शुक्रवार, 11 मार्च 2022

हृदयपथ

 " गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
   गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥"


                                          

कई साल पहले "द पाथ विद ए हार्ट" इस वाक्यांश से, कार्लोस कास्टानेडा द्वारा उनके शिक्षक के बारे में लिखी कुछ पुस्तकों के द्वारा मेरा परिचय हुआ [10]। 

मुझे तब यह ज्यादा समझ नहीं आया, क्योंकि किताबें बहुत जटिल लगती थीं और ये बातें मेरे सिर के ऊपर से निकल जाती थीं। फिर भी, इस वाक्यांश ने मुझ पर थोड़ा प्रभाव डाला और आगे चलकर, यह स्पष्ट हो गया कि, वह किस बारे में बात कर रहे थे| मैं जिसकी शुरूआत से ही खोज रहा था, यह वही था। मैंने इस अवधारणा को "हृदयपथ" [1] के रूप में अपनाया है। वाक्यांश का यह नया रूप ज्यादा स्पष्ट और कम काव्यात्मक है, और अब हम चर्चा करेंगे कि यह वास्तव में है क्या और क्यों इतना महत्वपूर्ण  है।

यह मेरा अनुभव रहा है, कि अधिकांश लोग बिना सोचे-समझे, आधे सोए हुए, अनजान और लगभग लाश की तरह अपना जीवन जीते हैं। उनका जीवन और कुछ नहीं बल्कि उनकी अपनी इच्छाओं, भय, भावनाओं, सामाजिक दबावों, शारीरिक जरूरतों, पसंद-नापसंद और ऐसे ही अन्य कारणों से उन पर थोपी गई मजबूरियों की एक श्रृंखला है। उनके जीवन के अधिकांश भाग में जीवित रहने से संबंधित गतिविधियाँ होती हैं जैसे - भोजन करना, प्रजनन करना, संबंध बनाना, सुरक्षा सुनिश्चित करना, सामाजिक स्थिति आदि आदि|