे गधे के उपर बोझा लाद दिया जाता है। हम ज्यादातर वो कर रहे हैं जो दूसरों का दिया हुआ है। स्वधर्म को प्राथमिकता देनी चाहिए।


३) किसी को सुधारना नहीं है। आपके प्रकाश के प्रभाव में किसी का भला होता है तो अच्छा है। यदि कोई आपको परेशान कर पा रहा है तो वो आपकी गलती है, उसकी नहीं। आत्मनिर्भर हो जाइये। 


माया में जो भी है, उसका साक्षी हो जाना चाहिए। ज्ञान एक ही बार होता है, स्मरण या चेतना आती जाती रहती है। चेतना में कुछ रुकेगा नहीं, पर कुछ छुयेगा भी नहीं; कुछ नाश नहीं होता है पर कुछ संचय भी नहीं होगा।


४) ज्ञान का अर्थ है कि सब कुछ संतुलित होना, नियंत्रण में होना। प्रकृति भी संतुलन बनाये रखती है, क्योंकि नाद है। अस्तित्व संतुलन में है इसीलिये शून्य है।


सब कुछ और सभी जीव मुझसे आते हैं और मुझमें ही विलय होते हैं। ब्रह्मं गतिमय होते हुऐ भी स्थिर है, और शून्य होते हुऐ भी प्रकट है। 


गुलामी वैकल्पिक है, अधिकतर बंधन अज्ञान या बुद्धिहीनता की वजह से यह होते हैं। अज्ञान यह है कि मानसिक वृत्तियों को मैं या मेरा मान लिया है। अन्ततः आत्मज्ञान ही समाधान है। 


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सत्संग ६७, ६ अक्टूबर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) यदि जो मिथ्या है वो परेशान कर रहा है, तो अभी भी अज्ञान शेष है। भूतकाल से सीख रख लीजीये बाकी भुला देना ही अच्छा है, क्योंकि भूतकाल और भविष्य दोनों मिथ्या हैं।


सही मुक्ति वह है जब कोई शरीर से बंधा ना रहे। सब कुछ होते हुए भी आनंद में रहना ज्ञान है। जिसको ज्ञान हो गया उसके लिये हर जगह आनंद अवस्था है।


२) सत्य नहीं बदलता, इसीलिये सत्य और प्रेम एक ही है। 


जब स्वाभाविक रूप से मृत्यु पास आ जाये और उसे रोकने की इच्छा ना हो या शरीर से मोह ना होना, इसको ही इच्छा मृत्यु कह सकते है। 


यदि दुख है, असंतोष है तो अज्ञान है। यदि आप जहां हैं वहीं आनंद में हैं तो वही ज्ञान है। केवल गुरु ही बता सकते हैं कि आप अभी अज्ञान में हैं। अज्ञानी को खुद यह नहीं पता होता है कि वो अज्ञान में है।


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सत्संग ६८, १० अक्टूबर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) सकारात्मक ज्ञान माया है, नकारात्मक ज्ञान झाडू की तरह है जो सफाई कर देता है। होना महत्वपूर्ण है, जानना नहीं, मैं ही ब्रह्मं हूँ।


जब चित्त वृत्ति नहीं आती है बीच में, तो जो भी है वो अनुभवक्रिया ही है।


२) जिसको ब्रह्मज्ञान हुआ है, उसके साथ बैठने (सुनने या बात करने से) मात्र से आपको साक्षात ज्ञान हो सकता है कि मैं ही ब्रह्मं हूँ। 


शब्दों से संकेत होता है, आपको शब्दों से परे देखना है, अद्वैत को शब्दों से ना जाना जा सकता है और ना ही बताया जा सकता है। 


३) ज्ञानी के पास कोई विकल्प नहीं रह जाता है नैतिक होने के सिवा। यदि आप नैतिक हैं तो पतन होने की सम्भावना नहीं रहती है और विकासक्रम बहुत तेज हो जाता है।


अद्वैत का मानदंड हर संदर्भ में लागू होता है, यही शिरोधार्य है।


ज्ञान मार्ग पर बुद्धि और चेतना की परत सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।


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सत्संग ६९, १३ अक्टूबर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) आवश्कतायें पूरी हो जाती हैं, पर इच्छायें पूरी नहीं होती हैं।


ज्ञान होना और माया से निकलना एक ही घटना है। मैं पहले भी मुक्त था अभी भी हूँ और हमेशा रहूँगा।


२) अनुभवकर्ता को स्वयं का ही अनुभव होता है। पर क्योंकि वो शून्य है तो उसको मिथ्या रुपी अनुभव ही होंगे।


ज्ञान है या अज्ञान है बीच में कुछ नहीं है। ज्ञान होने के बाद कुछ प्रगति नहीं होती है। अशुद्धि है तो भी मेरा होना केवल होना मात्र है। 


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सत्संग ७०, १७ अक्टूबर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) ज्ञान मार्ग पर यदि किसीका अनुभव हो गया तो वो असत्य है। अनुभव होने में और सत्य होने में भेद होता है। सत्य होना अनुभव होने पर निर्भर नहीं है।


मूल ज्ञान पुस्तकों से नहीं होता है, गुरु के सम्पर्क में आने से ही हो सकता है। 


अनुभवकर्ता में यदि परिवर्तन होता तो वो दिख जाता, इन्द्रियां केवल परिवर्तन ही पकड़ सकती हैं। अद्वैत का ज्ञान नकारात्मक ज्ञान है।


२) कोई चीज यदि स्वतंत्र रुप से विद्यमान है तभी उसका अस्तित्व कहा जा सकता है। जैसे यदि कभी पानी के बिना लहरें दिख जायें तो लहरों का होना सिद्ध हो जाता है। माया भी प्रतीत होती है, उसका स्वतंत्र अस्तित्व मेरे सिवा नहीं है। 


जहां अनुभव और अनुभवकर्ता का विलय हो जाता है, जब उनमें भेद नहीं दिखाई देता है, वो अस्तित्व है। अद्वैत, ब्रह्मं या अनुभवक्रिया को ही अस्तित्व कहा गया है।


जो अनुभव में आ रहा है वही अस्तित्व है यह कहना गलत है। यह शुरू में केवल समझाने के लिए बोला गया था कि अस्तित्व के दो पहलू हैं, अनुभव और अनुभवकर्ता, वास्तव में केवल अद्वैत ही है।


अद्वैत में माया या अनुभवकर्ता में कोई भेद नहीं है, केवल मौन बचता है। अस्तित्व के स्तर पर कोई माया नहीं है। कुछ प्रतीत होता है और उसके होने में बहुत भेद है।


३) जो दिखता है उसको सत्य मान लेना अज्ञान है। यदि आपकी जागृति दस मिनट की हो और स्वप्न सौ साल का हो, तो जब भी आप उठेंगे तो एक नया ही दृश्य दिखाई देगा। फिर जागृती स्वप्न समान हो जायेगी।


अन्त में केवल अज्ञेयता का सन्नाटा बचता है। जब कुछ प्रकट है तब भी शून्यता है, और विलय में भी शून्यता ही है। 


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सत्संग ७१, २० अक्टूबर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) नाद इन्द्रियों द्वारा छनकर स्मृति में पहुंचता है, और स्मृति का अनुभव तन्मात्राओं के रुप में होता है। यही हमारा अपरोक्ष अनुभव है। 


स्मृति हटा दी जाये तो अनुभव नहीं होता है, और स्मृति ही चित्त है। इसलिये सभी अनुभव चित्त के अनुभव हैं और चित्त के द्वारा होते हैं। 


हमें वस्तुओं का अनुभव नहीं होता है।  कुछ तन्मात्राओं को मिलाकर प्रतिति होती है, वही वस्तु है, जो की कल्पना मात्र है, स्वप्न के समान है। जागृति और स्वप्न का स्वभाव एक जैसा ही है, क्योंकि दोनों स्मृति ही हैं।


२) आध्यात्मिक संस्कार पड़ते ही बदलाव होने लगते हैं। लेकिन यहां कर्ता कोई नहीं है, जो भी होता है वो चित्त के नियमों के अनुसार होता है।


कृपा दृष्टि उनपर ही होती है जो अपना उद्धार करने में तत्पर हैं। वो यदि गलत रस्ते पर चले जाते हैं, तो गुरु उनको वापस ले आते हैं, यही कृपा दृष्टि है।


३) मेरी इच्छायें कौनसी हैं और कौनसी इच्छायें समाज के द्वारा थोपी हुई हैं, आत्म मंथन के द्वारा इसमें भेद करना आवश्यक है। इसको पहचानकर अपने स्वधर्म में आ जाना चाहिये।


अहम दोहरी माया है, वह तो है ही नहीं। मेरा कुछ भी नहीं है, मैं ही सब कुछ हूँ, या केवल सब कुछ है, जब यह ज्ञान होता है तो उसमें अहम कहीं नहीं होता है। 


केवल होना मात्र ही है, यही अनुभवक्रिया या ब्रह्मज्ञान है। मुझे मैं ही प्रतीत हो रहा हूँ, मैं हूँ और स्वप्नों की अनंत शृंखला है।


करना कुछ नहीं है होता है, देखना नहीं है दिखता है। स्वप्न जाता नहीं है, जो आया नहीं है वो जायेगा नहीं। आपको दृष्टा बनना नहीं है, आप पहले से ही दृष्टा हैं। जो मैं नहीं हूँ उसको करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता है।


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सत्संग ७२, २४ अक्टूबर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) प्रमाण का अर्थ है कि ज्ञान को कैसे नापा गया है, सिद्ध कैसे किया गया है।


मानदंड जानते बुझते हुए लिये जाते हैं, धारणायें अंधकार में या अज्ञानवश बनती हैं। 


२) अनुभवकर्ता अनुभव के बिना पूर्ण नहीं है, इससे अनुभवकर्ता का तत्व शून्य है इस बात का खंडन होता है। अनुभवकर्ता क्या है यह जाना नहीं जा सकता है, लेकिन कुछ तो होगा।


सर्वसम्मति या सर्वभौमिकता के कारण ही अहिंसा को नैतिक माना गया है। 


३) शून्यता में गति नहीं है केवल प्रतीत होती है। अद्वैत के स्तर पर, आप ही स्वयं को मिथ्या रुप में प्रतीत होते हैं।


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सत्संग ७३, २७ अक्टूबर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जब सभी अवस्थाओं में चेतना कायम हो जाये, वो तुरीय अवस्था है। सभी मार्गों में चित्त शुद्धि ही होती है।


जब तक अज्ञान है तभी तक लक्ष्य है, या मार्ग है। जीव को उसके संस्कार चलाते हैं लक्ष्य नहीं चलाते हैं। ज्ञान यह है कि मैं ही सम्पूर्णता हूँ, कहीं जाना नहीं है।


लक्ष्य का कारण अज्ञान है और अज्ञान का नाश करना ही लक्ष्य है। अस्तित्व में कुछ होता नहीं है, शून्य है। अद्वैत के स्तर पर कोई रचना नहीं हुई है, सम्भावना मात्र है। कोई कर्ता नहीं है, केवल सम्भावना है जो की मिथ्या रुप में प्रकट है।


२) वो कीजिये जो स्वधर्म है, जिससे आनंद मिलता है, जिससे हल्कापन लगता है, वो मत करिये जो अज्ञानी जन या समाज बताता है। 


जिनको ज्ञान है, उनमें मानसिक शोर नहीं होता है। आनंद अवस्था में स्थिर रहिये तो आपको अपनी सारी योग्यतायें वापस मिल जाएंगी।


३) जो आवेग या उतावलेपन में किया जाये वो अनावश्यक है, और जिसको टाला नहीं जा सकता है वो आवश्यक है। इच्छाओं की पूर्ती कीजिये आवेगों की नहीं। 


जो आवश्यक है वो करते रहेंगे तो बहुत जल्दी कर्ता भाव चला जायेगा और कर्महीनता आ जाती है। जो आवश्यक है वो मेरा नहीं है, वो बस चल रहा है, वो अपने आप हो रहा है। 


जो सही मार्ग पर हैं उनकी इच्छायें अपने आप पूरी होने लगेंगी। क्योंकि मेरी कोई इच्छा नहीं है, सभी इच्छायें केवल माया की हैं। 


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सत्संग ७४, ३० अक्टूबर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) स्वयं से साक्षात्कार कर लीजिये तो सत्य से साक्षात्कार अपने आप हो जायेगा।


अज्ञानी असत्य पर मोहित हो जाता है उसको छोड़ नहीं सकता है। दुख और पीड़ा का होना, पशुवृति, अज्ञान का भी अज्ञान, अंधविश्वास, डर आदि, अज्ञानी के लक्षण हैं। जिसने अज्ञानी को जान लिया वो ज्ञानी है।


२) अनुभवकर्ता में कोई ज्ञान नहीं है, ज्ञान चित्त में होता है। 


चित्त विभाजन करता नहीं है, कोई कारण नहीं है विभाजन का, विभाजन केवल प्रतीत होता है, या केवल सम्भावना मात्र है।


३) कोई कर्म होगा तो उसका प्रभाव भी अवश्य आयेगा, उसमें अच्छा बुरा कुछ नहीं है। कारण और प्रभाव दोनों चित्त निर्मित हैं। मैं सभी नियमों के परे पहले से ही हूँ, मैं ना कर्ता हूँ ना ही भोक्ता हूँ, यह ज्ञान है। 


कर्म का निर्धारण मान्यताओं, धारणाओं, भावनाओं आदि से नहीं होना चाहिए। कर्म का निर्धारण बुद्धि, आवश्यकता और क्या वो आपको प्रिय है, इससे होना चाहिए। इससे कर्मों पर नियंत्रण आ जाता है, कर्महीनता आती है, और जीवन में सुख बढ़ने लगता है।


४) चेतना में रहने का प्रयास ही आपको प्रयासहीन करता है, बुद्धि के द्वारा ही बुद्धि को काटा जाता है और साधना के द्वारा ही साधना का अन्त किया जाता है। 


यह एक तरह की आग है, जो इंधन को जला देती है और फिर स्वयं भी बुझ जाती है। साक्षी भाव से चित्त शुद्धि होती है, या बुद्धि पुरस्कृत होती है, और यही उसका प्रयोजन है।


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सत्संग ७५, ३ नवम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) साक्षी भाव से अनचाही वृत्तियों का नाश हो जाता है। आध्यात्म का अन्त ज्ञान मार्ग पर ही होता है।


परिवर्तन को मिथ्या कहते हैं क्योंकि उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, सम्भावना मात्र है, और परिवर्तन काल के अधीन है। तत्व का अनुभव नहीं हो सकता है, इसलिये जो अनुभव में आता है उसको मिथ्या कहा गया है। समय की गति बड़ा देने से समय की भी माया प्रकट हो जाती है।


ज्ञान के साधन होने के बाद भी अज्ञान शेष रह जाता है क्योंकि जीवन में सत्संग या गुरु नहीं हैं। मिथ्या अहम का ज्ञान होना ही आत्मज्ञान है, या 'अहम सत्य है' इस अज्ञान का नाश होता है। अहम की स्थिति बदलकर आत्मन पर आ जाती है। आत्मज्ञान से अहम की शुद्धि हो जाती है। 


२) जब ज्ञान को भी त्याग दिया जाता है, वही ब्रह्मज्ञान है। मैं ही तत्व हूँ, होना मात्र है, पर वो तो मैं पहले से ही हूँ, इसलिये ब्रह्मज्ञान में अज्ञेयता है। ब्रह्मं में ना ज्ञान है ना अज्ञान है, और दोनों हैं।


आनंद अवस्था में ज्ञान भी निरर्थक ही है, केवल अज्ञेयता ही बच जाती है। 


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सत्संग ७६, ७ नवम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) आत्मज्ञान होने के बाद या तो इच्छायें आयेंगी नहीं, यदि आ गई तो तुरंत पूरी हो जाती हैं, या फिर अनावश्यक इच्छाओं को त्याग दिया जाता है।


ऐसे कर्म करने चाहिये जो आपको कर्महीनता में लें रखें। आत्मज्ञान होने के बाद लक्ष्यहीनता भी आ जाती है, पर उसमें भी अधिक समय नहीं रह सकते हैं। इसलिये साधकों का उचित मार्गदर्शन या आध्यात्मिक सेवा करना ही लक्ष्य रह जाता है। जो कुछ ना करके भी संतुष्ट है, वो आनंद अवस्था में स्थित है। 


२) यदि स्वप्न में चेतना नहीं है तो स्वप्न का कोई उपयोग नहीं है। 


बहुत बार लोग निर्भरता पसंद करते हैं, स्वतंत्रता नहीं। डर का कारण अज्ञान है, और ज्ञान से निर्भयता आती है। 


ज्ञान मार्ग सीधा मार्ग है, यहां पर समाज या किसी भी बंधन के बाबजूद भी प्रगति करी जा सकती है। 


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सत्संग ७७, १० नवम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) नाद मिट्टी है, स्मृति इंट है, चित्त घर है, महाचित्त शहर है। स्मृति नाद है, जो थोड़ा जम गया है। चित्त स्मृति पर आधारित एक रचना है, या जब स्मृति परतों में जम जाती है, तो उसको चित्त कह देते हैं। 


आपका मेरा चित्त कुछ नहीं है, चित्त एक ही है, एक ही सत्य भिन्न रूपों में दिखाई पड़ रहा है। 


२) उत्तरजीविता के लिए विभाजन आवश्यक है, और सत्य जानने के लिए विभाजन हटाना जरूरी है। विभाजन जरूरी है लेकिन मिथ्या है, इसलिये उसे स्वीकार करना चाहिए। अनुभवकर्ता की तरह जीव को भी स्वीकार भाव में आ जाना चाहिये, कि ऐसा ही है।


जो अव्यक्त है वो सत्य है, जो व्यक्त है वो मिथ्या है। 


३) आम आदमी को मृत्यु का डर होता है, साधक को जन्म का डर होता है कहीं जन्म ना हो जाये, पर जो समर्पण भाव में है उसे कोई डर नहीं होता है।


ना कुछ खास है ना कुछ आम है, ना कुछ श्रेष्ठ है ना कुछ नीच है, सब बराबर है।


४) पसंद नापसंद थोड़ी देर ही रहती है, लीला हमेशा चलती रहती है। सुख दुख दोनों ही मिथ्या हैं। पूर्णता में सुंदरता है, जीवन में नहीं है, जीवन द्वैत है। सुख भी एक तरह का दुख है जो चला जाता है। आनंद मेरा स्वभाव है जो कहीं नहीं जाता है। 


जहां आनंद है वहीं मुक्ति है, जहां मुक्ति है वहीं आनंद है, यही आत्मज्ञान है। जो भी है वो पूर्ण है, सुन्दर है और मैं आनंद हूँ। मैं की स्थिति माया से हटकर आनंद में आ जाती है। जो परदे पर दिखता है वो मैं नहीं हूँ, परदा ही मैं हूँ, परदा ही आनंद है।


ज्ञान मार्ग पर बुद्धि का उपयोग करना है अज्ञान को काटने के लिए, उसके बाद उसको भी छोड़ देना है, बुद्धि को सर पर ढोना नहीं है। अनुभवकर्ता में बुद्धि नहीं है, उसमें आनंद है। 


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सत्संग ७८, १५ नवम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) सत्य धारणा है और व्यक्तिनिष्ठ है। जब सब कुछ असत्य दिख जाये तो छोड़ दीजिये सत्य असत्य को, मैं ही सत्य हूँ। 


और अद्वैत के स्तर पर तो मैं ही ब्रह्मं हूँ, वहां सत्य असत्य का कोई अर्थ नहीं है, वहां कोई विभाजन नहीं है। जो है वो है, इसीको अनुभवक्रिया भी कह सकते हैं, यह बहुत सरल है। यही आनंद अवस्था है, अज्ञेयता है। अनुभवक्रिया में अज्ञेयता ही है, क्योंकि ज्ञान तो बुद्धि द्वारा ही होता है।


जो अज्ञान को सही मानता है कि यही ज्ञान है, वो मूर्ख है, और जो यह कहता है कि मुझे अद्वैत का ज्ञान हो गया है वो भी मूर्ख है, केवल अज्ञेयता ही है। जो है वो है और वही आप हैं, बस इससे ज्यादा कुछ और नहीं जाना जा सकता है। यह ज्ञान मार्ग का अन्त है, यही अद्वैत की स्थिति है। 


२) द्वैत के स्तर पर, सुख दुख या माया के स्तर पर, साक्षी भाव महत्वपूर्ण है। अद्वैत के स्तर पर साक्षी भाव का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता है।


गुरु सत्य का दर्शन कराते हैं कि जो भी तुमने जाना है उसको त्याग दो। ज्ञान के साधन और सत्य के मानदंड के उपयोग से, जो भी आवश्यक है वह जाना जा सकता है, उसके बाद बुद्धि शांत हो जाती है। 


यदि ज्ञान ने सफाई का काम नहीं किया है, कुछ भर गया है अंदर, तो यह तो अज्ञान से भी बुरी स्थिति है। किताब पढ़कर अर्धज्ञानी होने का खतरा है। 


३) वस्तुओं या दूसरों में प्रेम ढूंढना, भावनाओं में बह जाना, दुखी रहना आदि भी एक तरह की लत है। चेतना, विवेक, बुद्धि और विरक्ति से इन अशुद्धियों का नाश किया जा सकता है। 


परिस्थितियों को ठीक करने के प्रयास से ज्यादा अच्छा रहेगा की उनसे कुछ सीखना चाहिए। 


४) हर अवस्था की पृष्ठभूमि समाधि या अनुभवक्रिया की ही होती है। समाधि शांती है, मौन है। समाधि में आने के लिए कुछ प्रयास नहीं करना पड़ता है, क्योंकि कोई कर्ता है ही नहीं।


कर्मों के फल को रोकना भी उचित नहीं है, क्योंकि फिर जन्म लेना पड़ सकता है उनको भोगने के लिए। 


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सत्संग ७९, १७ नवम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जिज्ञासा, भावना और बुद्धि के बीच की वृत्ति है। चित्त की सभी परतें जीवन के लिए उपयोगी हैं। 


गुरु व्यक्ति में गुण अवगुण दोनों होते हैं। पर गुरु में गुरुत्व गुरुक्षेत्र के कारण होता है। गुरुव्यक्ति तो सीमित है, गुरुक्षेत्र असीमित है, उनसे सीधे जुड़ जाइये। 'मैं' हटा दीजिये और ज्ञान ले लीजिये, तो गुरुक्षेत्र से सम्पर्क हो गया है। 


२) अन्त में गुरु ही शिष्य का हाथ पकड़ता है। 


सबसे बड़ा पद है ब्रह्मपद या ब्रह्मं की अवस्था वो अभी है, हमेशा से थी और हमेशा रहेगी। 


कहानियां असत्य होती हैं पर उसमें जो पाठ सिखाया गया है वो सत्य हो सकता है। जो स्वप्न से जाग गया है वो गुरुक्षेत्र के सम्पर्क में आ गया है।


३) अनुभवों की शृंखला जीवन है, उसमें से एक अनुभव मानव होने का भी है। अनुभवों की शृंखला अनन्त है। मृत्यु असत्य है, जैसे स्वप्न बदलते हैं, शरीर बदलते हैं, लेकिन जीवन अनन्त है।


मिथ्या में समस्याओं का कोई अन्त नहीं है। बस यह समझ लेना है कि मैं यह सब कुछ भी नहीं हूँ। संसार में सुख ढूंढना निरर्थक है। 


आत्मज्ञान होने के बाद केवल आनंद अवस्था, लक्ष्यहीनता और बेफ़िक्री ही बाकी रह जाती है। अज्ञान छोड़ने में समय लगता है, ज्ञान होने में कोई समय नहीं लगता है।


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सत्संग ८०, २१ नवम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जो ज्ञान होते ही आनंद अवस्था में आ गया है, उसके लिये कोई प्रयोग आवश्यक नहीं है। जो पहले से ही है उसीको प्रयोग से जाना जा सकता है, जो है ही नहीं उसको प्रयोग से भी कैसे जान सकते हैं। अशुद्धियों के कारण मन भटकता है। 


२) जो पहले से ही है उसकी इच्छा करना निरर्थक है। और जो पहले से नहीं है, वो सब मिथ्या ही है। इच्छा भी उसकी होती है जो पहले से ही तय है।  सभी सम्भावनायें पहले से ही हैं, बस एक के बाद एक प्रकट होती रहती हैं। 


सम्भावनायें इच्छा के रुप में प्रकट होती हैं, उसपर कर्म होता है, अनुभव होता है, उसके संस्कार बनते हैं, जो एक सम्भावना मात्र है। यह चक्र चलता रहता है।


जो भी है वो पहले से ही हो चुका है, फिर भी हम चाहते हैं कि ऐसा ही हो जाये, यही माया है। यही बंधन है, कि आप जानते नहीं है कि सब कुछ पहले से ही हो चुका है। जो हो रहा है वही पूर्ण है, वही मेरी इच्छा है, जो स्वीकार भाव में रहता है, ऐसा व्यक्ति आनंद में है।


आनंद कहां चला गया ये मत सोचिये, ये देखिये कि मुझे वो इच्छा कैसे हुई जिसका फल अभी प्रकट हो रहा है।


३) जहां कोई सम्भावना ही नहीं है कुछ होने की वो मैं हूँ, खालीपन ही आनंद है। कुछ भी होता है वो चित्त है, चित्त कभी रुकता नहीं है, अनुभवकर्ता कभी चलता नहीं है। 


जो मुक्त है वो सदा से ही मुक्त है, जो बंधन में है वो सदा बंधन में है, लेकिन बंधन मिथ्या है। 


भाग्यवाद का अर्थ है कि कर्म करते रहो क्योंकि यही तय है, यही लिखा हुआ है। समयहीनता है, सब कुछ पहले से ही हो चुका है, कोई कर्ता नहीं है, फल मेरे हाथ में नहीं है, लेकिन फिर भी कर्म पूरी तत्परता से करना चाहिए। यही बद्धिमत्ता है।


४) सत्य को बोलकर व्यक्त नहीं किया जा सकता है, सत्य हुआ जा सकता है।


अंधविश्वास या अंध-अविश्वास दोनों का ज्ञान मार्ग पर कोई उपयोग नहीं है। श्रद्धा का अर्थ है कि अपने अनुभव और तर्क पर यह देखना की ऐसा ही क्यों कहा गया है। जैसे गुरु शिष्य को सभी कमियों के साथ स्वीकार कर लेते हैं, वैसे ही शिष्य जब स्वीकार भाव में आता है उसको श्रद्धा कहते हैं।


५) जब साधक गुरु के समान हो जाता है तो गुरु उससे संतुष्ट हो जाते हैं। साधक जब तक ज्ञान में पूरी तरह से स्थापित नहीं हो जाता है, तब तक गुरु की आवश्यकता पड़ती है।


सारे सम्बंध अज्ञान के कारण ही बनते हैं। अज्ञानी को खुद में अज्ञान है तो दुख होता है, दूसरों को ज्ञान हो तब भी दुख होता है। यदि जीवन में संघर्ष है तो इसका अर्थ है कि अभी अज्ञान बचा हुआ है।


प्रश्नों के उत्तर जानकर क्या करेंगे, यहां अज्ञेयता है, समर्पण भाव और आनंद अवस्था में स्थित रहिये।


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सत्संग ८१, २४ नवम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) मैं बंधन में हूँ यह अज्ञान है, और मैं सर्वदा मुक्त ही हूँ यह ज्ञान है। मुक्ति क्या है यह जानने के लिए, बंधन क्या है यह जानना आवश्यक है। ज्ञानी के लिए बंधन मुक्ति बराबर है अद्वैत है, यह जान लेना ही मोक्ष है।


ज्ञान के प्रति समर्पण भाव और प्रेम ही भक्ति है। 


विकास और विलय का चक्र कभी बंद नहीं होता है, क्योंकि कभी शुरू ही नहीं हुआ है तो बंद कैसे हो सकता है। जैसे स्वप्न में देखा गया कुछ जागने पर पूरा नहीं किया जा सकता है।


२) ज्ञानी के लिए ठहराव और परिवर्तन दोनों एक बराबर हैं। 


मैं साक्षी हूँ और जिसका भी मैं साक्षी हूँ वो सब कुछ मिथ्या है, दो है ही नहीं, केवल अद्वैत ही है। बस इतना सा ही सम्पूर्ण ज्ञान है।


जैसे पानी पर लकीर नहीं बनाई जा सकती है, वैसे ही ज्ञानी या साक्षी भाव में कोई संस्कार नहीं बनते हैं।


३) आत्मन की कोई इच्छा नहीं है, यही आत्मज्ञान है। 


यदि देते समय कुछ अपेक्षा की गई है तो वो भी बंधन बन जाता है। 


अनासक्ति और चेतना बनाये रखने से प्रगति बहुत तेज हो जाती है। सभी इच्छाओं का अन्त करने के लिए एक इच्छा का प्रयोग करते हैं और अन्त में उसको भी छोड़ देते हैं। 


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सत्संग ८२, २८ नवम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) अनुभव का कभी अन्त नहीं होता है क्योंकि उसकी कोई शुरुआत भी नहीं है, जैसे मैं हूँ - अनुभवकर्ता। 


अद्वैत में ज्ञान अज्ञान दोनों हैं और दोनों का विलय है, यहां अनुभव का विलय अनुभवकर्ता में हो जाता है।


२) कर्ता नहीं है तो कर्म भी नहीं हैं, केवल प्रतीत होता है, और जो प्रतीत होता है वो भी शून्य ही है। 


अनुभवकर्ता और अनुभव एक ही है, कोई माध्यम नहीं है बीच में। घड़े और मिट्टी के बीच में कोई माध्यम नहीं है, दोनों एक ही हैं। घड़े का मिट्टी के सिवा, कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, केवल प्रतीत होता है। कारण प्रभाव, प्रक्रिया, बुद्धि आदि सभी कुछ अनुभव हैं, मूलभूत जो भी है बस वैसा ही है। 


३) जब चेतना तीनों अवस्थाओं में अखण्ड रहे उसको तुरीया कहते हैं, या जो अवस्थाओं के परे है वो तुरीया है। आनंद तुरियातीत है, जो की मैं स्वयं ही हूँ। 


सभी अनुभव एक ही तरह के हैं, जागृत अवस्था भी सूक्ष्म ही है। यदि चेतना जागृत है तो सारा अनुभव निरंतर है, कोई भेद नहीं रहता है। सारे भेद काल्पनिक और चित्त निर्मित हैं, चेतना नहीं होने के कारण उनको सत्य मान लिया जाता है। प्रयोग करने से एक या दो अनुभवों से यह स्पष्ट हो जाता है। ज्ञानी अनुभवों के पीछे भी नहीं भागता है। 


जागृत अवस्था में भी आप भूल गये हैं कि यह स्वप्न है, आप जागृत अवस्था को सत्य मानते हैं, या इस जीवन को मेरा जीवन है ऐसा मानते हैं। वास्तव में यहां मेरा तो कुछ भी नहीं है। अखण्ड चेतना आवश्यक नहीं है, जागृति में चेतना रखना बहुत है।


४) जन्म ही वासना पूर्ति के लिए हुआ है, नहीं तो जन्म ही नहीं होता। यदि सारी इच्छाओं से मुक्ति हो जाती है तो अपने आप ही जन्म रुक जाते हैं। 


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सत्संग ८३, १ दिसम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) ज्ञान कभी बदलता नहीं है, जबकि अज्ञान बदलता रहता है। 


अनुभवकर्ता अद्वैत के स्तर पर ब्रह्मं के रुप में देखा जा सकता है। 


२) जब तक व्यक्ति है तब तक क्षमा भाव या करुणा नहीं आ सकती है। 


जो समर्पित नहीं हैं उनको आज्ञा नहीं दी जाती है उनको सुझाव दिया जाता है।


नैतिक अनैतिक चुनने के लिए आप स्वतंत्र हैं, पर जो भी फल आता है उससे कुछ सिखना चाहिये। मैनें कुछ नैतिक किया है या कुछ अनैतिक किया है, दोनों अज्ञान हैं।


३) विचारहीनता आनंद नहीं है, आनंद विचारों के साथ भी मौजूद है। 


जो मृत्य है वो पहले से ही मृत्य है, जो जीवित है वो हमेशा जीवित है। 


सुख भी माया है दुख भी माया है, आनंद सत्य है, आनंद सुख और दुख का अभाव है। 


४) रस्सी कभी सांप नहीं बनी, केवल प्रतीत होता है, भ्रम है। जो भी परिवर्तनशील है वो भ्रम है, प्रतिति मात्र है। 


जो परिवर्तित होता है वो कभी हुआ ही नहीं है, जैसे कोई झूठी खबर, उसको असत्य कह दिया गया है। जो हुआ ही नहीं वो असत्य है।


सम्पूर्ण बंधन मुक्ति साक्षी भाव में ही सम्भव है। 


गुरुक्षेत्र से कुछ भी मांगने में शर्माना नहीं चाहिये। जैसे एक बच्चा अपनी माँ से कुछ मांगता है, वो माँ से निवेदन नहीं करता है, बेझिझक मांग लेता है।


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सत्संग ८४, ५ दिसम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) उत्थान और पतन एक वृत्त की तरह चलता रहता है। जो शुरू ही नहीं हुआ उसका अन्त नहीं हो सकता है। रस्सी कभी सांप नहीं बन सकती है। माया में जो कुछ भी है वह केवल प्रतीत ही होता है।


वस्तुओं की भी गिनती नहीं हो सकती है क्योंकि वो परिवर्तनीय हैं। वस्तुएं भी सर्वव्यापि हैं, एक सम्भावना मात्र है जो प्रतीत होती है। जो सम्भावना प्रकट है सीमित रुप में, उसीको अनुभव कहते हैं। 


२) चेतना में रहने से थोड़ी शांति रहती है, विरक्ति आ जाती है, यही दुखों का अन्त है, लेकिन माया नहीं समाप्त होगी। 


यदि भूतकाल में भी कुछ नकारत्मक हुआ है तो उसके प्रति क्षमा और स्वीकार भाव में रहिये, की उसमें किसी की भी गलती नहीं थी, और आगे से सात्विक जीवन जियें।


३) ज्ञान मार्ग में माया का ज्ञान होने से ही उसका उपयोग अपने आप ही आ जाता है। माया का ज्ञान अनन्त है, सत्य का ज्ञान छोटा सा है, इसलिये सत्य से शुरुआत कीजिये। जो भी सत्य नहीं है, वो माया ही है।


आध्यात्म की इच्छा अंतिम होती है उसके बाद सब छूटने लगता है। संसार आसक्ति और अज्ञान का फल है, और निर्वाण विरक्ति और ज्ञान का फल है। यात्रा समाप्त नहीं होती है, यात्री समाप्त हो जाता है।


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सत्संग ८५, ८ दिसम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) साधक में सबसे महत्वपूर्ण गुण ध्यान का है। यदि ध्यान तेज है तो अन्य सभी गुणों को प्राप्त किया जा सकता है।


स्वार्थ के परे जाने के लिए शुरुआत में आध्यात्म में स्वार्थी होना पड़ता है। आध्यात्मिक स्वार्थ ही हमें निस्वार्थी बनाता है।


हर तरह की सम्भावना व्यक्त करना मेरा स्वभाव है, और यह जानना ही मुक्ति है। अब कुछ और नहीं हो सकता है, यही अंतिम ज्ञान है।


अद्वैत का ज्ञान द्वैत रुप में ही होगा, परन्तु सत्य यही है कि द्वैत कहीं नहीं है। सहज समाधि की अवस्था ही नित्य अवस्था है, बाकी सभी अवस्थाएं इसकी पृष्ठभूमि में ही आती जाती रहती हैं। सारा खेल इसी परदे पर चलता है।


२) यह कहा जा सकता है कि, जागृत अवस्था भी स्वप्न की तरह ही है, चित्त निर्मित है, जो की महाचित्त की स्मृति से उभरती है। लेकिन मैं स्वप्न का भाग नहीं हूँ, मैं ही स्वप्न दृष्टा हूँ। 


जागृत और स्वप्न दोनों ही स्मृति हैं, छाया मात्र हैं। स्वप्न एक घटना है, जिसका मैं दृष्टा हूँ। ऐसे ही जागृत अवस्था भी एक स्वप्न की तरह है जिसका मैं दृष्टा हूँ, यहां भी मेरा कुछ नहीं है, केवल शून्यता मात्र ही है।


३) अस्तित्व का कोई कारण नहीं है और सभी कारण अस्तित्व में ही होते हैं। 


किसी भी अवस्था में जो दृष्टा, दृश्य के बदलने के बाद रह जाता है, मैं वो हूँ। ना मृत्यु है ना नींद है, बस चेतना का अभाव है। यदि नींद में भी चेतना है तो वही तुरीया अवस्था है।


४) सम्बंध होना उत्तरजीवीता के लिए आवश्यक है। जब तक अज्ञान है तभी तक सम्बंध रहता है, उसके बाद एकत्व ही दिखता है।


जहां अज्ञान होता है वहां मतभेद होता है, जहां ज्ञान होता है वहां मौन होता है।


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सत्संग ८६, ११ दिसम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जो स्थायी है, जो किनारा है, वहां अपना घर बनाइये, जो बह रहा है वहां पर घर नहीं बना सकते हैं। उसको बहता हुआ देखा जा सकता है। बहती हुई धारा में कोई स्थायित्व नहीं है, तिर्थ किनारा है वहां से दृश्य सुन्दर दिखाई देता है। 


गुरु नाविक हैं, जिसको ज्ञान हो गया उसकी तीर्थ यात्रा खत्म हो गई है, वो भव सागर से पार हो जाता है।


२) ज्ञान मार्ग सत्य से शुरु होता है और मिथ्या में अन्त होता है। 


सूक्ष्म शरीर भी एक दृष्टिकोण है। जैसे स्वप्न व्यक्ति एक दृष्टिकोण मात्र है, जिस दर्शन बिंदु से स्वप्न का अनुभव होता है, उसको मैं कह दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन्द्रियों का केंद्र बिंदु वहां पर है, जहां से सभी अनुभव हो रहे हैं, परन्तु यह भी एक मिथ्या है। इसी तरह की प्रक्रिया जागृत या सूक्ष्म अवस्था में भी चल रही है।


जिस जगत में हम हैं वो भी एक कारण शरीर है, जो बढ़ते और जटिल होते होते ऐसा हो गया है। जब स्थूल या सूक्ष्म शरीर नहीं रहते हैं, तो उसको बीज या लिंग अवस्था कहते हैं, यहां पर सम्भावना मात्र है। कारण शरीर बरगद के पेड़ की तरह है, जिसके तनों से नया पेड़ उत्पन्न हो जाता है।


३) जहां अज्ञान होता है वहां बंधन होता है। लोग गुरु से कृपा चाहते हैं कि जैसा है वैसा ही बना रहे। पर ऐसा होता नहीं है, गुरु कृपा से सारे बंधन टूट जाते हैं। सारी यात्रा बंधनों से छूटना है।


संसार में रहते हुए भी संसारी नहीं होना, यह ज्ञान मार्गी की विशेषता है। 


४) बाकी सब स्वार्थी हैं, गुरु लेना नहीं जानते हैं, बस देना चाहते हैं। गुरु कृपा से आसक्ति छूट जाती है, और बंधनों से मुक्ति होती है।


जो अनावश्यक है, ज्ञानी उसको प्राकृतिक रुप से छोड़ देता है। अव्यवस्था के कारण जो ऊर्जा इधर उधर बिखर जाती है, ज्ञानी उसको समेट लेता है, उसको व्यर्थ नहीं करता है। इससे वो जो भी करना चाहता है वो सरलता से होने लगता है।


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सत्संग ८७, १५ दिसम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जो भी देखा जा रहा है उसका वहीं का वहीं निर्माण भी हो रहा है। सभी अनुभव चित्त निर्मित हैं, ऐसा कहते हैं क्योंकि जहां से अनुभव आ रहा है वहां कुछ नहीं है, केवल सम्भावनाओं का सागर है। 


दृष्टि पड़ते ही सृष्टि बन गयी ऐसा नहीं है, केवल प्रतीत होता है, वहां कुछ भी है नहीं, वस्तु छाया मात्र है।


भौतिक नियम टूटते रहते हैं, चित्त के नियम नहीं टूटते हैं। 


गुरु मंत्र का अव्वाहन या आभार प्रकट करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।


२) खाने से हमें ऊर्जा नहीं मिलती है, पर इच्छा पूर्ती होती है। जो सरल और स्वादिष्ट है उसको स्वाद लेकर खाना चाहिये, पर कम खाना चाहिये। कई मनुष्य तो अभी तक पशु भी नहीं बन पाये हैं।


कितना खाना है, क्या खाना है, कैसे खाना है, आपका नियंत्रण भोजन पर होना चाहिए, भोजन का नियंत्रण आप पर नहीं होना चाहिए।


सारी निर्भरता अज्ञान के कारण होती है बुढ़ापे के कारण नहीं है। शरीर ने आपको नहीं पकड़ा है आपने शरीर को पकड़ा हुआ है। अज्ञानी दुखी होता है, ज्ञानी आनंद में है।


३) ईश्वर कृपा से ही, अद्वैत की वासना या ज्ञान की इच्छा उठती है मन में। जो गम्भीरता से लेना है वो आध्यात्म है, सांसारिक कार्य खेल है।


माया में ना कुछ आरम्भ है ना अन्त है, सब कुछ नित्य चलता रहता है।


जैसे ही आध्यात्म की इच्छा आती है, तो उसका अर्थ है कि कृपा होनी शुरू हो गई है। सुख, शांती, ज्ञान, दुख, बदलाव आदि सभी कुछ कृपा से आने लगता है।


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सत्संग ८८, १९ दिसम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


जितना अज्ञान होता है, उसके लिये पूर्वनिर्धारण निश्चित है, ठोस या सटीक होता है। साधकों या गुरूजन के लिए यह पूर्वनिर्धारण कम हो जाता है। 


ब्रह्मज्ञान होने के बाद आत्मन कहना भी अनुचित सा ही है। 


जहां दुख और पीड़ा मिल रही है वहां नहीं रहना है। 


कर्म पर अधिकार है लेकिन फल पर नहीं होता है, ऐसा ही है। मिथ्या मिथ्या को प्रभावित करती है, पर मिथ्या सत्य को प्रभावित नहीं कर सकती है।


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सत्संग ८९, २२ दिसम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


प्राणायाम प्रभाव है चेतना का, कारण नहीं है। प्राणायाम से चेतना नहीं आती है, चेतना से प्राणायाम हो जाता है।


ज्ञान होने के बाद मोह छूटता है, मोह छोड़ने से ज्ञान नहीं होता है। 


अज्ञान को छोड़ते ही प्रश्न समाप्त हो जाते हैं। 


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सत्संग ९०, २६ दिसम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) तन्मात्रायें जगत में नहीं पायी जाती हैं, और हमें केवल तन्मात्राओं का ही अनुभव होता है, इस तरह से कुछ भी भौतिक नहीं है। जो भी अभी प्रकट है वो केवल अनुभव ही है। 


जो होना होता है वो होता है, निर्णय लेने वाला या चुनाव करने वाला कोई नहीं है। बुद्धि बहुत सीमित है, पर बहुत काम की चीज है। 


२) वासना सूक्ष्म कर्म है, फिर वो भावना और विचार के रुप में प्रकट होते हैं, और उसके बाद वाणी और फिर शरीर के द्वारा किये गये स्थूल कर्म के रुप में प्रकट होते हैं।


स्थूल कर्म का प्रभाव ज्यादा आता है। यदि चेतना जागृत है, वासना आकर चली गई, और उससे भावना या विचार भी नहीं बने, तो कोई प्रभाव नहीं आता है। और इस तरह से वो कर्म प्रकट ही नहीं होते हैं। साक्षी भाव से वासना जहां उत्पन्न होती है, वहीं वो कर्महीन हो जाती है। 


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सत्संग ९१, २९ दिसम्बर २१, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) क्षमा भाव वो है जिसमें की आपमें बदलाव आता है, दूसरों में नहीं। इसमें आप अपनी गलतियों से सीख लेते हैं और उनको दोहराते नहीं हैं। 


पहले जिससे हानि होती है वो त्यागना है, फिर अनैतिक त्यागना है, उसके बाद जो अनावश्यक है उसको छोड़ना चाहिये, और अन्त में जो भी जीवन के लिए आवश्यक नहीं है उसको त्याग देना है। आसक्ति का कारण अज्ञान है, मुक्ति का कारण ज्ञान है।


२) कोई भी इच्छा मेरी नहीं है, या फिर सभी इच्छायें विश्वचित्त की हैं इसलिये सभी इच्छायें मेरी ही हैं। 


ये मान लेना कि जो दिख रहा है सपने में वो मैं हूँ, यह अज्ञान है, जो देख रहा है स्वप्न को, वो मैं हूँ यह ज्ञान है। मिथ्या कभी शुरू ही नहीं हुई है इसलिये कभी खत्म नहीं होती है, अनंत है। मैं अनुभव भी हूँ और अनुभवकर्ता भी हूँ, यही सत्य है।


ध्यान सीढ़ी है चेतना तक पहुंचने के लिए। 


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सत्संग ९२, १ जनवरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


जीवन अनुभवों की शृंखला है जो कभी समाप्त नहीं होती है। 


यदि अशुद्धियां नहीं रहें तो जो भी इच्छायें आयेंगी वो दुख में नहीं बदलेंगी। इच्छायें बंद नहीं हो सकती हैं, क्योंकि वो कभी शुरू ही नहीं हुईं।


स्वप्न है और स्वप्न देखने वाला है, और स्वप्न इच्छाओं के कारण चल रहा है। इसलिये इच्छा पूर्ती कर लेनी चाहिए।


सभी मार्गों का निचोड़ साक्षी भाव ही है। साक्षी भाव में रहने से स्वप्न में क्या हो रहा है उसकी कोई चिंता नहीं रहती है, वही लीला के रुप में दिखता है।


इच्छा प्रकट होने से संस्कार नहीं बनते हैं, कर्म होने से संस्कार बनते हैं। कर्म नहीं होंगे तो संस्कार नहीं बनते हैं। इच्छाओं के धागे से ही यह पुतला बना है, पर आप इच्छा नहीं हैं। 


इच्छायें कहीं जाती नहीं हैं, क्योंकि जो है नहीं तो वो कहीं जाता नहीं है, जो है उसमें कोई इच्छा नहीं है, और कोई भी इच्छा मेरी नहीं है।


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सत्संग ९३, ५ जनवरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) यदि साक्षी भाव है तो अहम का होना या ना होना बराबर है, एक जली हुई रस्सी की तरह है फिर वो।


जीव का तत्व ब्रह्मं है, या जीव ब्रह्मं का मिथ्या या प्रकट रुप है। जब तक अज्ञान है तभी तक भेद है, ज्ञान होने पर जीव की मिथ्या दिखने लगती है। 


२) इच्छाओं का पूरा नहीं होना ही दुख का कारण है। चेतना आते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी इच्छा मेरी नहीं है। इससे इच्छा पूरी नहीं भी हो तो दुख नहीं होता है, एक खालीपन सा आ जाता है जीवन में।


जो सामाजिक रुप से मान्य है, जिससे किसी को हानी नहीं होती है, वो इच्छायें अवश्य पूरी कीजिये। आरोपित इच्छाओं को पूरा करने में कोई लाभ नहीं है। ज्ञान होने के बाद समर्पण और भक्ति भाव में जीवन जीना सम्भव है।


ज्ञान होने के बाद सम्पूर्ण स्वतंत्रता है। ज्ञानी को हर चीज अर्थहीन लगती है, ज्ञान प्रसार को छोड़कर। उसके लिये सब एक खेल हो जाता है, वृत्तियों को भी स्वीकार कर लेना चाहिए।


३) इच्छा का दमन तभी हो सकता है, जब अज्ञान है। चेतना के प्रकाश में त्याग होता है दमन नहीं होता है। दमन में विकृति आ जाती है। 


ज्ञानी को कोई बड़ा काम नहीं करना है, और निष्क्रिय भी नहीं रहना है। मनुष्य तो कठपुतली है, जिसको चलाने वाला कोई नहीं है, यह तो चलता है, करता कुछ नहीं है। ज्ञान होने पर समर्पण भाव आ ही जाता है।


४) ज्ञान पर ध्यान दीजिये, कहानी पर नहीं। 


इच्छायें मात्र हैं, वो किसकी नहीं हैं, या सभी इच्छायें सम्पूर्णता की हैं। ज्ञानी जितना हो सकता है सभी की इच्छायें पूरी कर देता है। सबकी इच्छा मेरी हैं, पर मेरी कोई इच्छा नहीं है।


५) सब कुछ पूर्व निर्धारित है, क्योंकि समयहीनता है, और इसी कारण पूर्वाभास होना सम्भव है। आनंद महत्वपूर्ण हैं, माया का ज्ञान लेकर भी कुछ नहीं होता है।


शिव यानी अनुभवकर्ता, मृत्य से भी मृत्य है और सजीव से भी सजीव है। वही मैं हूँ, अब बुद्धि को यहां समर्पण कर देना चाहिए।


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यदि कोई इच्छा समाजिक रुप से मान्य नहीं है, पर उसमें किसी की हानि नहीं होती है तो उसको गोपनीय रुप से पूरा करने में कोई बुराई नहीं है। इससे जीवन की निरसता समाप्त हो जाती है।


यदि किसीको पता ही नहीं चले तो, और कोई हिंसा नहीं है, तो कोई पाप नहीं है। कारण शरीर के स्तर पर कोई गोपनीयता भी नहीं है। 


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सत्संग ९४, ८ जनवरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) स्मृति की एक अवधारणा बना ली है जिससे अनुभव की व्याख्या करी जा सकती है। स्मृति अनुभव ही है, उसको बुद्धि के द्वारा देखा जा रहा है, और अनुभव अपरोक्ष हैं। 


जिसको जितना ज्ञान है वो वैसे उसकी व्याख्या करेगा की जो भी प्रकट है वो क्या है। बस इतना कहना ही बहुत है कि माया प्रकट है। फिर उसको स्मृति, अनुभव, नाद, या मैं प्रकट हूँ, आत्मन ही है आदि, ज्ञान अनुसार कुछ भी कह सकते हैं। पर अन्त में अज्ञेय है, जिसको कोई भी नाम दिया जा सकता है।


२) जो चित्त में है वही कर्म में है, जैसी मति वैसी गति, यह मूल मंत्र है।


मेरा ज्ञान मुझे नहीं होता है क्योंकि मैं ज्ञान करने वाला हूँ और ज्ञान एक अनुभव ही है। अनुभवकर्ता का होना मात्र ही उसका ज्ञान है, वह स्वयं सिद्ध है, उसका ज्ञान चित्त में नहीं होता है। जानना आवश्यक नहीं है, होना मात्र है।


३) कोई मूर्ख ही होगा जो धूल लगे हुऐ रत्न को फेंक देगा। धर्म का अर्थ है सत्य, यानी कि यह जानना की मेरा तत्व क्या है।


जो विराट है वही सूक्ष्म है। माया का रुप या विश्वचित्त का रुप दिखाने का प्रयास किया था कृष्ण ने। 


बुद्धम शरणम् गच्छामि, यानी ज्ञान की शरण में जाइये, जिनको ज्ञान है उनको अपना गुरु बना लीजिये।


४) शास्त्र ज्ञान का साधन नहीं हैं, आनंद  का साधन हैं। 


चेतना के उपर की परतों को सहस्रहार चक्र कह दिया गया है। आज्ञा चक्र सभी चक्रों को नियंत्रण में रखता है इसलिये उसको आज्ञा चक्र कहते हैं।


ज्ञानी में संवेदन शीलता बहुत बढ़ जाती है और साथ ही चेतना भी बढ़ जाती है, इसलिये उसपर कर्म नहीं होते हैं।


सब कुछ स्वप्न है और मैं स्वप्न दृष्टा हूँ, यही ब्रह्मं है, और मैं ही ब्रह्मं हूँ।


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सत्संग ९५, १२ जनवरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) यदि चित्त वृत्ति दुख नहीं दे रही हैं तो वो इसका अर्थ है कि वो नियंत्रण में हैं। नियंत्रण सम्भव है, पर नियंत्रक यानी नियंत्रण करने वाला कहीं नहीं होता है। बुद्धि और चेतना से कर्मों पर नियंत्रण आ जाता है। चित्त वृत्ति रोकनी नहीं है, केवल साक्षी होना है उसका। 


यदि स्मृति मिथ्या है तो वो हमें कैसे प्रभावित कर सकती है। मिथ्या को मिथ्या की तरह देख लीजिये फिर उससे आप प्रभावित नहीं हो सकते हैं। एक चेतना का किला बना लीजिये, इससे चित्त भी प्रभावित नहीं होगा। जब आवश्यक है तब साक्षी भाव आ जाये उतना ही बहुत है।


जैसे संस्कार होते हैं वैसी ही चित्त वृत्तियां उठती हैं, अपना जीवन ठीक कर लीजिये, मूर्खता पूर्वक कर्म करने बंद कर दीजिये, उससे चित्त शांत रहेगा। चित्त को ठीक करने का प्रयास भी निरर्थक है, चित्त जैसा है वैसा ही ठीक है, अती सुन्दर रचना है। 


२) सारे अनुभव स्मृति के ही अनुभव हैं। जो प्रकट है वो अनन्त नहीं होता है, पर सम्भावनायें अनन्त हैं। अस्तित्व का तत्व शून्य है, इसलिये अनन्त सम्भावनायें हो सकती हैं।


गुरु कृपा नहीं करते हैं सेवा करते हैं, एक माली की तरह। जब एक साधक को आत्मज्ञान होता है तो सारी सृष्टि का कल्याण होता है। इससे उत्तम सेवा और कोई नहीं है, लेकिन करता कोई नहीं है, केवल कृपा है।


स्मृति का कोई स्थान नहीं होता है। जिस स्मृति से एक स्वप्न बना है उसी से दूसरा स्वप्न बन जाता है। 


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सत्संग ९६, १५ जनवरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जीवन का अंतिम लक्ष्य ज्ञान है, जिसके लिये हमारा जन्म हुआ है।


ज्ञान मार्ग सीधा मार्ग है क्योंकि इसमें कोई प्रगति नहीं होती है। और यह मार्गहीन मार्ग है क्योंकि ज्ञान होते ही यह समाप्त हो जाता है।


२) जिसे परिवर्तन कहते हैं वो स्वयं ही मिथ्या है, इसलिये अनुभवकर्ता ही तत्व है और पूर्ण है। 


अस्तित्व में परिवर्तन भी है अपरिवर्तनीय भी है, और अस्तित्व में परिवर्तन और अपरिवर्तनीय दोनों का अभाव भी है, इसलिये अस्तित्व बुद्धि से परे है और अज्ञेय है।


३) नाद जब परतीय रचनाओं में संयोजित या व्यवस्थित हो जाता है, थोड़ा स्थायी हो जाता है तब उसे चित्त कह दिया जाता है, जैसे मिट्टी और मिट्टी से बनी हुई कोई मूर्ती। 


जो अप्रकट ब्रह्मनाद है उसे शेष ऊर्जा भी कहा जाता है।


४) ज्ञान मार्ग पर स्त्री पुरुष दोनों में कोई भेद नहीं है। जो भी भिन्नता प्रतित होती है वो सब असत्य है। नैतिकता के सार्वभौमिक मानदंड जैसे अहिंसा और पूर्णता, सबके लिए समान हैं।


स्वप्न से जाग जाना ही विरक्ति है। जिसने मिथ्या को जान लिया है, जो है ही नहीं उससे आसक्ति होना भी अर्थहीन ही है। चित्त विरक्त नहीं हो सकता है, अशुद्धि से विरक्ति होती है पर शुद्धि से आसक्ति भी हो जाती है।


५) कर्म का त्याग करना कर्महीनता नहीं है, पर मैं कर्ता नहीं हूँ यह जानना कर्महीनता है। 


माया असीमित है फिर भी सीमित रुप में ही उसका अर्थ होता है। चित्त ही माया का कारण है, और चित्त ही ज्ञान का साधन है। चित्त ही दुख भी देता है और वही चित्त मुक्ति भी देता है। चित्त का विनाश नहीं करना है, उसका उपयोग करना है।


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सत्संग ९७, १९ जनवरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) अनुभवकर्ता का ज्ञान शरीर पर निर्भर है। 


भोग, त्याग, क्रियाओं आदि में कोई सुख दुख नहीं हैं, सुख दुख अर्थहीन हैं, माया हैं। इसलिये स्वीकार भाव या समर्पण ही उपाय है। मेरा स्वरूप ही नित्य आनंद है। जब कर्ता भाव नहीं रहेगा तभी आनंद प्रकट होता है।


२) सम्पूर्ण अनासक्ति के साथ, सम्पूर्ण कुशलता से कोई कर्म करना कर्महीनता है। 


स्वयं संगठन (वृद्धि) और प्रतिलिपि (प्रजनन) मूल प्रक्रियायें हैं जो हर जीव में होती हैं। 


३) आप ब्रह्मं स्वयं हैं और आपमें असीमित क्षमतायें हैं। जैसे जैसे जीव का विकास होता है वैसे वैसे सूक्ष्म लोक में बुद्धि, सिद्धियां, चेतना आदि बढ़ती जाती हैं।


जो चेतना में स्थित है उसको अनेकों अनुभव हो जायेंगे, जो अनुभवों के पीछे भाग रहा है उसकी चेतना नहीं आएगी। जिसकी बुद्धि तीक्ष्ण है वो ज्ञान के पीछे है, अनुभव के पीछे भागता नहीं है। 


संकल्प नाद में परिवर्तन करके अपना काम करते हैं। 


४) यदि कोई आवेग आता है और आप वो करने पर मजबूर हो जाते हैं, तो वो सम्पूर्ण चेतना में कीजिये। इससे वो जल्दी ही छूट जाता है। छोड़ना नहीं है, जितना तेज आवेग है उतनी ही तेज चेतना कर लेनी चाहिए।


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शादी से वासना पूर्ति नहीं होती है, दमन होता है। १६ से ४० साल की उम्र में सारी वासनायें पूरी कर लेनी चाहिए, उसके बाद आध्यात्म में आना चाहिए।


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सत्संग ९८, २३ जनवरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) इस मिथ्या का उपयोग जिसने सत्य जानने के लिए किया है वही जीवन सफल है। चित्त और बुद्धि की मिथ्या को जानने के बाद जो बचता है वो सत्य है। सत्य तक पहुंचने के लिए घटाना है कुछ बढ़ाना नहीं है। 


चित्त और बुद्धि से चित्त का ही ज्ञान होता है, माया का ज्ञान होता है, ये सब मिथ्या है, ये पता लगते ही, सत्य स्वयं प्रकट हो जाता है। जैसे बाती तेल को जलाकर स्वयं जल जाती है, वैसे ही बुद्धि अज्ञान का नाश करके स्वयं विलीन हो जाती है। सत्य ही वो पृष्ठभूमि है जिसपर मिथ्या का खेल चल रहा है।


गुरु सांसारिक बुद्धि को ही आध्यात्मिक बुद्धि बना देते हैं, फिर बुद्ध होने में समय नहीं लगता है। ये जाना जा सकता है कि मैं क्या नहीं हूँ, फिर भी जो शुद्ध स्वरूप बच गया, वो मैं ही हूँ।


२) स्मृति वह आधार है जिससे पता चलता है कि सभी अवस्थायें एक ही चित्त की हैं, जो बदल रही हैं। 


मान लिया गया है कि मैं मनुष्य हूँ, बस इतना जान लेना है कि मैं मनुष्य नहीं हूँ।


सारा ज्ञान गुरु क्षेत्र से ही आता है। गुरु क्षेत्र से प्रार्थना करने से ज्ञान मार्ग पर आने वाले विघ्न भी दूर हो जाते हैं।


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अवस्था बदलने पर उसकी स्मृति रह जाती है। अश्विन का मनन सम्पूर्ण है, पूरा हो चुका है उनका ज्ञान।


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सत्संग ९९, २६ जनवरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


अहम की मिथ्या प्रकट होते ही, केवल अनुभवकर्ता ही रह जाता है। इसलिये आत्मज्ञान होता है, आत्मज्ञानी कोई नहीं है। 


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सत्संग १००, ३० जनवरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) जैसे जैसे आपकी आध्यात्मिक प्रगति होती है, प्राकृतिक सीमायें या तो बढ़ जाती हैं, या फिर टूट जाती हैं। चित्त में कोई सीमायें नहीं हैं। सम्पूर्ण चित्त मेरा है, या मेरा कुछ भी नहीं है। 


जीव छोटा होते हुऐ भी विश्वचित्त से अलग नहीं है, जैसे बूंद सागर से अलग नहीं है, और बूंद बूंद से ही तो सागर बना है। 


तारतम्य (resonance) या कर्षण का नियम है कि आपको वही विचार पकड़ में आते हैं जो की आपके विचारों से मिलते जुलते हैं। 


२) आनंद के आंसू शुद्धि का प्रतीक हैं। भावनाओं की व्याख्या करने से भावनाओं का मजा चला जाता है। आध्यात्म मार्ग पर साधक पत्थर नहीं हो जाता है, वो तो पत्थर को भी पिघला देता है। साधक को व्यवहार में जांचा नहीं जा सकता है क्योंकि उसका व्यवहार नियंत्रण में आ जाता है।


जिसके मन में ज्ञान की प्यास जग गई है उसको गुरु सामने खड़े मिल जाते हैं। आप तैयार हैं तो गुरु जल्दी ही मिल जाते हैं, और सही गुरु के मिलते ही ज्ञान हो जाता है, और मार्ग समाप्त हो जाता है।


बिखरी हुई सूचना, ज्ञान या आध्यात्म नहीं है। ज्ञान वो झोली है जिसमें सूचना या तथ्य इकठ्ठे किये जा सकते हैं। 


३) गुरु बच्चे जैसा होता है, जो खेल रहा है वो गुरु है। जो बड़ा होता है वही सबसे छोटा भी होता है। जो गुरु को समर्पित नहीं हैं उनको आध्यात्म पर हानि भी हो सकती है। 


आध्यात्म में आने के बाद कई पुराने सम्बंध टूटने लगते हैं, इसलिये नहीं कि आप गलत हैं, बल्कि इसलिये की उनमें बहुत अंधकार है। सांसारिक लोगों की सेवा करके कोई लाभ नहीं है, समय नष्ट होगा। साधक को आर्थिक, भावनात्मक और भौतिक रूप से स्वतंत्र हो जाना चाहिये। जो पूछता नहीं है उसको ज्ञान नहीं देना है, वो आपका ही अपमान करेगा।


जो संचय किया है वो खत्म नहीं होता है, उसका त्याग या समर्पण होता है। 


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सत्संग १०१, २ फरबरी २२, के कुछ मुख्य बिंदु।


१) भौतिक जीवन में कष्ट बुद्धिहीनता के कारण हैं। 


चेतना पहरेदार का काम करती है, एक भी मुर्खतापूर्वक काम, विचार, भावना आदि, छूटेगा नहीं फिर उससे। चेतना के अभाव में अनुभवों का कोई अर्थ नहीं है। 


देवी पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता है, स्वयं देवी बन जाइये।


२) ज्ञान के चरण

- मूल ज्ञान

- जागृत अवस्था में चेतना

- स्वप्न अवस्था में चेतना

- सूक्ष्म अवस्था में चेतना

- निद्रा में चेतना

- मृत्यु के समय चेतना

- मृत्यु उपरांत चेतना

- मनुष्य योनि समाप्त


पर ज्ञान मार्ग पर इन सबकी भी कोई चिंता नहीं रहती है। 


३) ब्रह्मं ने मिथ्या रुप या ये खेल अपने ही आनंद स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए रचा है। 


सब कुछ स्वप्न समान ही है, उसमें दो ही सम्भवानायें हैं, या तो आप उसमें लिप्त रह सकते हैं या उससे जाग सकते हैं। वैसे भी स्वप्न से जागने में कितना समय लगेगा।


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