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सत्संग 19, 20 Jan 21
स्मृति पराभौतिक परामानसिक रचनायें है, पदार्थ नहीं है, प्रतीत होती है, सम्भावना मात्र है, वहां कुछ है नहीं। जैसे पानी में लहरें प्रतीत होती हैं, वास्तव में हैं नहीं। नाद का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, वह मिथ्या है।
जो असंगठित (random) या अव्यवस्थित रचनायें हैं, वो भी हैं, जिसको 'शेष' भी कहते हैं, लेकिन उसकी जीव स्मृति से कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। इसलिये कहा गया है कि ज्ञान ही अनुभव है। मनुष्य या जीव की रचना बहुत सीमित है, और उसमें बहुत सीमित अनुभव सम्भव हैं।
हर लोक में नियमित और अनियमित दोनों हैं, अनियमित में अनंत सम्भावनायें छुपी हैं, उनमें जो चाहे वह हो सकता है। ज्ञानी ही रचनाकार है, वह अपने नियम स्वयं बना सकता है। नियम अज्ञानी के लिए हैं, ज्ञानी के लिए कोई नियम नहीं है।
अनुभव नहीं तो अनुभवकर्ता भी नहीं, यानि दोनों एक ही हैं, कोई दूरी या अंतराल नहीं है, यह मूल ज्ञान है।
केवल अहंकार व्यक्तिगत है, बाकी सभी वैश्विक या विश्वचित्त की वृत्ति चल रही है, जैसे विचार, शरीर, बुद्धि, भावनायें आदि। जैसे शरीर वातावरण का भाग है, कोशिकाओं का समूह है, तो व्यक्तिगत कहां रहा?
विचार एक विशेष प्रकार की गति है जो मन में चलती है। सारे अनुभव स्मृति में पड़े हैं तन्मात्रा के रूप में, जो दुबारा चलाये जा सकते हैं, जैसे CD में मूवी पहले से रिकॉर्डड है। इसलिये सभी कुछ यहीं है और अभी है।
विचारों को रचनात्मक रुप से जोड़ना कल्पना है, कल्प यानि बदलना।
सागर लहरों का कारण नहीं है। लहरें कहीं हैं नहीं, चित्त निर्मित हैं, मिथ्या हैं। अनुभवकर्ता अनुभव का कारण नहीं है, दोनों एक ही हैं। कारण-प्रभाव मिथ्या है, सम्पूर्ण द्वैत मिथ्या है।
सूर्य नहीं होगा तो छाया नहीं होगी, लेकिन सूर्य छाया का कारण नहीं है, दोनों एक ही हैं। चित्तवृत्ति भेद उत्पन्न करती है, जब चित्तवृत्ति का अन्त होता है तो अनुभवक्रिया रह जाती है, जिसमें कोई भेद नहीं है। और यही सहज समाधि है, इसको समझना या इसमें जाना बहुत सरल है।
चित्तवृत्ति को भी मिला लें ध्यान में तो वही समावेशी ध्यान है। यदि चित्तवृत्ति 'मैं' पर स्थित है तो द्वैत ही सत्य प्रतीत होता रहेगा।
जब 'मैं' की स्थिति आत्मन पर होती है तो वही चेतना है। अनुभव और ज्ञान के उपयोग से इतना जान लेना की चित्तवृत्ति 'मैं' नहीं हूँ तो चेतना में स्थिति बन जाती है। यानि चेतना जागृत हो जाती है।
माया का ज्ञान यानि यह जानना के मैं माया नहीं हूँ, मैं साक्षी हूँ। अनुभवकर्ता या अनुभव का कभी ज्ञान नहीं होगा, बस चित्त की मान्यताओं का ही ज्ञान सम्भव है। जो की मिथ्या है, अज्ञान है, यानि सारा ज्ञान भी मिथ्या है।
चेतना में आने में कोई प्रयास नहीं लगता है, बस दृष्टा बनकर देखना मात्र है, साक्षी भाव में रहना। पर यह भी कोई प्रयास नहीं है, यह अज्ञान के नाश से स्वाभाविक होने लगेगा। अनुभवकर्ता को अनुभव में ढूंढना मूर्खता है।
साक्षी भाव में आना उदेश्य है, बाकी सब व्यर्थ है। केवल अज्ञान से बाहर आना है और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। इसके बाद तो बुद्धि भी विघ्न है।
ट्रेन में बैठना ही गुरुकृपा है, फिर और क्या रह गया करने के लिए?
अनुभव है लेकिन जिसका अनुभव होता है, वो कहीं नहीं है। यह बात ध्यान में रखनी पड़ती है अनुभव के बारे में। इससे अहम ब्रह्मस्मी सिद्ध हो जाता है।
ज्ञान मार्ग पर ज्ञान नहीं होता है, अज्ञान का नाश होता है और समर्पण भाव आता है।
पहले अनुभव होता है, फिर संस्कारों के आधार पर प्रतिक्रिया होती है, कि यह विचार, इच्छा, भावना, कर्म आदि मेरे हैं, अच्छे या बुरे हैं आदि। संस्कार पड़े भी तो अनुभवों की वजह से ही हैं। कुछ संस्कार मनुष्य जन्म के साथ ही आते हैं।
यदि चेतना जागृत है तो प्रतिक्रिया में फंसते नहीं हैं, और एक विशेष प्रकार की विरक्ति हो जाती है।
ज्ञान मार्ग के बाद अष्टांग योग ही सबसे सीधा मार्ग है। चेतना का अर्थ नहीं पता तो उसे बढ़ाने का प्रयास कैसे सफल हो सकता है। निचली परतों में अशुद्धि है तो आज्ञा चक्र पर ध्यान करने से क्या होगा।
कई बार कड़वी दवा ही ज्यादा अच्छा काम करती है।
नींद प्रतिक्रिया है चित्त की, एक अवरोध है। अशुद्धि, अतृप्त इच्छायें या रुचि का अभाव होने से आलस या निंद आती है।
जीवन छोटा सा है, उसमें वो करना चाहिए जो मुझे पसंद है ना की वह जो किसी और को पसंद है। जिस काम में रुचि नहीं है वह करने के लिए हम यहां नहीं आये हैं। जिस काम में रुचि है वही जीवन का लक्ष्य भी है। पैसा कमाना उदेश्य है और पढ़ाई मेडिकल की कर रहे हैं।
निचली परतों में अशुद्धि, जैसे कामवासना का अवरोध, अतृप्त इच्छायें आदि के कारण नींद आती है। वह कुछ रचनात्मक नहीं करने देती हैं।
निचली परतों में शुद्धि होनी चाहिये। जैसे मुझे कुछ बनना है, दूसरों से बेहतर बनना है, ऊंचा उठना है आदि अशुद्धि यदि हैं तो भौतिक कार्यों में भी सफलता या प्राप्ति होने पर भी सुख नहीं मिलेगा। अशुद्धि से ऊर्जा समाप्त हो जाती है। शुद्धिकरण भी ज्ञान मार्ग या अध्यात्म का ही भाग है।
आलस का कारण अतृप्त वासनायें होती हैं। अध्यात्म मार्ग पर आते ही सब कुछ ठीक होने लगेगा।
सम्बंध यदि दुख पैदा कर रहे हैं तो उनके पीछे क्यों पड़े हैं। मनुष्य जन्म सम्बंध बनाने के लिए नहीं लिया है। सम्बंध छोड़ दें या उनको स्वीकार कर लें, प्रेम भाव बढ़ायें। प्रेम भाव होगा तो सम्बंध अपने आप सुधर जायेंगे। जो सम्बंध प्रेम से नहीं सुधरते हैं तो उनको छोड़ देना ज्यादा अच्छा है, या वो आपको छोड़ देंगे।
मेरे जीवन में आने वाले सभी दुख का जिम्मेदार मैं ही हूँ, कोई अशुद्धि है। और इनका निवारण भी मैं स्वयं ही कर सकता हूँ, कोई और नहीं।
संस्कार ही मशीन की तरह चलाते हैं जीव या शरीर को, यदि संस्कार ठीक नहीं होंगे तो ऐसे ही चलेगा, कुछ नहीं होगा। मानव शरीर केवल एक यंत्र है, मशीन मात्र है।
चेतना यह बताती है कि यहां कुछ ठीक नहीं है।
स्मृति में कुछ सही गलत नहीं है। जब विचार उठ जायें तब बुद्धि का उपयोग करना है कि यह करना चाहिए या नहीं, कि यह प्रगति की ओर ले जा रहा है या दुर्गति की ओर। दिन में 99% विचारों पर कर्म करने की आवश्यकता नहीं होती है।
अपने सभी तरह के विचारों को सत्संग में व्यक्त करने में शर्माना नहीं चाहिये। साधक को गुरु से कैसी शर्म, अगर व्यक्त नहीं करेंगे तो बीमारी के कारण का पता कैसे चलेगा?
अपनी अशुद्धि या समस्याओं के लिए मैं ही जिम्मेदार हूँ और इसीलिये, मैं ही उनको मिटा भी सकता हूँ। किसी और की वजह से आयी होती तो कुछ नहीं किया जा सकता था।
चेतना साधारण सी बात है। यह देखना कि सत्य क्या है, उसमें संसारिक या व्यवहारिक सत्य भी आ जाते हैं।
कुछ लोग अपने गलत कर्मों में भी कुछ गलत नहीं देखते हैं। अपनी गलतियों को बताना कोई शर्म की बात नहीं है। ज्ञान मार्ग में बहुत जल्दी अशुद्धियों से मुक्ति पाई जा सकती है या सारी वासनायें पूरी की जा सकती हैं। बुद्धिमान साधक के लिए सही सम्बन्धों की पहचान करना कौनसी बड़ी बात है।
नैतिकता समाज द्वारा थोपी गई है। एक बार उतरदायित्व ले लिया तो उसे त्यागना नहीं चाहिये यदि बिलकुल अनिवार्य नहीं हो तो। मृत्यु से सारे बंधन वैसे भी टूट ही जाते हैं।
साधक के पास वासना पूर्ति के बहुत सारे उपाय हैं जो साधारण व्यक्ति के पास नहीं हैं। यदि चेतना जागृत है तो स्वप्न या इच्छा लोक में सारी वासना पूर्ति कर सकते हैं। वासनाओं से मुक्ति का उपाय वासना तृप्ति भी है। उपाय है - कुछ इच्छाओं की पूर्ति, कुछ का त्याग यानि उनको विलम्बित करना और सबसे अच्छा उपाय है, चेतना जागृति के द्वारा उनसे मुक्त या विरक्त होना।
स्वप्न या सूक्ष्म अवस्था का उपयोग वासना पूर्ति के लिए किया जा सकता है। पर अंततः वासना पूर्ति से मुक्ति नहीं होती, वह अनंत नये रुप में आती रहती हैं, लेकिन चेतना के द्वारा उनसे विरक्ति सम्भव है। विरक्ति लक्ष्य है तृप्ति नहीं। तृप्ति का असर थोड़े समय तक रहता है, इसलिये विरक्ति उपाय है। विरक्ति यानि जब वासना आये तब भी आप उससे कर्म करने के लिए बाध्य नहीं होंगे। उस वासना में वह शक्ति नहीं होगी, जैसे जली हुई रस्सी।
मनुष्य जीवन वासना पूर्ति के लिए लिया है, बस ध्यान रहे कि वासना पूर्ति से दूसरों का या आपका स्वयं का कुछ बुरा नहीं हो, किसीके मन को मत दुखाईये।
जब पीड़ा मिलती है तो अध्यात्म में रुचि होती है। प्राकृतिक रुप से धीरे धीरे आसक्ति छूटती है और प्रगति होती है। केवल विरक्ति या अनासक्ति से ही पूर्ण मुक्ति सम्भव है।
चेतना में की गयी वासनापूर्ति विरक्ति लाती है | बेहोशी में की गयी वासना पूर्ति उस वासना को और प्रगाड़ कर देती है। चेतना हर बीमारी की दवा है। आत्मज्ञान से सारी परेशानियां दूर होने लगेंगी। माया का अन्त है चेतना में रहना।
शरीर यंत्र है वासना पूर्ति के लिए, जैसे ही आत्मज्ञान होता है कि मैं शरीर या मन नहीं हूँ तो वासनायें मेरी कैसे हो सकती हैं। फिर वो आयें या जायें क्या अन्तर पड़ता है। यही मूल मंत्र या रामवान है निर्वाण का।
यही मुक्ति का मार्ग है। जीवन व्यर्थ मत करें, जीवन वासना पूर्ति के लिए नहीं है, ज्ञान के लिये है, आनंद के लिए है, विकास के लिये है, मुक्ति के लिए है।
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2) सत्संग 20, 27 Jan 21
अनुभव से स्मृति बनती नहीं है पर यह कह सकते हैं कि अनुभव स्मृति में छाप छोड़ते हैं। स्मृति पहले से है और वह पराभौतिक परामानसिक नाद रचनायें है। हमें जो भी अनुभव होते हैं वह स्मृति के ही होते हैं, वह स्मृति में पहले से है। और जो भी अनुभव हो रहा है वो वापस स्मृति में अंकित होता है, इसलिये केवल स्मृति ही है। अभी भी स्मृति का ही कुछ भाग हमारे अनुभव में है।
इसको पूरी तरह से जानना असम्भव है, यह एक परिकल्पना है जिज्ञासा को शांत करने के लिए। क्योंकि माया भी अज्ञेय है वो भी नहीं जानी जा सकती है। ज्ञानी को खड़े होने के लिए कुछ नहीं मिलेगा, केवल अज्ञेयता ही हर प्रश्न का उत्तर है।
1- ज्ञानमार्ग क्या है ? इसका लक्ष्य क्या है ?
2- ज्ञान का क्या अर्थ है ?
3- सत्य के मानदंड क्या हैं, और वही क्यों है ?
4- यदि ज्ञान अनुभव आधारित है और अनुभव मिथ्या है तो क्या वो ज्ञान है ?
5- अनुभवकर्ता और अस्तित्व में सम्बन्ध दिखाइये।
6- मेरा मूल तत्व क्या है ? यदि अनुभव और अनुभवकर्ता एक हैं तो मूल तत्व अनुभव क्यों नहीं ?
7- कितने अनुभवकर्ता हैं ? कैसे स्थापित करेंगे?
8- बुद्धि की क्या सीमा है ?
9- माया का क्या कारण है ?
10- मृत्यु सत्य है या असत्य ?
11- सूक्ष्मावस्था और जागृतावस्था में क्या फर्क है ?
12- अज्ञानी को गुरु से क्या मिलता है ?
कुछ उत्तर जो सुधारे जा सकते हैं।
a) ज्ञान मार्ग का लक्ष्य अज्ञान का नाश है, मुक्त तो आप पहले से ही हैं। यह अज्ञान भी दूर हो जाता है कि मैं बंधन में हूँ।
b) अनुभव मिथ्या है तो क्या वह ज्ञान है?
ज्ञान की परिभाषा नकारात्मक है, जब अज्ञान का नाश हो जाता है तो उसको ज्ञान कहा गया है। ज्ञान है, यह देखना कि जो भी अनुभवों में सम्बंध बनाये हैं सब अज्ञान के कारण हैं, बेकार हैं। अन्त में कोई ज्ञान नहीं मिलेगा।
c) बुद्धि केवल माया को जान सकती है, बुद्धि सत्य को नहीं जान सकती है, और बुद्धि की यही सीमा है। बुद्धि का उपयोग बुद्धि का नाश करने के लिए किया जाता है। बुद्धि के द्वारा जो भी जाना जा रहा है वह सब अज्ञान ही है। बुद्धि भी अवरोध बन जाती है।
d) सूक्ष्म अवस्था और जागृति में कोई भेद नहीं है। सूक्ष्म अवस्था में इन्द्रियां पूरी तरह से भीतिक लगेंगी। जागृत अवस्था में जो भौतिक लगता है वह सब सूक्ष्म है। कुछ भी भौतिक नहीं है ना शरीर, ना जगत ना इन्द्रियां।
अब जानना बहुत हो गया अब करना है, अब अमल में लाना है। अब हमेशा साक्षी भाव बनाये रखना है, हर समय अपने स्वरूप में या चेतना में स्थिर रहना है, और यह आजीवन चलेगा। और अब जागृत अवस्था के प्रयोग शुरू करने हैं और ज्ञान को जीवन में उतारना है।
जो माया या अनुभव नहीं है वह अनुभवकर्ता है। अनुभवकर्ता परदे की तरह है, माया या अनुभव चित्र हैं जो आते जाते रहते हैं।
जब तक सद्गुरु बताते नहीं हैं तब तक यह पता नहीं चलेगा कि मिथ्या क्या है या अनुभव भी मिथ्या है। एक आम आदमी को सत्य असत्य का ज्ञान नहीं हो सकता है, जब तक गुरु नहीं दिखाते हैं।
अद्वैत में सत्य की परिभाषा अप्रकट पर आधारित है, प्रकट पर आधारित नहीं है। अनुभव को नकार के अद्वैत में पहुंचा गया है।
अज्ञेयता अंतिम सत्य है। ज्ञान मार्ग में कोई नियम नहीं है, केवल मान्यतायें हैं। ज्ञान और अज्ञान दोनों के परे जाना है।
मुझे आपका अनुभव क्यों नहीं पता लगता है?
मेरा कोई अनुभव नहीं होता है, सभी अनुभव अनुभवकर्ता को होते हैं। पहले अनुभव हो जाता है, उसके बाद विचार आता है कि यह मेरा अनुभव है। मैं केवल एक विचार मात्र है। स्मृतियों में भिन्नता है, स्मृति में सीमा है। यदि सभी स्मृतियां मिल जायें तो जीवन सम्भव नहीं है। स्मृति में सीमा भी काल्पनिक हैं।
जागृत अवस्था में स्मृति में सीमा खींच दी गई है इसलिये अनुभव सीमित है, पर अनुभवकर्ता सीमित नहीं है। अनुभव के सीमित होने से अनुभवकर्ता सीमित नहीं होता है। कंगन, कड़े आदि से सोना सीमित नहीं होता है। क्या सीमित है, नाम रुप या तत्व? तत्व की सीमा नहीं है, पर नाम रुप सीमित हैं। लहर सीमित है, पर लहर सागर को सीमित नहीं कर सकती है। चित्र परदे को सीमित नहीं कर सकता है, पर्दा हटा लिया जाये तो चित्र भी नहीं रहेगा।
केवल विश्वस्मृति ही है, कारण शरीर भी उसीका एक भाग है। लहर लहर में भेद बहुत थोड़ी देर ही रहता है, केवल सागर है, या केवल पानी है। लहर केवल अज्ञान है। द्वैत भी अद्वैत में ही है, उससे भिन्न नहीं है। अनुभव और अनुभवकर्ता दोनों का तत्व शून्य है, शून्य यानि कुछ नहीं होना, शिव, निर्गुणता। आत्मज्ञान होने के बाद मन में अशांति नहीं होती है।
एक घटना के अनंत कारण होते हैं, कोई और घटना, फिर उसका कोई कारण, यह अनंत है। या हर घटना पूरे अस्तित्व की घटनाओं पर निर्भर है। इसलिये यह किसी घटना का कोई कारण ना होने के बराबर है। कारण प्रभाव सत्य नहीं है।
वस्तुएं अस्तित्व में मिथ्या के रुप में प्रतीत होती हैं। माया में कुछ भी सत्य नहीं है, चित्त के सभी नियम कभी भी बदले जा सकते हैं।
जब तक आत्मज्ञान नहीं होता है, तब पुस्तक पढ़ने से केवल अज्ञान ही होता है। जीवन तो छोटा सा है, किताबें पढ़ने में बिताना है या ज्ञान में बिताना है। अपनी गीता स्वयं लिखें।
ज्ञानियों की संगत में अस्तित्व के अनेक रहस्य समझ में आने लगेंगे, जिनको और किसी भी तरह से जानना असम्भव है। माया को भी जाना नहीं जा सकता है, पर माया को समर्पण किया जा सकता है। ज्ञान मार्ग में शुरू में कहा जाता है कि यहां श्रद्धा नहीं चाहिये, लेकिन, आत्मज्ञान होने के बाद, ज्ञान मार्ग पर भी समर्पण और गुरु पर जीवंत श्रद्धा होना अती आवश्यक है।
गुरु के द्वारा दिये गया संकल्प अत्यंत शक्तिशाली होता है। ऐसा संकल्प चित्त की हर परत में रिस जाता है, और उसके द्वारा सब कुछ सिद्ध होने लगता है। इस संकल्प को जीवंत कर दें, जैसे उसमें प्राण प्रतिष्ठा हो गई हो।
उपर की परतों में कुछ गड़बड़ी होने से वह निचली परतों में भी दिखाई देने लगता है।
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3) सत्संग 21, 6 Feb 21, के कुछ मुख्य बिंदु।
विश्वचित्त की बुद्धि मनुष्य की बुद्धि की तरह नहीं है। मनुष्य की बुद्धि बहुत सीमित है, जो मनुष्य को तार्किक अतार्किक लगता है, वो वास्तविक्ता में वैसा नहीं है।
मनुष्य में लिंग भेद और प्रकृति में अन्य भेद होने का कारण विकासक्रम है। जो गुण उत्तरजीविता के लिए आवश्यक हैं वो अपने आप विकसित और प्रकट होने लगते हैं।
पुरुष और स्त्री, शिव शक्ति को नहीं दर्शाते हैं, बल्कि उलटा है। शिव शून्य है, शक्ति माया है, इन अवधारणाओं की कल्पना मनुष्य ने अपनी सीमित बुद्धि के अनुसार पुरुष और स्त्री के रूप में की है। इन दार्शनिक सिद्धांतों को रुचिकर बनाने के लिए और आम लोगों को समझाने के लिए इनको मानव रुप में दिखाया गया है। यह संकेतिक मात्र है।
शक्ति पुरुषों में भी है और शून्यता या शिव स्त्री में भी है। स्त्री पुरुष का भेद केवल जागृत अवस्था में ही होता है।
शिव को योगी के रूप में दिखाया गया है क्योंकि योगी या ज्ञानी अपना स्वरूप शून्यता के रूप में जानता है। वास्तव में परम शून्यता या शक्ति का कोई चित्रण नहीं किया जा सकता है।
क्या विधि के विधान को टाला जा सकता है? मनुष्य रुप से उपर उठकर अपने नियम स्वयं बनाये जा सकते हैं या माया के नियमों को टाला जा सकता है। माया में सब सम्भव है, लेकिन जिसके पास यह सिद्धि है वह उनका उपयोग नहीं करता है। मिथ्या में कुछ बदल भी दिया तो भी वह मिथ्या ही रहेगी।
अज्ञानी जानता नहीं है कि यह सब झूठ है, मिथ्या है, इसलिये उसको बदलना चाहता है। जब यह समझ आ जाता है कि कोई भी वासना या इच्छा मेरी नहीं है और जो भी अनुभव हैं सब मिथ्या हैं तो सारी भाग दौड़ समाप्त हो जाती है। अज्ञानी ही सिद्धियों के पीछे भागता है। ज्ञानी सबमें केवल पूर्णता का ही अनुभव करता है।
नियम सत्य हैं, लेकिन नियमों को बदला जा सकता है यह भी सत्य है। मुक्ति का अर्थ है कि जो भी है, मैं उसमें संतुष्ट हूँ, ना कि जो मन में है वही करूं। जो मिथ्या है उसको बदलना नहीं है, पर जो सत्य है उसको ग्रहण करना है।
माया और अनुभवकर्ता में कोई भेद नहीं है, दोनों एक ही हैं। सागर और लहर दोनों मैं ही हूँ। मेरा ही रुप मुझे माया के रूप में दिखाई देता है क्योंकि चित्त नाद को अनुभव में परिवर्तित कर देता है। यही माया है, यही अनुभव है और अनुभव के पीछे भी शून्यता है, अर्थात मैं ही हूँ। अस्तित्व बदल नहीं रहा है, उसका सम्भावित रुप है जो माया के रूप में बदलता हुआ दिखाई देता है। वास्तव में मुझे मेरे ही दर्शन हो रहे हैं।
सभी त्रिकाल दर्शी हैं क्योंकि समय भी माया ही है। आत्मज्ञान के द्वारा अपने आप को मनुष्य समझना बंद कर दें, अपने चैतन्य स्वरूप को पहचान लें फिर सभी अनुभव अभी ही हैं यह साक्षात ज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान अभी है, भविष्य में नहीं होगा।
मैं कर्ता नहीं हूँ, मैं कुछ करता नहीं हूँ, मैं केवल दृष्टा या साक्षी हूँ। मैं शुद्ध चैतन्य हूँ और इच्छाओं का भी साक्षी हूँ। जीव यंत्र है, वो वही कर रहा है जो उसके संस्कार हैं। कर्ता या व्यक्ति मिथ्या है।
संकल्प - जो भी इच्छा है उसकी कल्पना को यदि टूटने नहीं दें, दृढ कर लें तो वह संकल्प है। इच्छा आती जाती है, संकल्प ठोस है। संकल्प यदि सही तरह से धारण किया है तो वही घटने लगता है। इच्छा के साथ कल्पना भी आती है कि यह कैसे पूरी होगी।
साधक में यदि ज्ञान और गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण है, तो उसके संकल्प में गुरु कृपा या गुरु का संकल्प जुड़ जाता है, और वह सिद्ध होने लगते हैं, क्योंकि चित्त एक ही है। चित्त में सभी विभाजन कल्पना मात्र हैं।
ज्ञान मार्ग पर संकल्प का पूरा होना चमत्कार नहीं है, यह विज्ञान है। यदि यह ज्ञान है कि, जहां वासना पैदा होती है वहीं उसका पूरा होने का साधन भी पैदा होता है, तो हर वासना वहीं की वहीं पूरी हो जायेगी जहां वह उठ रही है। देव योनि में तो ये होता है, लेकिन मनुष्य में भी यह करने की सम्भावना और योग्यता है।
घटनायें अनुभव नहीं हैं, जीवन एक ही अनुभव है। घटनायें निरंतर हैं, इनके बीच में कोई सीमा रेखा नहीं है, इसलिये केवल एक ही अनुभव है। जो भी परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं अनुभव में, वह भी प्रतिति मात्र हैं, मिथ्या हैं, सम्भावना मात्र हैं।
अनुभव अपरिवर्तनीय है या मिथ्या है?
द्वैत और अद्वैत को मिलाना नहीं चाहिये। अद्वैत का ज्ञान बुद्धि के बाहर है, उसकी द्वैत के ज्ञान से तुलना नहीं करनी चाहिये। एक स्तर पर दी गई शिक्षा दूसरे स्तर पर काम नहीं आती है।
अद्वैत के स्तर पर ना सत्य है ना असत्य है; ना सत्य का अभाव है ना असत्य का अभाव है; सत्य भी है, असत्य भी है; सत्य का अभाव है, असत्य का भी अभाव है।
समय को सत्य मानकर, अनुभव को उसमें होता हुआ देखना गलत समझ है। व्यक्ति का जीवन नहीं होता है, जीवन व्यक्ति के रूप में प्रकट है। माया में जो प्रतीत होता है, सत्य ठीक उसका उलटा है जैसे - मैं शरीर हूँ, संसार ही सत्य है, अनुभव सत्य है आदि। वासना पूर्ति नहीं, बल्कि वासना से मुक्ति जीवन का लक्ष्य है। जमा करने से नहीं, बल्कि जितना छोड़ देंगे उतना खुश रहेंगे। माया सत्य को ठीक उलटा कर देती है और हम उसीको सत्य मान लेते हैं।
चित्त की सभी परतों का मूल स्वभाव शून्यता है। सापेक्षिक रुप में भिन्न भिन्न स्वभाव है।
ज्ञान मार्ग पर दृष्टि और दृश्य में भेद जानना बहुत महत्वपूर्ण है, यानि दृष्टि-दृश्य विवेक। जब यह जान लिया कि क्या अनुभव है और क्या अनुभवकर्ता है, तो यह ज्ञान का अन्त है। चित्त का अनुभव होता है, चित्त को अनुभव नहीं हो सकता है। जो दिखता है वो देख नहीं सकता है। अनुभव के कई नाम हैं जैसे स्मृति, प्रकृति, माया, शक्ति, नाद, चित्त आदि, पर अनुभवकर्ता का एक ही नाम है।
ज्ञान मार्ग पर नकारात्मक ज्ञान ही मिलता है, यानि जो भी मान्यतायें हैं वो नष्ट हो जाती हैं, उसके बाद जो बच जाता है उसको ज्ञान कहते हैं। माया यानि मान्यतायें। माया से ही माया का ज्ञान भी होता है। बुद्धि में अशुद्धि है तो माया की पकड़ रहेगी, बुद्धि शुद्ध है तो माया का ज्ञान होता है। आवरण भी माया है, अनावरण भी माया ही करती है। बंधन भी माया है और मुक्ति भी माया देती है। बस साक्षी भाव में रहना है।
अज्ञानी के लिए माया, सत्य आदि सब बराबर है, जैसे अनपढ़ के लिए सभी भाषायें एक जैसी हैं।
ज्ञानी सब कुछ जान जाता है क्योंकि माया उसको जानने देती है। सरस्वती भी माया का एक रुप है। अंततः माया भी मैं ही हूँ, दृष्टा भी मैं ही हूँ, और दोनों एक ही हैं।
चेतना को कैसे बना कर रखा जाये?
यदि केवल मनन या विचारों से चेतना बनती है तो वो चेतना नहीं है। चेतना तो विचारों के अभाव में भी होती है। चेतना तब स्थिर होती है जब ज्ञान पक्का हो जाता है, जब आत्मज्ञान होने से बुद्धि शुद्ध हो गई हो।
शुद्ध अशुद्ध विचारों की चेतना बनाये रखें। विचारों से चेतना नहीं आती है, विचारों की चेतना होती है।
चेतना का अर्थ है दृष्टा या अनुभवकर्ता का ज्ञान। चेतना वह है जब दृष्टिकोण अनुभव से हटकर अनुभवकर्ता का हो जाये। फिर कोई भी विचार हो उससे अन्तर नहीं पड़ता है। हर अनुभव अनुभवकर्ता का ही दर्शन है। अनुभव का दृष्टा कौन है, वही चेतना है, बस दृष्टा या साक्षी भाव में रहना चेतना का होना है।
चेतना आवश्यक नहीं है, ज्ञान आवश्यक है। दृश्य दृष्टा में भेद जान लेना, आत्मज्ञान हो जाने से चेतना आ जाती है। जो पहले से ही सचेत है, जब मैं पहले से ही ब्रह्मं हूँ, उसका स्मरण कर लें बस, यही चेतना में स्थिति है।
इस मशीन या पुतले से कर्म होते रहने दें, चैतन्य सर्वदा चैतन्य है, मैं पहले से ही मुक्त हूँ। मैं किसी योनि में नहीं हूँ, पहले से ही समयहीनता है। अज्ञान जड़ है दुख का, चेतना का अभाव नहीं।
जो भी हुआ, जो हो रहा है या जो भी होगा, सभी मिथ्या है या माया है, यह जानना ही चेतना है।
कोई भी कल्पना, विचार, घटनायें आदि, मानसिक या भौतिक जो भी हुआ है, उसको एक बार और पूरी चेतना के साथ मानस पटल पर दोहरायें। यह एक बहुत अच्छी विधि है मुक्ति की या चेतना बनाने की। यह संकल्प लें कि दोबारा यदि यह हो, तो मेरी चेतना बनी रहे। फिर दोबारा यदि वह घटना होती है तो उसके साथ ही चेतना भी आ जाती है। जैसे शक्कर की वासना के साथ दंड का स्मरण भी जुड़ जाता है।
यही चित्त का स्वभाव है। जो चित्त को जान गया है वह उसमें फिर कुछ भी कर सकता है। जो मशीन को जान गया है वह उसमें बदलाव भी कर सकता है।
पतंजलि ने भी यही कहा है - बुद्धि शुद्ध हो जाती है तो साधक दृष्टा रुप में अवस्थित हो जाता है, नहीं तो विक्षेप विपर्य आदि चित्त में चलते रहते हैं। योग चित्त वृत्ति निरोध, तदा दृष्टा स्वरूपे अवस्थानम।
जब यह समझ आ गया कि कोई चाहने वाला ही नहीं है, तो चेतना जब चाहें या जब आवश्यक है, तब आ जाती है। चेतना लायी नहीं जाती है, मूल तत्व का ज्ञान होने पर चेतना अपने आप आती है। फिर धीरे धीरे, चित्त को उसका अमृत रुपी स्वाद अच्छा लगने लगता है।
जब कर्ता ही नहीं है, तो चेतना में आने का प्रयास कौन करेगा? ज्ञान के लिए समर्पण और गुरु कृपा से ही चेतना में स्थिरता आती है। फिर जीवन में आनंद है और जीवन एक खेल हो जाता है।
जो भी अनुभव में है वह मिथ्या है या माया का अनुभव है। जैसे चलचित्र में जो दिख रहा है वह वहां है नहीं, पर अनुभव तो हो रहा है। बस नाद है, चित्त है, माया है।
अनुभव और अनुभवकर्ता, शिव-शक्ति, शून्यता-संसार, सागर-लहरें, यह एक दूसरे पर आधारित नहीं है, दोनों एक ही हैं।
अनुभवकर्ता ---- आत्मन, दृष्टा
अनुभव ---- माया, दृश्य
अनुभवक्रिया ---- समाधि, दृष्टि
अस्तित्व ---- ब्रह्मं
ब्रह्मं का अर्थ है अस्तित्व, और अनुभव अस्तित्व का ही भाग है जो परिवर्तन या माया के रूप में प्रकट है। अनुभव भी प्रकट नहीं होता है, माया प्रकट है।
अस्तित्व में अनुभव और अनुभवकर्ता के सिवा कुछ भी नहीं है और दोनों एक ही हैं, यही अस्तित्व का प्रमाण है। दो कहां है कोई यह सिद्ध कर दे; यदि नहीं किया जा सकता है तो केवल अद्वैत ही है, यह अपने आप सिद्ध हो जाता है। जो अज्ञेय है उसको नकारात्मक ज्ञान या नेती नेती से ही सिद्ध किया जा सकता है। जब द्वैत को सिद्ध नहीं किया जा सकता है, तो केवल अद्वैत ही बचता है।
अनुभव का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, अनुभवकर्ता का भी स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, केवल अनुभवक्रिया या दृष्टि मात्र है और अनुभवक्रिया ही अस्तित्व है। इसके सिवा और कोई दूसरा अस्तित्व नहीं है।
सभी अनुभव अहंकार के बिना ही हो रहे हैं, बीच बीच में अहंकार की वृत्ति चलती है, और अहंकार भी एक अनुभव मात्र है। स्वप्न में भी अहंकार होता है और वह भी मिथ्या ही है।
मिथ्या का जो ज्ञान है उसको विज्ञानमाया कोष कहते हैं। जहां चेतना का उद्भव होता है उसको आनंदमाया कोष या समाधि कह सकते हैं। यही चेतना की परत है, क्योंकि यहां सुख दुख आदि द्वन्द नहीं हैं, बस शून्यता है, शांति है या आनंद है। यही आनंद चित्त में झलकता है और विचार वाणी और कर्म के रुप में प्रकट होता है। विश्वचित्त में सभी कुछ आनंद स्वरूप है, अज्ञानवश हम उसको देख नहीं पाते हैं। अज्ञान भी लीला ही है।
आनंद ही सुख या दुख के रूप में प्रकट होता है, और जब यह प्रकट नहीं है तो यही शांति है, परमानंद है, नित्यानंद है, जो कि मैं स्वयं ही हूँ। चेतना में हर अनुभव आनंद का ही अनुभव होता है। आनंद अद्वैत की अवस्था है, मेरा मूल स्वरूप है। आनंद कुछ पाने से नहीं मिलेगा, बल्कि खोने से मिलेगा। जो आप स्वयं हैं उसको ढूंढने कहां भाग रहे हैं? जिसने स्वयं को जान लिया वो हमेशा आनंदित है।
एक ही अनुभव का अलग अलग तरह से व्यवस्थापन अज्ञान में भिन्नता होने के कारण है। ज्ञान मतलब सम्बंध काटना होता है, बनाना नहीं होता है। अद्वैत में कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि सम्बंध बनाने के लिए दो होना आवश्यक है।
ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा भी एक तरह की वासना है। मूर्ति एक मानसिक यंत्र है जिसको तांत्रिक वासना पूर्ति के लिए उपयोग में लाता है। प्राण एक तरह की मानसिक ऊर्जा है या गति है, अमूर्त संकल्प शक्ति के द्वारा सूक्ष्म रुप से मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा कर दी जाती है।
जितनी सूक्ष्म रचना रहेगी वह उतनी परिवर्तनशील होती है।
किताब पढ़ने से ज्ञान नहीं मिलता, गुरु के पास बैठकर, प्रयोग करने से और गुरु कृपा से अज्ञान का नाश होता है।
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4) प्रश्नोत्तर शृंखला भाग 2
स्वयं देव बन जायें, भिखारीयों की तरह ना मांगे।
पुनर्जन्म जीव का होता है, शरीर, व्यक्ति या आत्मन का नहीं। मैं जीव नहीं हूँ, मेरा कभी जन्म नहीं होता है।
अनुभवक्रिया के सिवा और कोई दूसरी स्थिति सम्भव ही नहीं है। यह वृत्ति त्याग दें कि मैं अनुभवक्रिया की स्थिति में नहीं हूँ या उसमें स्थित होना चाहता हूँ। चित्त को जो भी कहना है उसको कहने दो, बस साक्षी भाव में रहें। यह अज्ञान है कि मैं माया में फंसा हुआ हूँ, मेरी प्राकृतिक स्थिति समाधि की ही है। बस मान्यताओं को हटाना मात्र है आप पहले से ही ब्रह्मं हैं, जीवनमुक्त हैं।
अहम की मिथ्या का ज्ञान आत्मज्ञान है, और अहम की सर्वव्यापकता का ज्ञान ब्रह्मज्ञान है। अन्त में केवल निर्गुण ब्रह्मं, शून्यता, अनुभवक्रिया ही है। इस अस्तित्व से भिन्न कुछ 'अहम' कहीं नहीं है।
चित्त की वृत्ति को रोका नहीं जा सकता है, केवल मानव चित्त या जीव विलीन हो जाता है विश्वचित्त में। जैसे लहर विलीन हो जाती है सागर में, और वह फिर से सम्पूर्ण है, वैसे भी वह हमेशा पूर्ण सागर ही थी। जब अशुद्धि नष्ट हो जाती है तो चित्त माया जान पड़ता है। समाधि में भी यही ज्ञान होता है कि चित्त असत्य है और मेरा स्वरूप शून्यता है। फिर चित्त की वृत्ति होना या ना होना एक बराबर हो जाता है। फिर वृत्ति होते हुए भी नहीं होती है यही चित्त वृत्ति निरोध है।
योग में हम पहले से ही हैं, योग में जाया नहीं जा सकता है। योग मार्ग में भी अंतर्शुद्धि ही की जाती है।
मेरे कोई कर्म नहीं हैं, मैं तो पहले से ही जीव और कर्मों का साक्षी हूँ। जीव की मुक्ति सम्भव नहीं है, जीव का विलय सम्भव है। मैं तो पहले से ही मुक्त हूँ, और अज्ञान के कारण जो बंधन में प्रतीत होता है, वो मुक्त हो ही नहीं सकता है। जो वृत्तियां दुख या सुख का कारण हैं वही काल्पनिक बंधन है, जो अज्ञान के नाश से दूर हो जाता है।
चेतना के प्रकाश में बंधन टूट जाते हैं। चित्त की शुद्धि होने से अनुभव भी बदलने लगते हैं।
संसार रंगमंच की तरह है, संस्कार जीव को कठपुतली की तरह चला रहे हैं। इसमें कुछ भी सत्य नहीं है। ज्ञान होने के बाद यह नाटक दिखने लगता है और हर अनुभव मिथ्या दिखाई देने लगता है। ज्ञान होने से पहले भी यह असत्य ही था। मान्यताओं को दूर करना ही ज्ञान है। चेतना का प्रकाश आपका स्वरूप है।
अनुभव, अनुसंधान, गुरु का मार्गदर्शन और प्रयोग से ही पता चलेगा कि क्या सत्य है या क्या असत्य है। शास्त्रों में मिश्रण है, कुछ सत्य है कुछ असत्य है, कुछ कल्पना है, कुछ संकेतिक है, कुछ कहानी है, कुछ शिक्षा देने के लिए है। इतिहास और कहानी का भी मिश्रण हो जाता है।
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5) प्रश्नोत्तर शृंखला भाग 3
अनुभव का कोई स्थान नहीं होता है, स्थान का अनुभव होता है। जहां चेतना है वहीं अनुभव है। चेतना या अनुभव शरीर के अंदर कहीं नहीं मिलेगा।
जब तक तर्क के आधार पर कुछ सिद्ध नहीं हो जाता है तब तक उसे सत्य नहीं मानना चाहिये।
अनुभव केवल नाद रचनाओं का होता है, और क्योंकि मैं ही नाद हूँ इसलिये मुझे मेरा ही अनुभव होता है। यदि अनुभवकर्ता अनुभव से भिन्न होता तो उसका अनुभव नहीं हो सकता है। दोनों एक ही हैं।
संसार, संसारी लोग, संसारिक कार्य भी अध्यात्मिक हैं, संसार भी आत्मन है, मैं ही हूँ। सारे जीव भी ब्रह्मं ही हैं तो इसमें क्या अध्यात्मिक नहीं है? तो संसार विघ्न कैसे हो सकता है जब वो भी अध्यात्म ही है। करना बस इतना ही है कि संसारिक कार्य करते हुए भी अपनी चेतना बनाये रखनी चाहिए।
संसार को दुख का कारण नहीं समझें, बल्कि एक शिक्षा की तरह से देखें। अपना जरूरी दायित्व पूरा करने के बाद का समय व्यर्थ न करें, उसमें पूरी तरह से साधना पर ध्यान दें। दिखावा कम करें, संग्रह कम करें, आदतें सुधार लें, जीवन सरल बना लें तो अध्यात्म के लिए बहुत समय मिल जायेगा और संतुलन अपने आप बन जायेगा।
ज्ञान मार्ग पर शुरू में लगता है कि समय देना पड़ेगा पर इसमें कुछ अधिक समय नहीं लगता है। अनुभव, अनुभवकर्ता, चेतना तो अभी है, यहीं है। अध्यात्मिक कार्य निजी कार्य है, अज्ञानी इसको नहीं समझते हैं। जिसको जो चाहिये वो उसे दे दो और बचे हुऐ समय में जो आपको अच्छा लगे वो करें। जीवन में अनावश्यक कर्मों को हटा दें, न्युन्तावादी हो जायें।
काल की रचना स्मृति से होती है। स्मृति भी मिथ्या है, सब माया है। सभी अनुभव शून्य हैं। मैं स्वयं ही हूँ जो मिथ्या रुप में स्वयं का ही अनुभव करता हूँ। शून्यता में से शून्यता ही प्रकट होती है।
जहां रुचि होती है ध्यान वहीं जाता है। ज्ञान मार्ग में केवल ज्ञान पर ध्यान दें, इससे चित्त की रुचि चेतना में हो जाती है।
बाकी लोगों को छोड़ कर अपना मूल्यांकन करें की मेरे अंदर कहां गलतीयां हैं, बुद्धि कहां चलती है, दुर्बलता कहां है। एक बार यह समझ आ जाता है तो उनको दूर करना सम्भव हो जाता है।
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सत्संग 24, 27 Feb 21 के कुछ मुख्य बिंदु।
जिसको आत्मज्ञान हो गया है तो उसको बंधन नहीं दिखते हैं। चित्त बंधा हुआ है वासनाओं से, मैं नहीं। रचना है तो इसका मतलब है कि वह बंधन में है, नियम हैं, प्रक्रिया चल रही है। स्मृति भी ऐसी ही एक रचना है।
स्मृति के कारण ही अनुभव होता है, बुद्धि बनती है, यंत्र हैं, और आत्म ज्ञान सम्भव है। माया है इसलिये माया के अन्य क्या है यह जानना सम्भव है। शून्यता में तो ना जानने वाला है, ना वह है जिसको जाना जा रहा है, बस साक्षी है, अद्वैत है।
ज्ञान मार्ग पर दृष्टा और दृश्य में भेद जानना बहुत महत्वपूर्ण है। दृष्टा कब दृश्य से पृथक नहीं है? दृष्टा हमेशा खाली होता है और चित्त हमेशा भरा हुआ होता है और इस स्थिति को कभी बदला नहीं जा सकता है, यह अटल है।
यदि इच्छा नहीं होगी तो कर्म भी नहीं होता है। वासना का प्रभाव केवल मनोशरीर यंत्र पर पड़ता है। माया का प्रभाव सत्य को ठीक उलटा कर देता है और ज्ञान की जगह अज्ञान ले लेता है, यही चेतना का अभाव है।
जब स्मरण आ जाये तो उसमें रहने का संकल्प कीजिये, यही साधना है। चेतना का अर्थ कर्महीनता नहीं है, चेतना का अर्थ प्रकाषित कर्म है।
चेतना से अशुद्धि प्रकाषित हो जायेंगी, और अशुद्धि के कारण होने वाले कर्म रूक जायेंगे। इस शुद्धिकरण के कारण दुख से मुक्ति होगी। अज्ञान से मुक्ति ही मुक्ति है, और इसका फल है सुख शांति और समृद्धि।
दृष्टा का आनंद जीव में प्रतिबिम्बित होता है, जैसे सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा में। अनुभवकर्ता सुर्य के जैसे है और चेतना युक्त चित्त चन्द्रमा की तरह है।
शिव के मस्तिस्क पर चन्द्र, चेतन युक्त चित्त या चेतना को दर्शाता है। इसलिये शिव को चन्द्रशेखर भी कहा गया है। जिस योगी या ज्ञानी की चेतना जागृत हो गयी है वो चन्द्रशेखर, यानि शिव है।
हठ - ह यानि सुर्य और ठ यानि चन्द्र, यही हठ योग है। मूल ज्ञान हो गया तो सारे उपनिषद समझ में आने लगेंगे।
आभा का अर्थ है प्रकाश, मण्डल का अर्थ है क्षेत्र। ज्ञानी का सूक्ष्म या दिव्य शरीर प्रकाश के रूप में दिखता है, यही आभामंडल है।
इच्छा पहले आती है और अहंकार बाद में आता है कि यह मेरी इच्छा है। अहम कुछ कर्ता नहीं है, यह बस अज्ञान मात्र है। कार्य हो जाता है उसके बाद अहंकार कहता है कि यह मैनें किया है। लेकिन अहंकार जीवित रहने के लिए आवश्यक है।
समयहीनता का सिद्धांत है कि इच्छा उठते ही वह पूरी हो चुकी है। सभी इच्छायें विश्वचित्त की इच्छा हैं, तो सारा विश्वचित्त लग जाता है उसको पूरा करने के लिए। माया या समय में कब यह प्रकट होगा यह कोई नहीं जानता है। जो असम्भव है और फिर भी हो रहा है, वह चमत्कार है।
अहंकार यानि पशुवृत्ति को शेर की हिंसक वृत्ति के रूप में दिखाया गया है। योगी मरे हुऐ शेर पर बैठा है, यानि पशुवृत्ति पूरी तरह नियंत्रण में है।
गुरु के लिए आदर होता है, भक्ति या अंधश्रद्धा नहीं।
अज्ञान से मुक्ति, इससे अधिक कोई और पुण्य कर्म नहीं है। चेतना के स्थापित होने के बाद जो भी होता है, वो अर्थहीन होता है।
बिना गुरु के मार्गदर्शन में की गई साधना का फल नहीं आता है।
जो मुक्त है वो सदा मुक्त है, और जो बंधन में है वह सदा बंधन में ही रहेगा। जिसका जन्म मरन हो रहा है, जो प्रतीत होता है, उसका तत्व भी आत्मन है, या शून्यता ही है। माया अर्थात जो है ही नहीं, या जो शून्य है। इसलिये केवल अद्वैत ही है।
अद्वैत के स्तर पर ना अनुभव है ना अनुभवकर्ता है, बस अनुभवक्रिया ही है। अनुभवक्रिया का भी तत्व शून्य है। तो किसका जन्म या मृत्यु हो रहा है। मुक्ति की इच्छा भी माया का भाग है।
जब अज्ञान नहीं है तो वही मुक्ति है, अज्ञान है तो मुक्ति सम्भव नहीं है। बंधन माया है, और मुक्ति पहले से ही है, तो बचा क्या? बंधन का विरोधात्मक शब्द मुक्ति नहीं है, बल्कि अज्ञान है। बस मुक्ति ही है। ज्ञान नहीं होगा तो मुक्ति नहीं होगी। ज्ञान हो गया तो बंधन नहीं होगा। जब बंधन चित्त निर्मित हैं, माया है, तो मुक्ति भी माया है।
सुखी भव!
यह चित्त पागल भूत की तरह भागता है। तुम पहले से ही परम मुक्त हो। बस इतना जानकर सुखी हो जाइये और क्या करना चाहते हो? बंदर की तरह अध्यात्म में दूसरों की देखा देखी कुछ ना करें।
जब यह भी नहीं पता की मुक्ति क्या है, तो मुक्ति मिलेगी कैसे? रचनायें तो हमेशा बंधी रहेंगी, मैं नहीं। मैं तो सदा नित्य मुक्त हूँ, एक बार यह देख लें, फिर उस ज्ञान से नीचे मत आइये। गरम तवे को कितनी बार छूना पड़ेगा, यह जानने के लिए कि वो गरम है? आत्मज्ञान कितनी बार लेना चाहते हो?
समयहीनता कहती है कि मुक्ति पहले ही हो चुकी है। और शून्यता कहती है कि जो भी है, वो था ही नहीं कभी।
इस तरह ज्ञान में उपर जाना चाहिये। ज्ञान होने के बाद भी जीव दुखी है तो कोई बात नहीं है, उसका दुख भी नकली है, सब माया है। जिसने यह देख लिया वो आनंद की अवस्था में स्थित है। जैसे दुख माया है, सुख भी माया ही है। तो अब करने के लिए क्या बचा है। इसके बाद, जो प्रारब्ध बचा हुआ है उसका उपयोग करना चाहिए।
मुक्ति वह है जहां कोई कर्ता नहीं है। जीव की अवस्था अभी भी यही है। जब व्यक्ति ही नहीं है, तो लीला भी नहीं है। ना मुक्ति है ना बंधन है, ना संसार शुरू हुआ है ना समाप्त होगा। जो यह जान गया, ना उसका कर्म है ना कोई कर्म बंधन है।
केवल सुनकर विश्वास मत कीजिये, बल्कि विचार कीजिये यह संसार मिथ्या क्यों है? सत्य क्या है, वो नहीं जाना जा सकता है। मिथ्या क्या है यह जाना जा सकता है, और जो बचता है वो सत्य है। ज्ञान उसीका होता है जो अनुभव में है और सत्य अनुभव से परे है।
अहम भाव जानने नहीं देता है कि जगत मिथ्या है, या माया क्या है। माया से रचना मुक्त नहीं हो सकती है। कलाकार चरित्र को जानता है, पर चरित्र कैसे कलाकार को जान सकता है? माया क्या है, यह कोई नहीं जानता है, माया भी अज्ञेय है। ऐसा इसलिये है क्योंकि मैं ही माया हूँ।अनुभवकर्ता का ज्ञान कभी नहीं होता है, पर अनुभवकर्ता हुआ जा सकता है।
आप वो हैं जो जन्म के पहले थे, वहां अहंकार नहीं होता है।
अज्ञानम मलम, ज्ञानम मलम, दोनों ही मैल हैं। ज्ञान भी अज्ञान ही है। जीव को ज्ञान नहीं हो सकता है। नाम रुप तो अज्ञान है, भ्रम हैं, प्रतीत होते हैं, चित्त निर्मित है। यदि अज्ञान को ही ज्ञान मान लिया है, तो अब अज्ञान से मुक्ति कैसे मिलेगी।
उस शिव को जान लो, जो परम शून्य है, जो मेरी अवस्था अभी भी है, शिवोहम, फिर और कुछ जानने को नहीं रहेगा।
प्रमाण से अज्ञान का नाश होता है, ज्ञान नहीं मिलता है। प्रमाण नकारात्मक ज्ञान देते हैं, यानि उससे कुछ अज्ञान नष्ट होता है। बुद्धि का उपयोग भी अज्ञान या अशुद्धि मिटाने के लिए किया जाता है, इसके अतिरिक्त बुद्धि का कोई उपयोग नहीं है। बुद्धि अज्ञेयता की ओर ले जाती है। हमने अज्ञान को ज्ञान मानकर स्मृति में जमा कर रखा है।
ज्ञान के अभाव, या अज्ञान में जो भी किया जाता है वो सब बेकार है। ज्ञान एक ही है, और वो है आत्मज्ञान। इसके बाद मार्ग समाप्त हो जाता है, और कुछ साधना नहीं है करने के लिए। सुर्य को जान लीजिये और अपने शिखर पर चन्द्र को स्थापित कीजिये।
जिसको आत्मज्ञान हो गया है, अज्ञान का नाश हो गया है, वो तो परम मौन में पहले से ही है। मैं अपरिवर्तनीय हूँ, मैं हमेशा दृष्टा ही हूँ, कुछ करना नहीं है दृष्टा बनने के लिए। बस यह स्मरण रखना चाहिये।
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सत्संग 25, 6 Mar 21 के कुछ मुख्य बिंदु।
व्यक्ति का चित्त नहीं होता, चित्त में व्यक्ति की धारणा होती है, यह मूल ज्ञान है। व्यक्ति तो पहले से ही नहीं है, तो वह विलीन कैसे हो सकता है।
चित्त की एक परत (अहंकार) में यह अज्ञान है कि चित्त व्यक्तिगत है, अनुभव मेरे हैं आदि। बुद्धि शुद्ध होने पर, या अज्ञान का नाश होने पर, यह कल्पना नहीं रहती है, और सारा चित्त एक ही है, या केवल विश्वचित्त ही है, यह ज्ञान हो जाता है।
सभी अनुभव चित्त के ही अनुभव हैं, विलीन होना भी तो एक अनुभव ही है।
नाद जब स्थूल परतों में होता है तो उसमें परिवर्तन बहुत धीरे होते हुए प्रतीत होते हैं। और कुछ तेज नाद हैं और यह सूक्ष्म परतें इन्द्रियों की पहुंच से बाहर हैं, इनको महत् कहा गया है। महत् का अर्थ महातत्व या शून्यता या परानाद है। यहां विलीनता है।
किसी कारण से यह नाद धीरे हो जाता है, तो आकाश तत्व वायु तत्व आदि के रूप में प्रकट होता है। कारण शरीर, विचार आदि वायु तत्व हैं, अग्नी तत्व यानि भावनायें आदि, यह सब कल्पना की गई है।
यही नाद पंच महाभूत हैं, जिनसे सारी सृष्टि बनी है। भूत, भव, यानि जो हो चुका है, जो पहले से है।
सब कुछ वैसा ही रहता है कुछ नष्ट नहीं होता है, केवल ध्यान सूक्ष्मता की ओर जा सकता है। चित्त यांत्रिक है, उसपर इतना नियंत्रित कर लें कि उसकी गति ऊपरी परतों में ठहरने लगे और नीचे की तरफ नहीं आये।
आकाश तत्व तो चित्त ही है, सारी सृष्टि आकाश तत्व में विलीन होती है और फिर उभरती है, चित्त कभी विलीन नहीं होता है। मैं सदा हूँ, मैं कभी विलीन नहीं होता हूँ। चित्त भी सदा ही है, क्योंकि चित्त भी मैं ही हूँ, यह मेरा ही तो नाद है।
प्रलय शब्द लय से निकला है, जो अशांति थी वो अब नहीं है। अभी भी हमारी स्थिति प्रलय की ही है, क्योंकि सभी कुछ समयहीनता में ही तो चल रहा है।
जो नाद रचनायें स्वयं संगठित होकर, थोड़ी देर के लिए स्थायी हो जाती हैं, उनको स्मृति कहते हैं।
इस लोक को मृत्युलोक भी कहते हैं, क्योंकि यहां यह अज्ञान है कि मेरा जन्म होता है और मेरी मृत्यु होती है। यहां सब केवल नाद रचनाओं का बहाव मात्र है।
पेड़ के मन में मृत्यु का अज्ञान नहीं है इसलिये उसमें बहुत शांति है। अहम भाव दुख का कारण है। आत्मज्ञान से यह ज्ञान हो जाता है कि जो भी अनित्य रचनायें हैं, वो मैं नहीं हूँ, तो शांति फिर से स्थापित हो जाती है, उसी को समाधि कहते हैं।
मेरी समाधि की स्थिति अभी भी है, रचनाओं का खेल तो चलता रहेगा। इसी अवस्था को स्वर्ग कहा गया है, जो कि ज्ञान से ही सम्भव है और मूल ज्ञान तो एक ही है।
अज्ञान है तो व्यक्ति प्रयास करेगा अंतर्शुद्धि का, और जब ज्ञान होगा तो परतें स्वयं शुद्ध होने लगेंगी। जो नशा करते हैं, व्यभचारी आदि है, उनको अंतर्शुद्धि की अधिक आवश्यकता है।
यदि ज्ञान तुरंत अपरोक्ष अनुभव के द्वारा समझ आ जाता है तो कई जन्मों की साधना होती है उसके पीछे। ज्ञान पर ध्यान देना चाहिए, बाकी शुद्धिकरण और चेतना जागृत अपने आप हो जाती है।
चेतना एक विशेष प्रकार का ज्ञान है। चेतना यानि आत्मज्ञान, आत्म का साक्षी होने का ज्ञान है।
गुरु साधक के स्तर पर जाकर, जहां भी वह फंसा हुआ है, उसे उभार लेते हैं। रमण महीर्षी ने अपनी गाय लक्ष्मी को ज्ञानी घोषित कर दिया था।
विश्वचित्त अपनी प्रगति स्वयं कर रहा है, गुरुक्षेत्र साधन है यह करने के लिए। गुरुक्षेत्र का तंत्र बहुत विस्तृत है। जो भी ज्ञान मार्ग पर चलने के लिए तैयार हैं वो आपके सामने स्वयं आ जायेंगे।
पशुयोनि से देवयोनि में आने में यदि 2000 साल भी लगते हैं तो वो बहुत अधिक नहीं है। कारण शरीर के लिए यह आधे घंटे के समान है। तो देर कभी नहीं हुई है, जहां हैं वहीं से शुरू करें, लीला अनंत चलती है।
अनुभवक्रिया अभ्यास से नहीं आती है, वो आपकी स्थिति पहले से ही है, और अभी भी आप उसी स्थिति में हैं। जब चेतना चली भी गई थी, तब भी मैं तो वहीं था। जब यह स्मरण आ जाये तो आगे बढ़ना है, और कुछ करना नहीं है। ज्ञान के पीछे भागीये, चेतना अपने आप आ जाती है।
चित्त वृत्ति से चेतना नहीं आती है, चेतना से चित्त वृत्ति प्रकाशित होती है। चेतना पहले आती है, उस प्रकाश में चित्त वृत्तियां दिखाई देती हैं। जब चेतना आ जाये तो यह जान लें कि यह सही अवस्था है, इतना दोहरा लें मन में और अपना कार्य जारी रखें, बस इतना ही करना है।
चेतना आती जाती रहेगी, यह व्यक्ति के हाथ में नहीं है। केवल समर्पण भाव में आ जायें, क्योंकि चेतना की अवस्था कृपा से आती है, जब चेतना चली जाये तो वहां पर भी समर्पण भाव में रहें।
प्रगति यही है कि नीचे नहीं जायें, बाकी अपने आप होगा। चेतना जब नहीं है, यह स्थिति धीरे धीरे बहुत कम हो जाती है, और अंततः अखण्ड चेतना हो जाती है।
कई बार इतना अज्ञान होता है कि यह भी नहीं पता होता है कि मैं क्या नहीं जानता हूँ। कई बार तो ज्ञान सारा बताने के बाद भी कुछ समझ नहीं आता है।
यह कार्यक्रम ज्ञान मार्ग की दीक्षा यानि ज्ञान की शुरुआत है, यह ज्ञान मार्ग का अन्त नहीं है।
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मैं उस गुरुक्षेत्र का भाग हूँ। जिन्होने कार्यक्रम पूरा किया है, वो भी गुरुक्षेत्र का भाग हैं।
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सभी दुखों का कारण अज्ञान है, और कोई कारण नहीं है दुख का।
यदि चेतना के प्रकाश में आने के बाद भी कठनाईयां आ रही हैं तो उसको भी अवसर बना लेँ।
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सत्संग 26, 13 Mar 21 के कुछ मुख्य बिंदु।
बुद्धि में अशुद्धि, अपनी योग्यताओं का दुरुपयोग और वातावरण अज्ञानी लोगों से भरा होना, एक तरह की बाधा है।
ज्ञानी के लिए जन्म मृत्यु बराबर है, क्योंकि सारे अनुभव माया हैं। जन्म, बंधन में पड़ना है और मृत्यु, बंधन से मुक्ति है। प्राकृतिक रुप से मृत्यु होना तो अच्छी बात है।
व्यक्ति के होने की धारणा तो पहले से ही भ्रम है और शरीर भी पहले से ही मिट्टी है, इसलिये ज्ञानी की दृष्टि में विश्वचित्त में यह प्रक्रिया केवल एक वृत्ति के रूप में चल रही है।
मृत्यु यानि एक आकृति स्वप्न में उभरी थी और अब वो चली गई, जीव को तो कुछ भी नहीं हुआ।
मेरी मृत्यु नहीं होनी चाहिए, इस विचार में अहम भाव और डर दोनों हैं। यह अज्ञान के कारण है। व्यक्ति के अधिकतर कर्म इसी भय या अज्ञान के कारण होते हैं। अज्ञान वश माया को सत्य मान लिया है।
ज्ञानी को डर लगता है लेकिन साथ में चेतना भी होती है कि यह डर जीव को हो रहा है, मुझे नहीं।
वासनायें कारण शरीर को चलाती हैं, और जीव इनको भौतिक शरीर के द्वारा प्राप्त अनुभवों से पूरा करना चाहता है।
कारण शरीर में जो ज्ञान पहले से ही संग्रहित है वो उसका उपयोग नहीं करता है, और समाज से जनित नई इच्छायें इकठ्ठी करता रहता है।
बीज शरीर में अनंत सम्भावनायें हैं, पर वह रेगिस्तान में तो फलित नहीं होगा। इसलिये सारा जीवन तुच्छ इच्छाओं को पूरा करने में बीत जाता है। यह जाती कर्म हैं।
कारण शरीर काल को भी आगे पीछे कर सकता है, वह काल बना सकता है जहां उसकी अभिव्यक्ति सबसे अच्छी होने की सम्भावना है। देश और काल दोनों चित्त निर्मित हैं। पर कारण शरीर को भी मैं ना मान लें, मैं वह भी नहीं हूँ।
कारण शरीर जब एक भौतिक शरीर से जुड़ जाता है तो उसकी अधिकतर योग्यतायें लूप्तप्राय या छुप जाती हैं। प्राकृतिक मृत्यु से उसकी योग्यतायें वापस आ जाती हैं, यानि वह भगवान या विश्वचित्त में लीन हो गया है।
वासनाओं के कारण ही जीव अपने स्वरूप से अनभिज्ञ रहता है। पृथ्वी लोक निचला लोक है, इसमें जन्म लेना कोई खुशी का कारण नहीं है।
माया बुद्धि में विक्षेप पैदा कर देती है या बुद्धि पर परदा पड़ जाता है। और व्यक्ति जो सत्य नहीं है उसको सत्य मान लेता है। माया से प्रभावित विपरीत / सत्यात्मक बुद्धि ना हो तो कोई जन्म नहीं लेना चाहेगा और यह जीवन समाप्त हो जायेगा।
बुद्धि में विक्षेप है तो यह ज्ञान समझ में नहीं आता है।
जो भी वृत्ति चल रही है यदि वो अंधकार में ना हो, और उसमें चेतना मिला दी जाये तो वही सिद्धि हो जाती है। चेतना के आते ही प्रगति हो जाती है, नहीं तो भैंस को तो कीचड़ में रहना ही अच्छा लगता है। इसलिये अज्ञानी व्यक्ति को संसार ही अच्छा लगता है क्योंकि वही उसकी वासनापूर्ति का साधन है।
चेतना जागृत होने पर जन्म मृत्यु में भी कोई बुराई नहीं है, क्योंकि फिर मृत्यु और जन्म पर पूरा नियंत्रण आ जाता है। किसी भी कारण शरीर में चेतना जागृत होना सबसे बड़ा चमत्कार है। यह एक बार हो गया तो वह फिर चेतना को छोड़ता नहीं है।
सतयुग में अज्ञान का अंधकार पूरी तरह से नाश हो जाता है। सतयुग का कोई अवशेष भी नहीं मिलता है। सतयुग में नाद बहुत तेज हो जाता है और यह सबसे अधिक समय तक चलता है। सतयुग में ही वेदों और उपनिषदों की रचना हुई है।
युग वृत्ति के रूप में चलते रहते हैं इसको रोका नहीं जा सकता है। ज्ञानी की दृष्टि से सतयुग या चेतना में जन्म का भी कोई अर्थ नहीं है, वह हमेशा सतयुग में ही है।
मृत्यु को जान लो, बाकी कुछ नहीं जानना है। विश्वचित्त में एक ही बुराई है और वो है निचली परतों में जन्म लेना। जन्म अज्ञान या मृत्यु के डर की वजह से ही होता है।
गुरुक्षेत्र इस अज्ञान का नाश करता है। विश्वचित्त ही आपको ज्ञान मार्ग पर लाया है तो आप गुरुक्षेत्र का भाग हो जायेंगे। आत्मज्ञान होते ही गुरुक्षेत्र में आपका प्रवेश हो जाता है। या तो आपकी प्रगति होगी या पतन, ठहराव सम्भव नहीं है।
जैसे बड़ा जहाज ऊंची लहरों से प्रभावित नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी काल चक्र में नहीं फंसता है।
हर युग में विभिन्न युग या चक्र चलते हैं। रात को 12 से सुबह 6 बजे तक का समय बहुत उपयोगी है प्रगति और प्रयोगों के लिए। नाद के अंदर नाद चल रहा है।
हममें भी योग्यतायें हैं पर तुच्छ इच्छाओं की वजह से हमने उनको त्याग दिया है।
सूक्ष्म लोक में अलग रचनायें दिखाई देंगी। अब भौतिक जगत सत्य है या सूक्ष्म जगत सत्य है? दोनों ही माया हैं, मिथ्या हैं। सभी युग भी माया हैं।
मेरा जन्म या मृत्यु नहीं हुई, दोनों भ्रम हैं, या स्वप्न रुप हैं। इस तरह गुरुक्षेत्र ज्ञान की तरफ खींच लेता है, पर अन्त में यह भी अर्थहीन है।
योग चित्त वृत्ति निरोध, इसमें निरोध अज्ञान का नाश दर्शाता है क्योंकि यहां योग का ज्ञान होता है। पर बिना ज्ञान के भी योग की अवस्था सम्भव है। चित्त वृत्ति तो आती जाती है, योग आता जाता नहीं है। चित्त वृत्ति नियंत्रण में आ जाये तो उसको निरोध कह सकते हैं।
चित्त वृत्ति को रोकना सम्भव नहीं है पर उसके पार जाना सम्भव है, उसपर नियंत्रण सम्भव है। वियोग इसलिये है क्योंकि बुद्धि में अशुद्धि है, बाकी की परतों में अशुद्धि होते हुए भी वह पहले से ही योग या सम्पूर्णता में हैं, जैसे शरीर, अहम, भावनायें आदि। बुद्धि में अंधकार है तो वियोग प्रतीत होता है। बुद्धि में से अज्ञान या वियोग की वृत्ति हट गई तो योग पहले से ही है।
मैं जीव हूँ और सृष्टि से भिन्न हूँ, यहां अनुभवकर्ता छूट गया है, बस यही वियोग की वृत्ति हटानी है, बाकी सब योग में ही है। योग सूत्र में बाद में यह सब समझाया है।
यदि आपने ज्ञान को अस्वीकार कर दिया, बुद्धि में बहुत अधिक अशुद्धि है, तो गुरुक्षेत्र वहां से हट जाता है।
जिनको योग मार्ग में रुचि है तो वो पूरी तरह से योग मार्ग में जायें, एक श्लोक से कुछ समझ नहीं आयेगा। योग सूत्र पढ़कर ज्ञान नहीं होता है, वह एक निर्देश पुस्तक है कि मनोशरीर यंत्र को ठीक कैसे करना है।
जैसे कार चलाना योग की विधियां हैं, और सांख्य यांत्रिकी और वैज्ञानिक का काम है। योग सूत्र सांख्य दर्शन का एक छोटा सा भाग है। सांख्य द्वैत और आस्तिक दर्शन है। अद्वैत नास्तिक दर्शन है।
अद्वैत माया का विस्तृत उत्तर नहीं दे सकता है, इसलिये सांख्य की आवश्यकता पड़ती है। सत्य असत्य जहां मिल जाता है वह योग है।
स्मृति की गति ही चित्त है, और चित्त वृत्ति ही माया है। जो भी प्रकट है, जो भी अनुभव है, वो बस है, उसका ही नाम माया है। माया से उपर कुछ नहीं है उसका किसी ने निर्माण नहीं किया है।
चित्त, माया, अनुभव एक ही शब्द हैं। स्मृति, चित्त वृत्ति, कल्पना, नाद, गति आदि उसकी कार्य प्रणाली है। कल्पना से केवल माया का एक छोटा सा भाग बनाया जा सकता है।
जो जैसा सोचता है उसे ठीक वैसा होता हुआ दिखाई देता है। जो यह सोचता है कि मुझे सब कुछ पता चल गया है तो उसकी ज्ञान मार्ग पर प्रगति नहीं हो सकती है।
गुरुक्षेत्र पके हुए फल पहले अपनी तरफ खींच लेता है। गुरुक्षेत्र से सम्बंध हो जाने पर, पहले से ही पूर्वाभास हो जाता है कि कहां सम्भावना है प्रगति की।
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सत्संग 27, 20 Mar 21 के कुछ मुख्य बिंदु।
कोई प्रश्न आने पर उसपर मनन करें, तो आप देखेंगे ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपको पता नहीं है। कोई अशुद्धि है, समझ में कहीं कोई चूक हुई है, कोई विक्षेप है बुद्धि में आदि, नहीं तो प्रश्न नहीं पैदा होता।
ज्ञान होने के बाद वृत्तियां साधारण रुप से चलती रहती हैं, पर यदि अंधकार भी आता है तो उसपर भी प्रकाश पड़ जाता है।
प्रश्न आयेगा तो तुरंत उसका उत्तर भी आ जायेगा, थोड़ासा प्रयास कीजिये। नहीं तो उसे लिख कर रख लें और बाद में उसपर मनन करें।
अच्छे विचार भी लिख कर रखें और उनको प्रकाषित भी करें, इससे वह ठोस हो जाता है और विश्वस्मृति में आ जाता है।
मनुष्य के स्वभाव को गुरुक्षेत्र बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।
हमारे अधिकतर विचार दोहराव के रूप में आते रहते हैं। या कुछ विचार बाहर कुछ होता है तो उससे आते हैं। पर बाहर भी कुछ नया नहीं चल रहा है।
साधक के मन में नये विचार आने की सम्भावना होती है। अध्यात्म मार्ग पर आने से आपका सम्पर्क गुरुक्षेत्र से बन जाता है।
आपका कोई भिन्न चित्त नहीं है, यह समूह चित्त ही है। सभी विचार विश्वचित्त में सुने जाते हैं।
बुरे विचार आना भी स्वाभाविक है, जब तक उनपर कर्म ना किये जायें तब तक उनके आने से कोई अन्तर नहीं पड़ता है। पर यदि उनपर कर्म कर दिया तो उसके फल भी आयेंगे।
अपने विचार यदि गुरुक्षेत्र तक पहुंचाने हैं तो उनको ठोस रुप में व्यक्त करना आवश्यक है, जैसे मुहँ से बोलकर, रिकॉर्ड करके या लिखकर।
साधारण व्यक्ति के मन में विचार अनियमित रुप से दोहराते हैं, जिसका कोई फल नहीं आता है। अध्यात्म मार्ग में चलने वाले साधक की वाणी में बहुत शक्ति होती है। इसलिये कुछ भी बोलने से पहले बहुत सोचना चाहिए।
ठोस रुप से व्यक्त करने से प्रश्न गूंज जाता है विश्वचित्त में। विश्वचित्त या गुरुक्षेत्र कहीं दूर नहीं है, बल्कि वह अभी हैं, और यहीं हैं।
गुरुक्षेत्र से उत्तर नहीं आते हैं, प्रेरणा मिलती है। उत्तर तो आपके पास पहले से ही हैं। इस प्रेरणा से बुद्धि उत्तर ढूंढ लेती है।
जितना किसी इच्छा के पीछे संकल्प डालेंगे उतना उसका फल मिलने की सम्भावना बड़ जाती है।
ऐसा कुछ मत कीजिये कि आपका मानसिक वातावरण प्रदूषित रहे। अपने चित्त को कचरा पेटी ना बनायें, विचार शुद्धि करें।
गुरुक्षेत्र में इतनी शक्ति है कि यदि आपने संकल्प कर लिया तो गुरुक्षेत्र आपकी संसारिक विघ्न, बाधा, अशुद्धि आदि भी हटा देते हैं। सच्चे साधक का जीवन एक चमत्कार की तरह चलता है। गुरुक्षेत्र से सम्पर्क होने के चिन्ह आपको मिलने लगेंगे। लेकिन आप गुरुक्षेत्र को कभी भी मूर्ख नहीं बना सकते हैं।
चित्त दृष्टा नहीं हो सकता है, वो वस्तु है, वो दृश्य ही रहेगा। चेतना के द्वारा चित्त की निचली परतें दृष्टि में आ जाती हैं और यह स्थिति शांतिपूर्ण होती है। प्रकाश का स्रोत एक ही है और वो है अनुभवकर्ता। यह प्रकाश चित्त के माध्यम से चित्त की निचली परतों तक पहुंचता है।
अद्वैत या अनुभवक्रिया का कोई अनुभव नहीं होता है। चित्तवृत्ति रुकने के बाद भी चित्त होता है। अद्वैत अज्ञेय है उसका ज्ञान नहीं हो सकता है, क्योंकि वो अनुभव नहीं है।
कुछ भी व्यक्त करते समय कुल ज्ञान (सम्पूर्ण ज्ञान) ध्यान में रखना चाहिए। शब्दों का उपयोग करने से पहले उसका अर्थ समझना जरूरी है।
वैराग्य का अर्थ यह नहीं है कि चित्त में सुख दुख आना बंद हो जाये या चित्त वृत्तियां रूक जायें। राग मतलब जो भी संसार में हो रहा है उसमें लीन या आसक्त होना। जब उसमें कोई रुचि या आसक्ति नहीं रहे, तो वही वैराग्य है।
वैराग्य की स्थिति ऊपरी परतों में होती है, बाकी की निचली परतों में वृत्तियां चलती रहती हैं, पर उनसे विरक्ति हो जाती है। यदि राग है तो वो व्यक्ति इच्छा आते ही तुरंत उसको पूरा करने के लिए काम में लग जायेगा। क्योंकि उसको यह अज्ञान है कि इससे सुख मिलेगा।
वैरागी थोड़ी देर सोचता है कि यह इच्छा मेरी तो है नहीं, पता नहीं इसका फल भी क्या आयेगा वो भी मेरे हाथ में नहीं है, यह फल तो मैं पहले भी बहुत बार चख चुका हूँ आज जाने दो, थोड़ा विलम्ब कर सकते हैं आदि, यह है वैराग्य।
वैराग्य एक तरह का आचरण है जो इस भावना से आता है कि संसार अर्थहीन है, शरीर से आसक्ति बंधन है, चित्त माया है, इससे ममता अर्थहीन है आदि। जब आत्मज्ञान होता है तो वैराग्य अपने आप ही आ जाता है।
ज्ञानी के चित्त में भी वृत्तियां वैसे ही उठती हैं जैसे अज्ञानी के चित्त में उठती हैं, बस ज्ञानी के चित्त में सभी वृत्तियां प्रकाषित होती हैं, और यह वैराग्य और ज्ञान के कारण होता है। कभी कभी अज्ञान होगा तो थोड़ा प्रभावित होता भी है, लेकिन जल्दी ही फिर चेतना आ जाती है कि यह वासना उस संस्कार की वजह से आयी है, यह तो होता ही रहता है आदि।
यह होना स्वाभाविक है। यदि शाब्दिक ज्ञान है तो उतना बदलाव नहीं आयेगा। अज्ञानी जो भी अंदर चल रहा है उसको 'मैं' मान लेता है तो फिर कुछ सही दिखाई नहीं देगा।
आत्मज्ञान होने से वृत्तियां प्रकाषित हो जाती हैं और दिखाई देती हैं और इससे वह स्मृति में अंकित हो जाती हैं। इससे साधक की संवेदनशीलता बड़ जाती है, अब सभी कुछ प्रकाश में हो रहा है। दिख गया तो उसपर नियंत्रण भी सम्भव है।
नियंत्रण का अर्थ है कि जो भी होता है वह प्रकाश में होता है। चित्त द्वैत है, उसमें क्रिया प्रतिक्रिया चलती रहती हैं, उससे क्या अन्तर पड़ता है। पर यदि यह दिख गया है कि यह कर्म होने वाला है तो उससे पहले बुद्धि का उपयोग आवश्यक है। वह कर्म रोकना है तो रोकना चाहिये, होने देना है तो होने देना चाहिए।
कर्म का जब फल आता है तो उससे भी सीख ही मिलती है। मनुष्य को बुद्धि मिली है तो उसका उपयोग करना भी प्राकृतिक है।
आत्मज्ञान, योग, समाधि आदि के बाद क्या होगा, यह कहीं भी लिखा हुआ नहीं मिलेगा। क्योंकि यह मान लिया जाता है कि आत्मज्ञान हो गया है तो सही कर्म अपने आप ही होंगे। सभी कर्म शुद्धिकरण के लिए ही होते हैं।
वृत्तियों को रोकना नहीं है, उनको देखना है। कर्मों को भी तभी रोकना है जब आपको निश्चित पता है कि इसका बुरा फल आयेगा।
ज्ञान से शुद्धि होती है, शुद्धि होने से ज्ञान होता है। यह कार के पहिये हैं जो साथ साथ चलते हैं, जैसे गुरु कृपा, साधक के गुण, शुद्धिकरण, आत्मज्ञान आदि। जब सभी चलते हैं तो कार सही और तेज चलेगी।
चित्त की वृत्तियां रुक नहीं जाती हैं, चित्त वृत्तियों से अलग कुछ नहीं है, जैसे वस्त्र धागे से अलग कुछ नहीं है।
अध्यात्मिक बुद्धि थोड़ा भिन्न होती है, वह सतह पर नहीं रहती है, उसमें बहुत गहराई होती है। अध्यात्मिक बुद्धि जब प्रकाषित होती है और पहले से इतना बदल जाती है की वो अब पहले जैसी नहीं रही, तो उसका नाम बदल कर उसे प्रज्ञा भी कह सकते हैं।
आत्मज्ञान इतना बदल देगा की आपको प्रश्नों के उत्तर पाना कोई बड़ी बात नहीं लगेगी। और यह बदलाव कभी कभी बहुत जल्दी हो जाता है। सही मार्ग पकड़ लेने से यह बदलाव 6 महीने में भी हो सकता है।
अनुभवक्रिया अद्वैत है, और चेतना द्वैत में है, तो दोनों की तुलना नहीं की जा सकती है। चेतना या वृत्तियां हो या ना हो, अनुभवक्रिया हमेशा रहती है, उसका स्तर उपर है। चेतना, अनुभव, अनुभवकर्ता आदि की तुलना की जा सकती है क्योंकि यह द्वैत में हैं।
चेतना जब जागृत होती है तो शांति उसका चिन्ह है। मेरी चेतना है कि नहीं इसकी आप चिंता न करें, दूसरे आपको बतायेंगे। जो अध्यात्म मार्ग पर हैं वो यह आसानी से देख सकते हैं और आपको बता देंगे।
बोधी वार्ता में तो सारा ज्ञान पहले से ही दे दिया गया है, कुछ छुपाया नहीं गया है। पर व्यवस्थित चलना अती आवश्यक है प्रगति के लिए। सीधा ज्ञान पा कर कई बार कुछ लोगों का सारा संघर्ष बहुत जल्दी समाप्त हो जाता है। बहुत से लोग जो मुझे सम्पर्क नहीं करते हैं लेकिन उनका भी बहुत लाभ हुआ है।
सत्संग में व्यवस्थित रूप से ज्ञान नहीं दिया जा सकता है।
यदि मुझे आत्मज्ञान हो गया है तो मुझे अपनी ही कथनी पर विश्वास नहीं हो, ऐसा नहीं हो सकता है। मूल ज्ञान सही रुप से और बिना किसी संशय के होना बहुत महत्वपूर्ण है, बाकी का धीरे धीरे अपने आप ठीक हो जाता है।
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आत्मज्ञान इतना बदल देगा की आपको प्रश्नों के उत्तर पाना कोई बड़ी बात नहीं लगेगी। और यह बदलाव कभी कभी बहुत जल्दी हो जाता है। जैसे की आशू के साथ हुआ है। यह बहुत आश्चर्य की बात है। मैं भी ऐसा ही था।
अब प्रश्नों के उत्तर देने में कोई डर नहीं लगता है। अब मैं यह नहीं सोचता कि यह सही है कि गलत है। इतना आत्मविश्वास हो जाता है कि मैं जो भी बोलूंगा उसमें अर्थ होगा। सही गलत की क्या चिंता करना, यहां कौनसी बात सही या गलत है।
अब वो व्यक्ति इतना बदल गया है कि अब उसका नाम भी बदल दिया जाता है। जैसे की आशू का नाम बदल दिया गया है। यही परम्परा है। जिस नाम से आप उसे जानते थे अब वो व्यक्ति वो नहीं रहा है।
जैसे आप पुराना अज्ञान भूल चुके हैं वैसे ही अब पुराना नाम, पुराना जीवन भूल जाना है। अब नया जीवन, नया स्वभाव है, नई वृत्तियां हैं, नयी भाषा होगी, सब कुछ नया होगा। जिसमें साधक के गुण हैं उसको रोका नहीं जा सकता है।
सत्यापन के बाद आपको सत्य दिखाई पड़ेगा, सामने प्रकट होगा और आपको पूछना नहीं पड़ेगा कि मेरे द्वारा दिया गया उत्तर सही है या नहीं।
बहुत कम हैं, पर ऐसे कुछ साधक हैं बोधी वार्ता में जिनको आत्मज्ञान हो गया है।
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सत्संग 28, 27 Mar 21 के कुछ मुख्य बिंदु।
साधक को जो दिखता है जो ज्ञान हो जाता है, वो वह कह देता है, बुद्ध ने भी यही किया है। कोई मार्ग बनाया नहीं जाता है, अपना लिया जाता है।
धर्म का अर्थ होता है सत्य। पर समाज उसे व्यवसाय बना देता है।
अध्यात्म मार्ग एक ही है और वो है सत्य की खोज। जब आत्मज्ञान हो जाये फिर ज्ञान मार्ग का भी कोई अर्थ नहीं रह जाता है।
अध्यात्म में आत्म की खोज है और तंत्र (या विज्ञान) में माया का उपयोग, और कुछ भी नहीं है।
अनुभवक्रिया में अनुभवकर्ता और अनुभव विलीन हो गये हैं, उनमें भेद नहीं रहा। जैसे पानी में रंग, सिक्के के दो पहलू, सोने से बना गहना आदि। चित्त पूर्णता को विभाजित करके उसको नाम रुप दे देता है।
अद्वैत के स्तर पर या अनुभवक्रिया में ना मिथ्या है ना सत्य है, और मिथ्या भी है और सत्य भी है। यह बात बुद्धि नहीं समझ सकती है क्योंकि बुद्धि स्वयं माया का भाग है। यह वाक्य इसलिये कहा जाता है कि अब बुद्धि बंद हो जाये।अध्यात्म मार्ग पर गुरु कृपा से प्रज्ञा प्रकट होती है, तो सभी भेद मिट जाते हैं।
बुद्धि के उपर चेतना की अवस्था में सत्य असत्य में भेद नहीं है, केवल अनुभवक्रिया है।
आत्मज्ञान या स्मरण पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है। अनुभवक्रिया, समाधि, कैवल्य, शून्यता तक पहुंचने का कोई मार्ग नहीं है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष है, वह सुनने या प्रयास से नहीं मिल सकता है।
शब्दों का अर्थ तभी होता है जब उसके पीछे उसका अपरोक्ष अनुभव भी प्रकट है।
अध्यात्म में दो चरण हैं, आत्मज्ञान और उसके बाद ब्रह्मज्ञान। आत्मज्ञान के बाद गुरुक्षेत्र की कृपा से ही, ब्रह्मज्ञान का अर्थ प्रकट होता है।
गुरु मंत्र है, आत्म के स्मरण में रहना, चेतना में रहना, मैं क्या हूँ इसका स्मरण रहना, इसको पकड़ कर रखें। जब छूट जाये तो जब भी याद आये तब वापस आ जायें।
माया, समाज, व्यक्तियों, गुरुओं, पूजा, तंत्र मंत्र, सूक्ष्म अवस्था आदि इनके चक्कर में मत पड़ीये।
अद्वैत अवस्था में चित्त टिक नहीं पाता है, मानव के लिए यह प्राकृतिक है। कर्ता या व्यक्ति तो अभी भी नहीं है तो कौन प्रयास करेगा समाधि में स्थिर रहने का।
इच्छायें अपने आप आती हैं, उसके साथ व्यक्ति करता क्या है, वह अधिक महत्वपूर्ण है।
परिवर्तन केवल प्रतीत होते हैं, वास्तव में होते नहीं हैं। अस्तित्व समयहीन है और यदि वह समयहीन है तो उसमें परिवर्तन कैसे हो सकता है। जो भी परिवर्तन होता हुआ दिखाई देता है, वो मिथ्या है, प्रतिति मात्र है।
नियम का पालन और नियम का तोड़ना दोनों माया है। माया में नियम नहीं है, नियम भी चित्त निर्मित हैं। साधक या ज्ञानी के लिए कोई चमत्कार नहीं है, सब माया है और माया ही सबसे बड़ा चमत्कार है।
अनुभवकर्ता कुछ कर नहीं रहा है, और वह जो यह सब है उससे भिन्न भी नहीं है। अनुभवकर्ता भी चित्त निर्मित है।
अनुभवकर्ता और अनुभव में कारण कर्ता आदि कोई सम्बंध नहीं है, क्योंकि दोनों एक ही हैं, केवल अस्तित्व है। माया का कोई कारण नहीं है। जब यह समझ नहीं आता तो कह देते हैं मैं ही अनुभवों का कारण हूँ। यह भी नहीं समझ आये तो कह देते हैं कि माया या चित्त परा भौतिक परा मानसिक नाद रचनायें हैं।
ज्ञान मार्ग पर केवल ऋणात्मक ज्ञान होता है, यानि जो अज्ञान है उसका नाश होता है। सत्य की विशेषता यह है कि सत्य सर्वदा प्रत्यक्ष प्रकट होता है।
समयहीनता सिद्धांत नहीं है, यह अपरोक्ष अनुभव है। केवल मैं हूँ, और बाकी सब कुछ केवल तरह तरह के भ्रम हैं।
बताने के बाद भी यदि समझ नहीं आता है, तो कोई विघ्न, अशुद्धि, डर आदि होता है। तब गुरुक्षेत्र केवल प्रतीक्षा करता है, उन मान्यताओं के दूर होने का। सत्य मान्यताओं के कारण दिखाई नहीं देता है, छुप जाता है।
नियम बाद में आता है, अनुभव पहले आता है।
जो परिवर्तन नहीं है, तो जो बचता है वही अनुभवकर्ता है, वही मैं हूँ। आभासिक परिवर्तन, या माया भी मैं ही हूँ, यानि केवल अस्तित्व ही है।
जागृति की बुद्धि या सत्यात्मक बुद्धि में सब गलत है, माया है, वही मैनें सत्य मान लिया है। यह बुद्धि उत्तरजीविता के लिए उपयोगी है, पर अध्यात्म में, या दार्शनिक को इसका कोई काम नहीं है।
सोचने के नये तरीके को प्रयोग में भी लाना आवश्यक है, केवल सुनकर लिखना बहुत नहीं है। साधना को काम की तरह नहीं करना है, साधना को अपनाना पड़ता है। जो ज्ञान दिया गया है वो मेरी बुद्धि का भाग हो जाना चाहिये।
जब कोई उत्तर जांच परखकर स्वीकार कर लिया जाता है, हाँ ऐसा ही है, तो मन में शांति आ जाती है।
मनन में मूल ज्ञान ही काम आयेगा। नेती नेती शस्त्र है जिससे आपका अज्ञान कटेगा।
बुद्धि, शरीर, मान्यताओं की सीमायें मैनें ही बना रखी हैं, और मैं ही उन्हें मिटा सकता हूँ।
जब आप लिखते हैं तो वही लिखिये जो आपकी समझ में आ गया है, नहीं तो उसपर विचार करिये या प्रश्न पूछना चाहिये।
केवल प्रश्न करते रहना ही बहुत नहीं है, उत्तर भी स्वयं ही ढूंढने का प्रयत्न करना आवश्यक है ज्ञान मार्ग पर। आपको शस्त्र दे दिये गये हैं, उनका उपयोग करके उत्तर स्वयं भी ढूँढे। ज्ञान के साधन (अपरोक्ष अनुभव और तर्क) और सत्य के मानदंड ये दो बड़े शस्त्र हैं आपके पास।
ज्ञान को यदि अपनाया नहीं गया तो वो फिर मेरा नहीं है, उसका कोई लाभ नहीं है। नहीं तो वो भी एक नई मान्यता बन जायेगी।
अनुभवकर्ता सत्य है, अनुभव माया है, और अस्तित्व दोनों है, और वही मैं हूँ।
प्रणाम।
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सत्संग 29, 3 Apr 21 के कुछ मुख्य बिंदु।
चेतना के साथ स्वप्न में प्रवेश करने से पता चल सकता है कि वहां क्या चल रहा है और स्वप्न अवस्था के क्या नियम हैं।
एक छोटा बच्चा जिसने अभी सामान्यकरण नहीं किया है जागृत अवस्था का, उसके लिये जागृत अवस्था स्वप्न की तरह है, उसे समझ नहीं आता है कि यहां यह सब कैसे और क्यों हो रहा है।
जब चित्त सीख जाता है कि कैसे नियमों का उपयोग करना है और सामान्यकरण करता है, तभी जागृत और स्वप्न में भेद समझ आता है उससे पहले नहीं। जब यह अज्ञान की नयी परत चढ़ जाती है तो माया का चेहरा बदला हुआ दिखता है जागृति और स्वप्न में। नहीं तो माया में कोई भेद नहीं है।
जागृति में सामान्यकरण हटा दीजिये और जागृति को एक नई दृष्टि से देखिये। एक अबोधता के साथ देखने से बहुत सी नयी चीजें देखने को मिलेंगी जो आप अभी नहीं देख पा रहे हैं।
जो स्वप्न में देखते हैं उसे सुबह उठकर लिख लें, इससे मानसिक संकल्प बनेगा और स्वप्न की मानसिक अवस्था भी बदलने लगेगी।
जब हम जागृति में अनुसंधान करते हैं तो उस समय स्वप्न से तुलना नहीं करते हैं उसकी। बिना तुलना किये नियम ढूँढे।
गुरुक्षेत्र से सम्पर्क होने पर कुछ प्रयास नहीं करना पड़ेगा, कुछ भी जानना आसान हो जायेगा। एक संकल्प के साथ स्वप्न लोक में प्रवेश कीजिये, और आप जो जानना चाहते हैं वो पता चल जायेगा।
जैसे स्वप्न में जो भी हो रहा है वह आपके किसी काम का नहीं है, वैसे ही जागृत अवस्था में भी सब कुछ अर्थहीन ही है, बिलकुल स्वप्न की तरह से।
जागृत अवस्था में केवल एक चीज ही काम की है और वो है, वह व्यक्ति जो गुरुक्षेत्र के साथ सम्पर्क में है। जो आपको बताता है कि मैं क्या हूँ, कि मैं स्वप्न में रहने वाला, चलने वाला एक स्वप्न चरित्र मात्र हूँ, जो अज्ञान दूर करता है।
जब मूल ज्ञान हो गया है, अंतर्द्वंद कम हो गया है, अधिकतर प्रश्न समाप्त हो गये हैं, तो गुरुक्षेत्र से सम्पर्क बनने लगता है। अंततः गुरुक्षेत्र भी मेरा ही रुप है।
जो जागृति में है वही सभी जगह है, बस थोड़ा सा अनुभव बदल जायेगा। कुछ समय में चित्त उन अनुभवों का भी सामान्यकरण कर देगा, कि यह तो ऐसा ही होता है।
सुनकर विश्वास मत करें, खुद प्रयोग करके गुरुक्षेत्र से सम्पर्क करें।
स्वप्न लोक में कारण शरीर सक्रिय होता है, इसलिये गुरुक्षेत्र स्वप्नलोक का बहुत उपयोग करते हैं।
स्वप्नलोक में जब गुरु प्रकट होते हैं तो स्वप्नलोक का गुण ही बदल जाता है, वो निरर्थक नहीं रहता है, और वहां पर संदेश भी दिया जाता है।
चेतना सम्पूर्ण रखनी है और उसी चेतना के साथ जागृति में आना है ताकि चेतना का पुल बना रहे। चेतना का पुल ही स्मृति में पुल बनाता है।
ज्ञान की इच्छा प्रकट करेंगे तो इच्छा पूरी होती ही है, उसमें कोई स्वार्थ नहीं है। यदि थोड़ी चेतना अस्थिर भी है, तो भी गुरुक्षेत्र के संकल्प से काम हो जायेगा।
जागृत अवस्था ज्यादा स्थायी है इसलिये तुल्यान्त्मक रुप में स्वप्न से अधिक सत्य प्रतीत होती है।
समय चित्त निर्मित है, इसलिये यदि चेतना है तो स्वप्न का बहाव थोड़ा धीरे किया जा सकता है।
जैसे माया खींच लेती है वैसे ही स्वप्न खींच लेता है, उसमें शक्ति होती है। हम स्वप्न अवस्था में कुछ अर्थ पूर्वक करते नहीं हैं। स्वप्न अवस्था में भी चेतना का प्रकाश जागृत करना आवश्यक है।
सभी लोकों में गुरुक्षेत्र मिलेगा, यहां पर इसी समय गुरुक्षेत्र प्रकट हैं। हम सभी गुरुक्षेत्र के भाग हैं, मैं ही तो हूँ गुरुक्षेत्र। मानसिक शोर कम करके, चित्त को शांत करके अपनी गुरुक्षेत्र से सम्पर्क करने की योग्यता वापस लानी है।
जो प्राकृतिक है, जैसा है वैसा ही वो सबसे अच्छा है।
जैसे जैसे ज्ञान बढ़ता है तो जो मिथ्या है, या संसार में रुचि कम हो जाती है। जो काम की चीज है, वो सतयुग का ज्ञान अभी भी बचा है।
गुरुक्षेत्र युगों के परे है। असत्य, धर्म आदि सब नाश हो जाता है, केवल ज्ञान का नाश नहीं होता है। साधक की जिम्मेदारी होती है ज्ञान की रक्षा करना।
स्थूल का अर्थ है कि जो बहुत धीरे बदलता है। स्थूल इन्द्रियां केवल स्थूल नाद ही पकड़ पाती हैं।
मृत्यु के बाद सूक्ष्म इन्द्रियां भी स्थूल लगने लगेंगी क्योंकि तुलना करने के लिए कुछ स्थूल रहा नहीं होता है। फिर वही सामान्य लगने लगेगा।
जागृति भी स्वप्न है और स्वप्न भी जागृति है। दोनों चित्त निर्मित हैं, इसलिये एक जैसे ही हैं। जैसे आपके संस्कार होते हैं वैसी ही जागृत या स्वप्न अवस्था होती है।
स्वप्न अवस्था के कुछ नियम हैं -
1. दृश्य हमेशा सीधा होता है।
2. समय हमेशा एक दिशा में चलता है।
3. प्रकाश का सोत्र नहीं होता।
4. स्थान अनंत है।
5. ध्वनि विचार है।
6. उर्जा का सोत्र नहीं होता।
7. मशीनें काम नहीं करती।
8. कारण-प्रभाव का आभाव।
9. स्वयं का चेहरा नहीं होता।
10. प्राथमिक दृष्टिकोण है।
11. रंग भाव प्रबल तन्मात्राएं हैं।
12. स्वाद गंध ताप मंद तन्मात्राएं हैं।
13. स्थान परिवर्तनशील हैं।
14. व्यक्ति परिवर्तनशील हैं।
15. चित्त के सभी नियम हैं।
16. अनुभवकर्ता है।
17. अनुभवक्रिया है।
1. दृश्य हमेशा सीधा होता है।
चित्त में कोई प्रक्रिया है जो दृश्य को सीधा कर देती है। सूक्ष्म लोक में यह प्रक्रिया कम हो जाती है, वहां कभी कभी यह नियम टूटता है। यदि स्वप्न में यह हो जाये तो इसका मतलब है कि आप स्वप्न लोक छोड़ चुके हैं और सूक्ष्म लोक में प्रवेश कर चुके हैं।
2. समय हमेशा एक दिशा में चलता है।
इससे भी यही पता चलता है कि समय चित्त निर्मित है।
3. प्रकाश का सोत्र नहीं होता।
प्रकाश का स्रोत नहीं है फिर भी चीजों का दिख जाना यह बताता है कि प्रकाश चित्त निर्मित है। प्रकाश केवल एक तरह का नाद है।
स्वप्न स्वप्रकाषित है, यह किसका प्रकाश है? यह आत्म प्रकाश है जिसमें हर अनुभव प्रकाशित होता है।
जागृत अवस्था में होने वाले अनुभव भी सूर्य से प्रकाशित नहीं हैं, वह भी स्वप्रकाषित हैं।
4. स्थान अनंत है।
आप जितना चाहे स्थान बना सकते हैं स्वप्न में, उसका कोई अन्त नहीं है। इससे यह सिद्ध होता है कि स्थान भी चित्त निर्मित है।
जैसे ही स्वप्न में स्थान या समय का अनुभव नहीं रहे, तो स्वप्न अवस्था नहीं रही है, आप तब शून्यता में हैं। चित्त का कार्य कभी बंद नहीं होता है बस अवस्थायें बदलती रहती हैं।
5. ध्वनि विचार है।
जो भी लोग बोलते हैं स्वप्न में, चेतना जागृत है तो यह पता चलता है कि वह मेरे ही विचार हैं।
केवल विश्वचित्त है, और उसमें नाद है यहां पर अलग कुछ भी नहीं है, सभी कुछ चित्त निर्मित है।
पदार्थ में नाद को ध्वनि कहते हैं, पर स्मृति में जो नाद है वो विचार के रुप में है।
6. उर्जा का सोत्र नहीं होता।
कोई नहीं जानता है कि वहां ऊर्जा कहां से आती है। ऊर्जा या परिवर्तन भी भ्रम है। ऊर्जा का स्रोत नहीं मिलना यही दर्शाता है कि परिवर्तन नहीं हो रहा है, परिवर्तन भी भ्रम है।
जागृत अवस्था में भी ऊर्जा का स्रोत क्या है यह कोई नहीं जानता है। यह केवल सिद्धांतिक है, मनगढ़ंत बातें हैं, सामान्यकरण करना है।
चित्त केवल एक भ्रम पैदा करता है की परिवर्तन हो रहा है, यह भी मनगढ़ंत है, चित्त निर्मित है। कुछ कार्य नहीं हो रहा है यहां पर।
7. मशीनें काम नहीं करती।
वहां उपकरण कभी काम करते हैं कभी नहीं, क्योंकि स्वप्न के नियम भौतिक नियमों से कुछ भिन्न हैं।
8. कारण-प्रभाव का आभाव।
यदि आपको स्वप्न लोक में कारण प्रभाव दिखने लगे तो इसका मतलब है कि स्वप्न अवस्था छूट गई है और सूक्ष्म लोक आ गया है।
9. स्वयं का चेहरा नहीं होता।
ऐसा इसलिये है क्योंकि वहां दर्पण के भौतिक नियम काम नहीं करते हैं।
10. प्राथमिक दृष्टिकोण है।
एक ही दृष्टिकोण रहता है, मैं स्वयं को किसी और के दृष्टिकोण से नहीं देख सकता हूँ। मैं अपने दृष्टिकोण से सबको देखता हूँ। मैं स्थायी रहता हूँ, बाकी सब दृश्य बदलते रहते हैं।
ठीक ऐसा ही जागृत अवस्था में भी होता है, चलने का भी दृश्य ही दिखाई देता है।
मैं विश्वस्मृति में किसी भी दृष्टिकोण से देख सकता हूँ, सभी मनुष्यों में यह सम्भावना है, क्योंकि वहां ना स्थान है ना समय है। लेकिन यह सिद्धियां मैनें त्याग दी हैं, अज्ञान का परदा पढ़ा हुआ है।
11. रंग भाव प्रबल तन्मात्राएं हैं।
प्रकाश, ध्वनि, भावनायें आदि प्रबल रहती हैं। स्थूल तन्मात्रायें घटती जायेंगी और सूक्ष्म तन्मात्रायें प्रबल होती जाती हैं। विकासक्रम में भी ऐसा ही होता है।
12. स्वाद गंध ताप मंद तन्मात्राएं हैं।
स्वाद, काम वासना, स्पर्श आदि इच्छायें स्वप्न में पूरी नहीं होती हैं, क्योंकि इनकी पूर्ति के लिए स्थूल इन्द्रियां चाहियें।
13. स्थान परिवर्तनशील हैं।
तेज बहाव है।
14. व्यक्ति परिवर्तनशील हैं।
भाव, सम्बंध, व्यक्ति आदि बहुत जल्दी बदल जाते हैं। स्वप्न में सब कुछ मैं ही हूँ,
मुझे मेरे ही चेहरे बदलते हुऐ दिखते हैं।
15. चित्त के सभी नियम हैं।
दृष्टि सृष्टि, जो दिख रहा है वही बन रहा है। जो चाहिये वो बनाया जा सकता है स्वप्न में, केवल संकल्प करने से प्रकट हो जाता है।
16. अनुभवकर्ता है।
जब हम जागते हैं स्वप्न से तो सब कुछ बदल गया होता है, फिर भी हम कहते हैं कि यह मेरा स्वप्न है। केवल अनुभवकर्ता नहीं बदलता, वह अटल सत्य है, इसलिये मेरा स्वप्न है यह कहना भी गलत नहीं है।
चित्त की बदलती हुई अवस्थाओं में जो स्थायी है, वो मैं ही हूँ, मैं ही अनुभवकर्ता हूँ।
यह सब मेरा ही रुप है जो नये नये जन्म ले रहे हैं। मैं हर रात एक नया जन्म लेता हूँ जिसको मैं स्वप्न कहता हूँ। एक ही स्वप्न में भी कई बार भिन्न रुप आ जाते हैं। मूल रुप से ठीक ऐसा ही जागृत अवस्था में भी हो रहा है।
17. अनुभवक्रिया है।
दोनों अवस्थाओं में एक ही अनुभवक्रिया दिखाई देती है।
सारा सत्य स्वप्न में भी है, उसे जान लीजिये। मूल ज्ञान होने के बाद बुद्धि अलग तरह से चलती है। अब वो समाजिक मतारोपण के बिना सत्य जानने के लिये मुक्त है, यह स्वतंत्र बुद्धि होनी चाहिये।
अहम के पीछे भी अनुभवकर्ता ही है, जिसकी वजह से अहम स्थायी प्रतीत होता है, पर ऐसा है नहीं।
मैं नहीं सोता, चित्त, स्मृति, कारण शरीर आदि भी नहीं सोते हैं। ज्ञान मार्ग में सोने का अर्थ है अज्ञान, चाहे चित्त की कोई भी अवस्था हो।
ना अनुभवकर्ता का कभी अन्त होगा ना अनुभव का कभी अन्त होगा, बस अनुभव का प्रकार बदलता रहता है।
आनंद का अनुभव तो अभी भी है, क्योंकि मैं ही तो आनंद हूँ। बस यह आनंद अज्ञान के ढेर में कहीं छुप गया है। चित्त वृत्ति बंद नहीं करनी है, चित्त वृत्ति में भी आनंद है। निद्रा या सुषुप्ति में भी चित्त वृत्ति या अनुभव बंद नहीं होते हैं, उसका प्रकार भिन्न होता है।
सभी नियम प्रमाणिक हैं, उनको प्रयोगों से देखा जा सकता है।
साधक को भेद नहीं दिखता है, मूल रुप से जो जागृत में है वही स्वप्न, सूक्ष्म, हर लोक में वैसा ही है।
'चित्त की अवस्थाओं का बदलना' यह एक रास्ता माया ने दिया हुआ है, अपने आत्म स्वरुप को जानने का। मृत्यु भी चित्त की अवस्था में बदलाव ही है। जहां बंधन है, वहीं मुक्ति की चाभी भी है, अज्ञानवश हम उसे देख नहीं पाते हैं।
स्वप्न अवस्था को जानने से ही माया के बहुत सारे रहस्य खुल जायेंगे, सूक्ष्म अवस्था में बाकी सब भी स्पष्ट हो जाता है।
यही त्रिपुरा सुंदरी का पति होना है, जो मैं पहले से ही हूँ। इस तरह प्रयोग करते रहें तो चित्त पर सम्पूर्ण नियंत्रण पाना सम्भव है।
🙏🙏🙏
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सत्संग 30, 10 Apr 21
देव का अर्थ है जो दिव्य है, जो प्रकाशित है। शैव दर्शन में शिव को महादेव कह दिया, जो सबसे बड़ा ज्योति पुंज है। भक्ति मार्ग पर विष्णु को भगवान कहते हैं, अद्वैत में ब्रह्मं को परमात्मा कहते हैं, और सांख्य में ईश्वर कहा गया है।
पहले सत्य को देख लें, क्योंकि परम सत्य अभी सामने प्रत्यक्ष है। जो अनुभव अभी सामने है उसपर ध्यान दें या उसपर अनुसंधान करें, और शब्दों, इतिहास में ना फंसे।
अनुभव - परिभाषा - अनुसंधान, यह चरण हैं, व्यवस्थित चलना बहुत आवश्यक है। यदि बुद्धि अनुशाशित नहीं है, तो जीवन भी अनुशाशित नहीं होगा।
नाद का अर्थ है परिवर्तन जो चक्र में चलता है। नाद की आवृत्ति (frequency) या गति, बड़ या घट सकती है।
मन कई मानसिक वृत्तियों का एक समूह है, जिसको अंतःक्रण भी कहा गया है, जिसमें अहंकार, सम्वेदनायें, विचार, बुद्धि, भावनायें आदि अनेक प्रक्रियायें आ जाती हैं।
यथार्थ की दृष्टि से वस्तु, मनोशरीर यंत्र आदि किसी का भी कोई कारण दिखाई नहीं देता है। जब सम्पूर्णता कारणहीन है, तो जो भी इसमें प्रकट होता है उसका भी कोई कारण नहीं है।
जो मिथ्या है, जो प्रतीत होता है, उसका कोई कारण नहीं हो सकता है। जैसे यदि रस्सी में सांप दिखाई देता है तो सांप का रंग हरा क्यों है, इसका कोई कारण ढूंढना अर्थहीन है। जैसे सांप चित्त निर्मित है, तो उसका कारण भी मनगढ़ंत ही होगा।
माया या मिथ्या का कोई कारण नहीं है। जब सभी अनुभव मिथ्या हैं, तो अनुभवों का कारण ढूंढना निरर्थक है। पराभौतिक परामानसिक रचनाओं से नाद की परिभाषा की गई है, नाद से रचनाओं की नहीं।
पहले अनुभव आता है, और अनुभव पर अनुसंधान करने से नाद की परिभाषा आती है। अनुभव से नाद की कल्पना की गई है, नाद एक काल्पनिक शब्द है। यदि एक अनुभव नाद है तो सभी अनुभव नाद ही हैं। वस्तुओं का अनुभव होता है, पर उनकी गिनती काल्पनिक है। केवल अनुभवकर्ता नाद नहीं है, बाकी सब नाद है।
पराभौतिक परामानसिक नाद का कोई आधार नहीं है, क्योंकि अस्तित्व पराभौतिक परामानसिक नाद के रुप में प्रतीत होता है। यह भी हमारी कल्पना मात्र है।
नाद प्रतीत होता है पर है नहीं, क्योंकि वह सम्भावना मात्र है, कहीं है नहीं वो। इसलिये नाद का कोई आधार या कारण ढूंढना बेकार है, क्योंकि नाद मिथ्या है और मिथ्या का कोई आधार नहीं होता है।
नाद रचनाओं और शरीर का कोई सम्बंध नहीं है, दोनों अलग अलग नहीं हैं, एक ही हैं। शरीर, रचनाओं का कोई सत्य नहीं है। शरीर नाद से बनी हुई रचना मात्र है।
घड़ा चित्त निर्मित कल्पना मात्र है, वहां केवल मिट्टी ही है घड़ा मिथ्या या नाम रुप है। शरीर नाम रुप है, केवल नाद ही है, मिट्टी से बनी हुई एक रचना है। शरीर भी मिट्टी ही है।
मिथ्या का आधार या कारण सत्य नहीं होता है। जो सत्य है वो सत्य ही रहता है, मिथ्या मिथ्या ही रहता है, एक दूसरे में बदलना सम्भव नहीं है। सत्य सत्य है, मिथ्या मिथ्या है, सत्य मिथ्या नहीं, मिथ्या सत्य नहीं है, यह सूत्र है। अपना सूत्र स्वयं बना लें।
पहले ज्ञान आता है फिर स्मृति आती है।
मिथ्या का सृजन नहीं हो सकता है। माया सत्य नहीं है यह बहुत लोगों को समझ नहीं आता है क्योंकि यह मान लिया गया है कि पदार्थ सत्य है।
केवल सम्भावना मात्र है, यहां कोई रचना नहीं हुई है। अद्वैत में प्रकृति को ही प्रतिति कह दिया गया है, की वो कहीं है नहीं। यदि किसी रचना का रचेता है तो फिर उसका भी कोई रचेता होना आवश्यक है, तो ऐसे अनंत शृंखला बन जायेंगी जिसका कोई अर्थ नहीं है।
द्वैत तार्किक नहीं है, केवल उपयोगी हो सकता है।
यदि परिवर्तन होता तो घड़ा फिर से कभी मिट्टी नहीं हो सकता है। घड़े में मिट्टी व्याप्त है, मतलब वो घड़ा नहीं है केवल मिट्टी ही है।
कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ है उसका प्रमाण है स्मृति, यदि स्मृति निकाल दी जाये तो क्या परिवर्तन हुआ है? परिवर्तन की मान्यता स्मृति आधारित है।
एक नाद रचना दूसरी नाद रचना पर छाप छोड़ती है उसको स्मृति कहते हैं। इसमें समय भी आ गया और परिवर्तन भी आ जाता है।
परिवर्तन ही अनुभव है, यदि परिवर्तन नहीं हो तो अनुभव भी नहीं होगा, जो बदल गया वो मिथ्या है। स्मृति की वजह से परिवर्तन प्रतीत होता है। स्मृति हटा दी जाये तो परिवर्तन भी नहीं पता चलेगा, या अनुभव भी नहीं होगा।
स्मृति का एक नाम चित्त भी है, चित्त वो नाद रचनायें हैं जो जम गई हैं। इसलिये सभी अनुभव चित्त के ही अनुभव हैं। स्मृति, चित्त, अनुभव, परिवर्तन आदि पर्यायवाची शब्द हैं।
मुझे मेरा ही अनुभव हो रहा है, मैं ही ब्रह्मं हूँ। जो सत्य है वही स्वयं को प्रतीत होता है।
स्मृति भी नाद है, परिवर्तन भी नाद है, एक को दूसरे का मूल कहना ठीक नहीं है। यदि कहना ही है तो कह सकते हैं कि अनुभव मौलिक है और बाकी धारणायें उससे बनाई गई हैं।
अनुभव का मूल नहीं मिलेगा क्योंकि अनुभव मिथ्या है। यहां बुद्धि की सीमा है।
बुद्धि चित्त की एक परत है उससे सत्य या परम को नहीं जाना जा सकता है। बुद्धि मिथ्या में ही प्रयोग में लायी जा सकती है।
रस्सी में यदि सांप दिखता है तो उसका कोई कारण नहीं है। मूल ज्ञान यही है कि, अस्तित्व में अनंत सम्भावनायें हैं उसमें कुछ भी प्रकट या प्रतीत हो सकता है। अस्तित्व में किसी घटना का कोई कारण नहीं है।
कारणहीनता, समयहीनता, निर्गुणता, स्थानहीनता, ज्ञानहीनता, परिवर्तनहीनता, सीमाहीनता, पूर्णता, अनंतता, आनंद, चैतन्य अस्तित्व के मूल तत्व हैं। यह अनुभवकर्ता के नाम हैं। इसी तरह अनुभव भी अस्तित्व का ही एक नाम है। यह बुद्धि के परे है इसलिये अज्ञेय है।
ज्ञान भी मिथ्या का ही होता है, अस्तित्व ज्ञानहीन है, बुद्धि से परे है। अज्ञान मलम, ज्ञान मलम, दोनों मल हैं। ज्ञान के कांटे से अज्ञान के कांटे को निकाल देते हैं और फिर दोनों को फेंक देते हैं।
अज्ञान, आग की तरह है जो स्वयं भी जलती है और दूसरों को भी जलाती है। बाद में ज्ञान को भी छोड़ दें। जो चेतना में रहने का प्रयास कर रहे हैं वो देखें कि क्या वो ज्ञानहीनता में रह पाते हैं कि नहीं।
चेतना शुद्धि होने के बाद वहां ज्ञान भी नहीं रहता है फिर। कुछ लोग एक कदम पहले रुककर, ज्ञान प्रसार करते हैं जिनको बोधीसत्व कहते हैं। वो यह पूरी तरह जानते हुऐ करते हैं कि ना ज्ञान है ना अज्ञान है।
इसके बाद ज्ञान का भी कोई अर्थ नहीं है, जो समझ में नहीं आ सकता है, जिसको सांख्य में कैवल्य कहते हैं, या शैव्य में परम शिव कहते हैं। यह मनुष्य जीवन के लिए किसी काम का नहीं है।
अस्तित्व का मूल क्या है, वह अच्छी तरह से स्मृति में अंकित कर लीजिये, उसका सूत्र बना लीजिये और जो जीवन में आवश्यक है उसे करते रहना है। किसी तरह से गुरुक्षेत्र के लिए उपयोगी बनें, ज्ञान प्रसार करना ही अंतिम चरण है ज्ञान मार्ग पर।
जैसे आग सही से जलाने के लिए एक लकड़ी का उपयोग करते हैं और अन्त में उसको भी अग्नि में डाल देते हैं। यह अंतिम लकड़ी ज्ञान है, उसको भी स्वाहा कर देना है अन्त में।
कारणहीनता, परिवर्तनहीनता आदि मेरा स्वभाव है, यह सूत्र पकड़ कर रखिये। बाकी सब प्रतीत होता है, और काल्पनिक है।
यही अनुभव स्मृति, या परिवर्तन, नाद, चित्त, पराभौतिक परामानसिक रचनायें आदि बनकर सामने आता है। एक का मूल दूसरे में ना ढूँढिये, उसका कुछ अर्थ नहीं है।
अनुभवकर्ता के सिवा सब मनगढ़ंत है, सब चित्त निर्मित है। सत्य को अनुभव में ना ढूँढे, कभी नहीं मिलेगा। अद्वैत में माया को पूरी तरह से त्याग दिया गया है।
अनुभव मिथ्या है, बस अद्वैत यहीं समाप्त हो जाता है। बोधी वार्ता में पिछले 4 साल में कई प्रयास किये गये हैं परम तत्व को बताने के लिए, या प्रज्ञा, चेतना जागृत करने के लिए।
1) पहले ही वीडियो में ज्ञान के साधन बता दिये गये हैं, सत्य के मानदंड बता दिये हैं। बुद्धिमान के लिए इतना संकेत ही बहुत है।
2) फिर अनुभवकर्ता के गुण, अनुभव बताया जाता है।
3) आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान में फिर वही बताया गया है। ब्रह्मज्ञान के लिए बुद्धि का उपयोग करना आवश्यक नहीं है।
4) फिर वासनापूर्ती, माया की शृंखला, शुद्धिकरण, मनन की शृंखला है।
5) ज्ञान मार्ग कार्यक्रम है।
6) सत्संग है।
बताने के लिए इतना प्रयास किया गया है, क्या जानने के लिए भी कोई प्रयास कर रहा है, इसपर मनन करें।
जिसके लिए मनुष्य जन्म लिया है, वही छोड़कर हम बाकी सभी कामों में व्यस्त रहते हैं। यही माया का प्रभाव है जो सब कुछ उलटा कर देती है।
इन्द्रियां सूक्ष्म ही हैं, आंख, नाक आदि द्वार हैं जहां से नाद इन्द्रियों तक पहुंचता है। सूक्ष्म, मानसिक, आंतरिक इन्द्रियों में कोई मूल भेद नहीं है, यह केवल समझाने के लिए कहा गया है। सांख्य में इसीको तन्मात्रा कहा गया है।
नाद बाहर नहीं है, वह अंतर्नाद है, अनाहत भी कहा गया है।
सम्पूर्ण चेतना में क्या होता है, यह वहां जाकर देखिये, आपको साधन दिये गये हैं उनका प्रयोग कीजिये।
अहंकार, क्रोध, भय, ईर्ष्या और काम वासना इनसे लोगों को डर लगता है। यह प्राकृतिक प्रक्रियांएं हैं इनको बंद करने की क्या आवश्यकता है।
नियंत्रण करना भी एक छल है, ये भी उनके लिए है जो नियंत्रण करना चाहते हैं। चेतना आ जाये तो नियंत्रण, अनियंत्रण सब बराबर है। कौन किसको नियंत्रण करना चाहता है, मिथ्या को नियंत्रण कर भी लिया तो क्या हो जायेगा।
गुरु को शिष्य के स्तर पर आना पड़ता है, इसलिये यह सब विधियां बताई गई हैं। ज्ञान मार्ग सबसे श्रेष्ठ मार्ग है। बाकी मार्ग पर कर्ता भाव जाता नहीं है, अध्यात्मिक कर्ता भाव आ जाता है। अहंकार अध्यात्मिक हो जाता है, सांसारिक अध्यात्म हो जाता है, एक प्रकार की सांसारिकता को अध्यात्म मान लिया जाता है।
जो माया पर नियंत्रण करना चाहता है वो भी माया की ही एक रचना है। ज्ञान मार्ग का अंतिम पड़ाव समर्पण है, नियंत्रण नहीं है। नियंत्रण का मार्ग भी समर्पण की ओर ही ले जाता है।
तंत्र के मार्ग पर भी वासनापूर्ती, वासनामुक्ति में बदल जाती है। वासनामुक्ति का अर्थ है समर्पण, की यह वासना मेरी नहीं है जो तरह तरह के कर्म करवा रही है। कोई भी वासना पूरी तरह पूर्ण है, सुन्दर है, निष्कलंक है, कोई दोष नहीं है, उसमें नियंत्रण की आवश्यकता नहीं है।
क्या बारिश की कोई बूंद बुरी है, उसमें कोई दोष नहीं है, अब क्या नियंत्रण करना चाहते हैं। अच्छा बुरा, अज्ञान है, द्वैत है। मेरा स्वभाव समर्पण है, मैं पहले से ही समर्पित हूँ। मन बंदर की तरह है, उसे जो करना है उसे करने दो, उसे इंसान बनाने में समय ना बरबाद करें।
प्रणाम।
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सत्संग 31, 17 Apr 21, के कुछ मुख्य बिंदु।
स्मृति एक ही है, सारी सीमायें काल्पनिक हैं। अनुभव सीमित है इसीलिये जीवन सम्भव है। विलीनता जीव का नाश नहीं है, विलीनता माया में काल्पनिक सीमाओं का नाश है।
अस्तित्व पूर्ण ही है, केवल अज्ञान के कारण अपूर्ण प्रतीत होता है। पूर्णता यानि वो अनुभव जिसमें से ना कुछ निकाला जा सकता है, ना ही कुछ जोड़ा जा सकता है। जैसे वृत्ताकार, फूल आदि पहले से ही पूर्ण है।
अस्तित्व सम्पूर्णता को ही कहते हैं, उसके बाहर कुछ और नहीं हो सकता है। अस्तित्व अनंत है, उसमें से कुछ भी निकाल दें या जोड़ दें, वह पूर्ण ही रहता है।
एक ही चीज है जो पूर्णता लिये हुऐ है, वो है अस्तित्व, और वो मैं ही हूँ। केवल सुनकर नहीं मानना चाहिये, समझकर, मनन करके, प्रयोग करने के बाद ही यह मानना सही है।
आवश्यकता के नियम के अनुसार सब कुछ होना चाहिए, अस्तित्व को कुछ भी तिरस्कारित नहीं है। ज्ञानी हर अनुभव, हर घटना में पूर्णता ही देखता है, इसको कहते हैं सम्यक दृष्टि।
आम व्यक्ति पसंद नापसंद के चश्मे से देखता है इसलिये उसको अपूर्णता दिखती है। नहीं तो जो जैसा है वैसा ही पूर्ण है।
जैसे फूलों की जितनी देर आवश्यकता रहती है वो बस उतनी देर ही रहते हैं। इसी तरह सारी प्रक्रियाएं अपने आप में पूर्ण हैं, सुन्दर हैं और आवश्यक हैं।
जो परिवर्तनशील है उसको स्थायी करने का प्रयत्न, बड़ा अज्ञान दर्शाता है। वास्तव में मेरी मृत्यु नहीं होती है, केवल जागृत अवस्था मृत्य अवस्था में बदल जाती है।
दम्भ जो मूर्खता से पैदा होता है वो अभिमान है, कि सब मेरी इच्छा अनुसार ही चले। मनुष्य होते हुए उसकी सारी प्रवृत्तियों को स्वीकारना और उसमें अवरोध पैदा नहीं करना साधक का कर्तव्य है। जैसे ही शरीर को आप अस्वीकार करते हैं तो वह यह शरीर जान जाता है।
योगी शरीर को सीढ़ी बना कर आगे निकल जाता है, जबकि आम आदमी शरीर से चिपके रहना चाहता है।
जो ज्ञान मार्ग में आगे नहीं बढ़ पाते हैं तो योग है, फिर कर्म, भक्ति, नहीं तो अन्त में फिर प्राकृतिक रुप से ही विकास होगा।
अलग अलग अवस्थायें भिन्न भिन्न वृत्ति, प्रक्रियाओं और स्मृति से बनी हैं। जागृत अवस्था को वस्तुनिष्ठ स्मृति भी कहते हैं, यहां शरीर के माध्यम से दूसरी वस्तुओं से सम्पर्क सम्भव है। स्वप्न अवस्था में जीव या कारण शरीर की स्मृतियां चलती हैं, जो व्यक्तिनिष्ठ है।
सूक्ष्म अवस्था महास्मृति या महाचित्त से आती है। इसमें वस्तुनिष्ठ या व्यक्तिनिष्ठ दोनों तरह के अनुभव हो सकते हैं। निद्रा में लगभग स्मृतिहीनता है, यहां बुद्धि भी बंद हो जाती है।
ज्ञानी के लिए सभी अवस्थायें बराबर हैं, जिसको तुरीय अवस्था भी कहते हैं। तुरीय अवस्था, कोई अवस्था नहीं है, यह सभी अवस्थाओं का अन्त है।
चित्त की अवस्थाओं का ज्ञान प्रयोग से होता है या फिर ज्ञान और चेतना में अवस्थित रहने से अपने आप होता है। जब चेतना सब अवस्थाओं में बनी रहे तो उसको कहते हैं तुरीय अवस्था।
फिर जागृति, स्वप्न, सूक्ष्म, निद्रा में भेद नहीं रहता है। तब केवल प्रवृत्ति की अवस्था या निवृत्ति की अवस्था ही रह जाती है। यह चक्र में चलता रहता है, कभी जीव, शरीर आदि होते हैं या बीज (latent) अवस्था होती है। स्मृति में वृत्तियां बीज, सम्भावना या लिंग की अवस्था के रुप में रहती हैं।
ज्ञान मार्ग पर सभी अवस्थाएं वृत्तियां हैं, एक बराबर हैं, यानि सम-अवस्था है। सारी अवस्थायें एक जैसी ही लगेंगी।
चित्त में यह योग्यता है कि वो अपनी अवस्था इच्छा अनुसार बदल सकता है। यह प्रकृति की कृपा है, जिसको कहते हैं अवस्थाओं पर नियंत्रण होना।
जब तक अज्ञान है, तब तक अवस्थायें हैं, वृत्तियां हैं, संसार, लोक, परलोक आदि हैं। अज्ञान नहीं है तो परम शून्य में अनंत सम्भावनायें हैं। यही अस्तित्व है, जो मेरा स्वरूप है, बाकी विक्षेप है।
निरोध यानि नियंत्रण, आपके वश में आ जाना। पतंजलि ने इन अवस्थाओं के उपर जाने का अनुरोध या प्रेरित किया है।
जो ज्ञान मार्ग में आगे बढ़ गये हैं उनको योग, भक्ति, कर्म सभी ज्ञान मार्ग ही दिखाई देंगे। सभी मार्गों या धर्मों में थोड़ी परम्परायें भिन्न है पर मूल एक ही है, सारा अध्यात्म सार्वभौमिक है, सारा ज्ञान तो एक ही है।
पुराने ज्ञान में बहुत भ्रष्टता आ गयी है। इसलिये उसका नवीनीकरण किया गया है।
चित्त या भगवान का मानवीकरण नहीं करना चाहिए।
चित्त ही नियम है। जो नाद रचनायें संगठित या नियमित हो जाती हैं उनको चित्त कहते हैं। नियम है इसलिये रुप है, नहीं तो अनियमितता को जानने वाला भी कोई नहीं रहेगा।
चित्त की सबसे छोटी रचना है स्मृति। अब स्मृति में भी एक नियम है कि दूसरी नाद रचनाएं उसपर छाप छोड़ती हैं। सारा चित्त स्मृति पर ही आधारित है, ऐसे ही संगठन होता है।
चक्रीय परिवर्तन नाद है, यह भी तो एक नियम है। जो नियम में प्रकट हो जाता है उसीको चित्त कहते हैं। हमें केवल चित्त का ही अनुभव हो रहा है।
जो नियमित नहीं है उसको शेष कहा गया है। नाद में एक सम्भावना अनियमितता की भी है। शेष में यह भी सम्भवाना है कि वो नियमित हो जाये। सारी सृष्टी शेष से ही प्रकट हो रही है, वह धीरे धीरे नियमित हो रहा है। शेष का एक बहुत छोटा सा ही भाग नियमित है जो की प्रकट है, बाकी का अप्रकट है।
चित्त में भी अनियमितता सम्भव है। शेष का अनुमान नियमितता में भी लगाया जा सकता है। कुछ है हमारे अनुभव में जो पूरी तरह से अनियमित है, जो नियमितता के बीच बीच में दिखाई पड़ता है। जैसे एक पतले कपड़े में से आकाश दिखाई देता है।
जितने अनुभव हो सकते हैं, उसका एक बहुत ही छोटा सा अंश अनुभव में आता है।
हर अनुभव जो प्रकट है वो पहले ही अनुभव किया जा चुका है। केवल अस्तित्व ही कह सकता है कि शेष भी मेरा ही भाग है। विश्वचित्त भी प्रकट भाग है, केवल अस्तित्व अनंत है।
माया का एक रुप प्रकट है, और माया का एक रुप अप्रकट है। अप्रकट को काली भी कहा गया है, या काले नाग की तरह दिखाया गया है। काली शेष का चिन्ह है, जहां कुछ भी नहीं दिखाई देता है पर सभी कुछ वहीं से आता है। जो प्रकट है वो भी शेष में विलय हो जाता है। इसलिये काली संहार भी करती है।
प्रलय में जो प्रकट है वो अप्रकट हो जाता है। विश्वचित्त की अवस्था निद्रा है, पर यह अज्ञानी वाली निद्रा नहीं है। शेष नाग कुंडलिनी ऊर्जा से उपजा है।
सभी अवस्थाएं विश्वचित्त का ही स्वप्न हैं। विश्वचित्त में जब अज्ञान प्रकट होता है तो यह स्वप्न के समान दिखाई देता है। इस अज्ञान से विश्वचित्त जो अखंडित था वो खंडित हो जाता है, और भिन्न रुपों में प्रतीत होता है।
विश्वचित्त की जब नींद खुलती है तो यह सब उसीमें समा जाता है, जिसको प्रलय कहते हैं। जैसे नींद खुलने के बाद सपना नहीं बचता है। ऐसे ही यह कह सकते हैं कि यह विश्व या ब्रह्माण्ड, स्वप्न है सोते हुऐ विष्णु का, इसके पीछे बहुत बड़ा ज्ञान छुपा हुआ है।
अनुभवकर्ता ही सभी सम्भावनाओं का दृष्टा है। वह शेष ऊर्जा का भी दृष्टा है पर उसका ज्ञान नहीं होता है, क्योंकि ज्ञान चित्त में होता है। अनुभवकर्ता दृष्टा तो है काली का, पर अपने आप को जान नहीं सकता है।
अनुभवकर्ता स्वयं प्रकाषित है, लेकिन जब तक यह रचनायें नहीं प्रकट होती हैं तब तक वह जान नहीं पाता है कि मेरा अस्तित्व है। अनुभव नहीं होता तो क्या मैं जान पाता कि मैं क्या हूँ। मेरा ही दर्शन मुझे इस तरह से हो रहा है।
वास्तव में शून्यता, निर्गुणता, एकता, अनुभवकर्ता में कोई इच्छा नहीं है, केवल अनुभवक्रिया ही है।
जीव रुप में जो अनियमित है वो दिखाई नहीं देता है। अभी भी यहां पर शेष ऊर्जा है, पर वो अनुभव में नहीं आती है। केवल योगी या ज्ञानी ही उसको देख सकते हैं। जो प्रकट है, उसके पीछे जब आपको दिखता है, तो उसको कहते हैं की काली के दर्शन होना।
वो शक्ति जहां से सब कुछ उपजता है वह काली है, इस तरह ज्ञानचक्षु से काली के दर्शन होते हैं। काली सामने है, बस वह प्रकट नहीं होती है। शिव के सबसे पास काली रुप है, बाकी सब दूर हैं।
जो अप्रकट नाद है, वो शून्यता के सबसे पास है। सम्भावना से एक ही चरण आगे बढ़ा है अभी तक। सम्भावित से अनियमित हुआ है, जो काला है, वही कृष्ण है, वो ही अनुभवकर्ता है और वही मैं हूँ।
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सत्संग 32, 24 Apr 21, के कुछ मुख्य बिंदु।
सभी अवस्थाएं चित्त की ही स्थिति हैं, अनुभवकर्ता की कोई अवस्था नहीं होती है। अनुभवकर्ता केवल इनको प्रकाषित करता है। यह ज्ञान की पिछली अवस्था मेरी ही थी, यह स्मृति के कारण ही जाना जा सकता है। यदि स्मृति नहीं हो तो अनुभवकर्ता या अस्तित्व को यह ज्ञान नहीं होगा की स्थिति बदल गई है।
अनुभवकर्ता हमेशा वर्तमान में ही होता है, और स्मृति भूतकाल में संस्कार या भविष्य में कल्पना के रूप में होती है। स्मृति वर्तमान में नहीं रहती है। अनुभवकर्ता स्मृति को प्रकाषित करता है इसलिये ऐसा भ्रम होता है कि मुझे ज्ञान हो रहा है अवस्थाओं का। वास्तव में ज्ञान स्मृति का हो रहा है, अवस्थाओं का नहीं।
स्मृति नहीं है तो यह भी नहीं कहा जा सकता है कि मेरी कौनसी अवस्था थी, निरंतरता स्मृति के कारण बनती है। जहां स्मृति का पूल टूट जाता है वहां अवस्थाओं की निरंतरता नहीं रहती है। अनुभवकर्ता की निरंतरता सर्वदा होने के बाद भी, यदि स्वप्न में चेतना जागृत नहीं है तो, जागृति से स्वप्न वो बदलाव है जहां स्मृति में निरंतरता टूट जाती है।
जीवन से बड़ा मनोरंजन कोई नहीं है, बाहर मनोरंजन ढूंढने में समय क्यों बरबाद करते हो। चेतना की वजह से जागृत और स्वप्न में एक पुल बन जाता है, जिसको स्मृति पुल भी कह सकते हैं। चेतना होने से जागृत अवस्था की स्मृति स्वप्न के अनुभव से मिल जाती है।
साधक जीवन पर ध्यान देता है। आम आदमी जागृति में भी सो रहे होते हैं, और जीवन पर ध्यान नहीं देते हैं। वह अपने ही चित्त के बनाये हुए छोटे से पिंजरे में बंद हैं। अवस्थाओं के बदलाव के ज्ञान से भी यह जाना जा सकता है कि जीवन क्या है।
मृत्यु वो अवस्था है जहां स्मृति में निरंतरता टूट जाती है। जैसे स्वप्नजीव यह नहीं जान सकता है कि जागृति में क्या था। यादाश्त चली जाना मृत्यु है, जो अनुपयोगी है मृत्यु उसका नाश है। जैसे सांप अपनी पुरानी त्वचा छोड़ देता है, या जैसे हम कपड़े बदलते हैं।
गुरु शिष्य का सम्बन्ध कई जन्मों तक चलता है।
आत्मज्ञान से बड़ा कुछ और नहीं है जो बांटा जाये। आत्मप्रकाश या अनुभवकर्ता का ज्ञान प्राप्त करना ही जीवन का उदेश्य है। यह नहीं हुआ तो जीवन में एक अंधकार है, जैसे कोई काल कोठरी में बंद है। इस कोठरी की चाभी गुरु के पास है।
अहंकार इससे बाहर भी नहीं आना चाहता है, क्योंकि आत्मज्ञान है मेरे या अहंकार के नहीं होने का ज्ञान, या मेरी अवस्था बदलकर अस्तित्व पर आ जाना। या तो मैं सब कुछ हूँ या मैं कुछ भी नहीं हूँ, बीच की कोई स्थिति मैं नहीं हूँ।
अंधकार की अवस्था से प्रकाश में आना या अज्ञान से ज्ञान में आना, एक तरह से असत्य व्यक्ति की मृत्यु ही है। आत्मज्ञान हो जाये तो एक तरह का स्मृति पुल बन जाता है दो जन्मों के बीच में।
गुरु का काम है, मूल ज्ञान के बीज डाल देना की तुम अनुभवकर्ता हो और सभी अनुभव मिथ्या हैं। यह ज्ञान का बीज महत्वपूर्ण है, घटना या गुरुव्यक्ति इतना महत्वपूर्ण नहीं है।
जीवन अनंत है, मृत्यु एक बदलाव है जहां निरंतरता टूट जाती है। लेकिन चेतना के द्वारा उसको वापस लाया जा सकता है, जैसे जागृत से स्वप्न में चेतना बनायी रखी जा सकती है। ज्ञान मार्ग में जागृत अवस्था के अनुभवों को देखकर भी यह सब समझा जा सकता है।
यह भिन्न अवस्थाओं के बीच में स्मृति का पूल बना पाना हमारी प्राकृतिक योग्यता है। इससे मृत्यु का भय नहीं रहेगा और जीवन में उतावलापन नहीं रहेगा, एक ठहराव, शांती आ जायेगी। इससे हर तरह के डर से मुक्ति हो जायेगी और एक समर्पण का भाव आ जाता है। यह आत्मविश्वास आ जाता है कि जो आवश्यक है वह होकर ही रहेगा, उसको टाला नहीं जा सकता है।
अवस्थाओं के बदलने का अध्यन अध्यात्म में एक महत्वपूर्ण घटना है, यह जीवन बदल सकती है। जबकि, माया विपरीत बुद्धि कर देती है, और जो बेकार है उसको महत्वपूर्ण बना देती है।
मनुष्य जीवन से तदात्म्य टूटना ही देव योनि है, लेकिन सबमें स्मृति या तत्व एक ही है। जो अनावश्यक है उसको त्याग देते हैं, यही विकासक्रम है, जैसे दूध - दही - मख्खन - घी आदि।
स्वप्न में भी प्रवृत्ति को बदलना नहीं है, वहां भी कोई कर्ता नहीं है, बस सचेत होना है। कोई भी प्रवृत्ति यदि आवश्यक है तो रहेगी, नहीं तो अपने आप छूट जायेगी।
जो ज्ञानी हैं, योगी हैं, प्रगति कर गये हैं वो हर घटना से कुछ सीखते हैं। मूल ज्ञान में स्थिर रहना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, उसमें ही सबसे ज्यादा फायदा होगा। एक बार मूल ज्ञान हो गया, एक बार चलना सीख लिया, तो फिर गुरु पर भी निर्भरता आवश्यक नहीं है।
गुरु तो यही चाहते हैं की शिष्य स्वयं भी चलना सीखें, अपनी नीवं मजबूत कर लें और दूसरों का भी मार्ग दर्शन कर सकें।
जीवन को बनाये रखने के लिए दर्द की भी अपनी एक उपयोगिता है। जहां दर्द नहीं होता मनुष्य उसको नष्ट करने में लगा रहता है। दर्द को भी स्वीकार करना चाहिए।
जब आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान हो जाता है तो यह भी समझ आ जाता है कि, जो ज्ञान लेने वाला है वही ज्ञान देने वाला भी है, गुरु और शिष्य एक ही हैं उनमें कोई भेद नहीं है। सभी विभाजन या सीमायें सापेक्षिक स्तर पर ही प्रतीत होती हैं।
गुरु घड़े की काल्पनिक सीमायें तोड़ देते हैं। घड़े के अंदर और बाहर का आकाश तो पहले से एक और सम्पूर्ण ही है। केवल मिथ्या या अज्ञान नष्ट होता है कि मैं घड़े के अंदर भिन्न आकाश हूँ। गुरु और शिष्य में, जब तक अज्ञान है तभी तक भेद प्रतीत होता है, उसके बाद कोई भेद नहीं है।
आपदाओं में कुछ भी सत्य नहीं है, न लोग मर रहे हैं, ना बाढ़ है, ना बीमारी है। यदि आप इसको सत्य मान रहे हैं या चिंतित हैं, तो कुछ अज्ञान रह गया है जो वापस आ रहा है। इसलिये साधना जारी रखें। यह घटनायें प्राकृतिक हैं। इस तरह का उत्तर आम व्यक्ति समझ नहीं सकता है।
जब जीवन घेर लेता है, तो साधक आम आदमी की तरह ही व्यवहार करता है, लेकिन उतना ही करता है जितना अत्यंत आवश्यक है। साधक में पागलपन नहीं होता है, जब घटना हो जाती है और शांति हो जाती है, तो साधक वापस ज्ञान में स्थापित हो जाता है। वह देख सकता है कि यह सब मिथ्या है, उसके चित्त पर कर्म के गहरे निशान नहीं बनते हैं।
मनुष्य ने सपने को ही सत्य मान लिया है और बाहरी वस्तुओं पर बहुत निर्भर हो गया है। कोई भी अच्छा अनुभव हो, या इच्छा पूर्ति हो, उसका असर थोड़ी देर ही रहता है, फिर कुछ ना कुछ हो जाता है। हम यहां सुख लेने नहीं आये हैं, अनुभव में सुख नहीं मिलता है। मैं स्वयं ही आनंद हूँ, लेकिन उसको वहां ढूंढ रहा हूँ जहां वो नहीं है। यहां हम सीखने आये हैं, कुछ भोगने नहीं आये हैं।
अध्यात्म की साधना के लिए मनुष्य जीवन कीमती है। ज्ञान का अर्थ यह नहीं है कि हम मनुष्य से कुछ और हो जाते हैं, ज्ञान का अर्थ यह है कि हम मनुष्यता के पार हो जाते हैं। मनुष्यता का त्याग अध्यात्म नहीं है, उससे परे हो जाना अध्यात्म है।
अध्यात्म मार्ग पर आने के बाद भी जीवन में संघर्ष रहता है क्योंकि पुराने कर्मों का फल तो आयेगा ही। लेकिन जो भी होगा वो प्रकाश में होता है। अपने जीवन में आने वाले संघर्ष को पूरे समर्पण भाव से स्वीकार करना चाहिए। जैसे जब पुराना इकठ्ठा किया हुआ इंधन जब समाप्त हो जाता है तो अग्नि अपने आप बुझ जाती है।
एक बार ज्ञान मार्ग पर आ गये हैं तो अब जल्दी मत कीजिये। समर्पण का अर्थ हार मानना नहीं है, उसका अर्थ स्वीकार भाव में आना है और जो गलती सुधारने के लिए आवश्यक है वो करना चाहिए। समर्पण का अर्थ क्रियाहीनता नहीं है, बल्कि क्रियाशीलता है, सही कर्म होना चाहिए।
ज्ञान होने के बाद, बाकी संसार में जो अज्ञान है उसको दूर करना हमारा कर्म है, क्योंकि मैं ही तो अस्तित्व का सम्पूर्ण विस्तार हूँ। जहां अंधकार बचा हुआ है वहां दीया जलाना है। यहां संतुष्टि नहीं होनी चाहिए, पर गुरुक्षेत्र को समर्पण होना चाहिए। गुरुक्षेत्र के लिए उपयोगी बन जायें, एक उपकरण बन जायें। गुरुक्षेत्र से जो मिला है उसको बांटने का एक माध्यम बन जायें।
इससे जीवन में खुशी हो ना हो, संतुष्टि होगी की जीवन अर्थपूर्ण है, व्यर्थ नहीं गया। जो जानना था वो तो जान लिया है, अब या तो प्रयोग करते हैं या अंधकार दूर करते हैं।
मृत्यु से वो डरते हैं जिन्होनें जीवन पूर्णता से नहीं जिया, जो आवश्यक है वो नहीं किया। ज्ञान मार्ग पर जब बुद्धि परिपक्व हो, सही काम कर रही हो, सही उम्र में अज्ञान का नाश करना आवश्यक है।
जो शिष्य बनना चाहता है उसके लिये विनर्मता बहुत महत्वपूर्ण है, कि मैं कुछ नहीं जानता हूँ, और मैं यह ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। यदि व्यवस्थित रूप से चलें तो ज्ञान मार्ग पर मूल ज्ञान होने में बहुत अधिक समय नहीं लगता है।
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सत्संग 1
अनुभव से बुद्धि जागृत होती है, बुद्धि से ज्ञान आता है, ज्ञान से चेतना और चेतना से समाधि में स्थिति होती है।
अनुभव --- बुद्धि --- ज्ञान --- चेतना --- समाधि --- संस्कार --- अनुभव।
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सत्संग 2
शब्द के पीछे यदि अनुभव नहीं है तो उसका कोई अर्थ नहीं है। अनुभव के बिना कोई ज्ञान नहीं होगा। ज्ञान मार्ग पर शब्द के रुप में संकेत दिया जाता है, और उसके पीछे का अनुभव ढूंढना आवश्यक होता है।
अज्ञान, वृत्ति, अहंकार, कर्ता भाव आदि यदि चेतना के अंदर ही है तो उनके होने से क्या अन्तर पड़ता है, उनको वैसा ही रहने दें। ज्ञानी और अज्ञानी में केवल एक ही अन्तर है, एक में चेतना है और एक में नहीं। अज्ञान से लड़ाई नहीं करनी है, बस चेतना से दोस्ती कर लेनी चाहिए। जो भी होना हो वो हो, बस वह सम्पूर्ण चेतना में हो।
माया और मुझमें कितनी दूरी है? शून्य है। जो प्रकट है, और जिसमें प्रकट होता है उसमें कुछ दूरी नहीं है, ना समय की ना ही स्थान की। दूरी केवल प्रतीत होती है, वास्तव में है नहीं।
ज्ञान मार्ग पर दो ही चरण हैं। पहला की यह सब या चित्त मैं नहीं हूँ; और दूसरा की यह सब या चित्त भी मैं ही हूँ। पहला विरक्ति; दूसरी एकत्व। पहला आत्मज्ञान; दूसरा ब्रह्मज्ञान।
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सत्संग 4
जो भी हुआ है उसपर चेतना का प्रकाश डालें। कुछ गलत कर्म हो भी गया है, तो चेतना आने के बाद उसे पूरी चेतना में देख लेने से ऐसा होता है जैसे की वो भी चेतना में ही हुआ था, क्योंकि अस्तित्व में समयहीनता है, और सभी अनुभव स्मृति हैं। दोनों कृत्य स्मृति में अंकित हो जाते हैं और उनमें कोई भेद नहीं रहता है। फिर उसके भी संस्कार नहीं बनेंगे।
कोई भी घटना हो या सम्बंध है, यदि वह पूरी तरह से सम्पूर्ण चेतना के प्रकाश में है, तो उनका कुछ प्रभाव नहीं पड़ता है, वो एक तरह का तप है, परीक्षा है। यदि चेतना का प्रकाश जागृत है तो अन्य कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।
पुरानी घटनाओं को चेतना के प्रकाश में देखने से, उसके संस्कार से बाद में धीरे धीरे चेतना बढ़ने लगेगी और उसका प्रभाव बाद में होने वाले अनुभवों पर भी पड़ेगा।
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